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शतवार्षिकी वर्ष में नेमिचंद्र जैन

01/10/2019

शतवार्षिकी वर्ष में नेमिचंद्र जैन

मनोज मोहन

भारतीय रंगमंच की त्रैमासिक पत्रिका ‘नटरंग’ ने अपने संस्थापक-संपादक नेमिचंद्र जैन की शतवार्षिकी के अवसर पर ‘नेमि शती विशेषांक’ निकालकर उन्हें प्रणति दी है। विशेषांक के संपादकीय में अशोक वाजपेयी लिखते हैं- उनकी दृष्टि, खुलेपन, परिश्रम और सम्यक चित्त के कारण ही ‘नटरंग’ पत्रिका हिंदी में नाटक की ऐसी अबाध अटूट पत्रिका बन सकी और रंगमंच में अखिल भारतीयता का एक वयस्क और जिम्मेदार मंच भी। नटरंग के रूप में नेमि जी का अवदान इतना विपुल है कि आज सब अकल्पनीय-सा लगता है।
तार सप्तक के कवि नेमि जी के पास ‘रंगदर्शन’ और ‘अधूरे साक्षात्कार’ जैसी किताबें भी हैं जिन् हें नाट्य और उपन्यास समीक्षा के क्षेत्र में मानक की तरह देखा जाता है। 1918 में आगरा में जन्में नेमिचंद्र जैन ने अंग्रेजी साहित्य से एम.ए. किया था। जीवन-संघर्ष के दौरान उन्हें 1942 में एक मारवाड़ी दμतर में भी काम करना पड़ा। थोड़े समय के लिए उन् होंने अज्ञेय संपादित ‘प्रतीक’ के सहायक संपादक के तौर पर भी काम किया था। ‘नटरंग’ के संस्थापन और संपादन से पहले ‘वीणा ‘(इंदौर) और ‘रंग’ (दिल्ली) का संपादन वह कर चुके थे।
‘नटरंग’ के संपादन के साथ-साथ वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में व्याख्याता भी रहे। अपने दौर के प्रमुख मार्क्सवादी कवि नेमिचंद्र जैन ने तारसप्तक में कविता को मानवता की मुक्ति के अस्त्र के रूप देखा। बाद में मार्क्सवादी प्रभाव से बाहर भी निकले, लेकिन कविता लिखना कम होता चला गया। विशेषांक के संपादकीय में यह कहना सही है कि नेमिचंद्र जैन आत्मनिष्ठ होते हुए भी इस बात में गहरी रुचि रखते थे कि दूसरे रचनाकार क्या सोचते-करतेरचते हैं। नेमि जी इन क्षेत्रों में युवा प्रतिभा को प्रोत्साहित, प्रश्नांकित और सम्यक रूप से देखे-परखे जाने का हमेशा आग्रह और प्रयत्न करते रहे। इसी का प्रमाण है नेमिजी को याद करते हुए साहित्य और नाट्य से जुड़े जिन सोलह व्यक्तियों ने अपने संस्मरण लेख दिए हैं, उनमें सभी ने अपने युवा दिनों की ही स्मृतियां दर्ज की हैं।
वहां नेमि जी उन सभी के लिए मार्गदर्शक की भूमिका में हैं। देवेंद्र राज अंकुर ने जब कहानी के रंगमंच की शुरुआत रा.ना.वि. रंगमंडल में निर्मल वर्मा की तीन कहानियों की तीन एकांत शीर्षक से प्रस्तुत किया, तो द स्टेट्समैन में नेमि जी ने रिव्यू में लिखा था कि अंकुर ने भारतीय रंगमंच में एक नये मुहावरे को तलाश लिया है। एम. के. रैना उन्हें याद करते हुए कहते हैं ‘करने और कुछ कहने की मेरी यात्रा में हमारे गुरु नेमिजी हमेशा अपनी मुस्कान और उम्मीद भरी आंखों से अपने छात्रों को कुछ-न-कुछ कहते ही रहते थे और समझाते भी रहते थे। कवि बोधिसत्व अपने संस्मरण में कहते हैं कि ‘कुछ लोग संसार में बने रहते हैं।
वे जाकर भी कहीं जाते नहीं। अपने अवदान से, अपने लिखे से, अपने विचार से और कहे से, अपनी संवेदना से वे समाज में घुले रहते हैं।’ अपूर्वानंद उनके और मुक्तिबोध के संबंध में लिखते हैं- तो आज के चालीस- पैंतालीस के तथाकथित युवाओं पर एक टिप्पणी-सी मालूम पड़ती है। अपूर्वानंद की पंक्तियां हैं हम अक्सर भूल जाया करते हैं कि दोनों (नेमिचंद्र जैन और मुक्तिबोध) ही युवा हैं। मुक्तिबोध नेमि जी से दो वर्ष ही बड़े हैं। इस पत्र के समय नेमि जी 23 के भी नहीं हुए हैं। यह दो युवाओं की अपनी खोज, आत् म-निर्माण के संघर्ष, उसकी उम्मीदों और निराशाओं का दस्तावेज है। इस अंक में लगभग तीन चौथाई पन्नों की सामग्री नेमिचंद्र के लिखे साहित्य से ली गयी है। यह संपादक की दृष्टि संपन्नता का प्रमाण है। सबसे ज्यादा लेख रंगमंच पर है।
उपन्यास पर नौ लेख है। इसमें वह लेख भी है जिसके कारण एक प्रबुद्ध वर्ग आज तक कृष्ण बलदेव और उनके लिखे उपन्यास ‘उसका बचपन’ को हिंदी का सर्वोत् कृष्ट उपन् यास मानते हैं। दूसरी तरफ अज्ञेय के उपन्यास ‘नदी के द्वीप’ को कमतर। नदी के द्वीप पर लिखा लेख यहां शामिल नहीं है। आजादी के बाद से अपने महाप्रयाण तक नेमिचंद्र जैन हिंदी नाटक के केंद्रीय व्यक्तित्वों में तो शामिल रहे, वे हिंदी की बौद्धिक प्रखरता के उच् चतम मापदंड भी बने रहे। अंक के बेहतरीन संयोजन के लिए नटरंग परिवार की सराहना की जानी चाहिए।


 
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