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मुकदमों के अंबार पर नियंत्रण जरूरी

06/10/2019

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा 

ह वास्तव में चिंताजनक है कि देश की अदालतों में करीब एक हजार मामले आधी शताब्दी यानी की 50 साल से लंबित चल रहे हैं तो करीब दो लाख मामले 25 साल से लंबित हैं। पिछले दिनों गुवाहाटी में आयोजित एक समारोह को संबोधित करते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने अदालतों में लंबित प्रकरणों की चर्चा करते हुए गहरी चिंता व्यक्त की थी। उन्होंने प्रकरणों के शीघ्र निस्तारण के लिए रोडमैप का खाखा भी खींचा था। एक मोटे अनुमान के अनुसार देश में निचली अदालत से लेकर शीर्ष अदालत तक करीब साढ़े तीन करोड़ मामले लंबित हैं। इनमें से करीब 55 हजार मामले सर्वोच्च न्यायालय में तो 32 लाख से अधिक मामले देश के 24 हाईकोर्टों में लंबित चल रहे हैं। करीब-करीब पौने तीन करोड़ मामले देश की निचली अदालतों में विचाराधीन हैं। यह संख्या हमारी न्याय व्यवस्था के लिए चिंतनीय है। मुख्य न्यायाधीश ने न केवल इसके लिए चिंता व्यक्त की है, अपितु पुराने मामलों के निपटारे के लिए कार्ययोजना भी बनाई है। सर्वोच्च न्यायालय में प्रतिदिन 10 पुराने मामलों को सुनवाई के लिए विशेष बेंच के सामने रखने के निर्देश दिए हैं।
केन्द्र सरकार द्वारा पिछले दिनों संसद में प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण में बताया गया है कि देश की अदालतों में साढ़े तीन करोड़ से अधिक मामले लंबित चल रहे हैं। नेशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड के ताजा आंकड़ों के अनुसार देश की अधीनस्थ अदालतों में 3 करोड़ 12 लाख से अधिक प्रकरण विचाराधीन हैं। इनमें 3 लाख 86 हजार मुकदमे तो 20 से 30 साल पुराने हैं। यही कारण कि पिछले साल देश की सर्वोच्च अदालत ने केन्द्र सरकार से उच्च न्यायालयों में 93 और अधीनस्थ न्यायालयों में 2773 न्यायाधीशों के पद सृजित करने का आग्रह किया है।
आज देशभर के न्यायालयों में मुकदमों का अंबार लगा हुआ है। इसमें दो राय नहीं कि न्याय मिलने में समय कितना भी लगे पर लोगों का देश की न्याय व्यवस्था पर विश्वास है। इनमें से कई मुकदमे इस प्रकृति के भी हैं कि जिनका निस्तारण आपसी समझाइश व सरकार के सकारात्मक रुख से आसानी से हो सकता है। देशभर में लाखों की संख्या में यातायात पुलिस के चालान, बैंकों के कर्ज वसूली से मामले, पारिवारिक विवाद, चैक बाउंस होने या इसी तरह की छोटी-छोटी प्रकृति के लाखों की संख्या में विवाद न्यायालयों में लंबित होने से न्यायालयों पर अनावश्यक कार्य भार बढ़ता है।
पिछले कुछ सालों से लोक अदालतें आयोजित कर मुकदमों के अंबार को कम करने के सकारात्मक प्रयास किए जा रहे हैं। लोक अदालत की अच्छी बात यह है कि इसमें निस्तारित मुकदमों की अपील नहीं की जा सकती। इससे बड़ी राहत मिलती है, नहीं तो अपील दर अपील मुकदमे एक अदालत से दूसरी अदालत तक चलते ही रहते हैं। उनके अंतिम निस्तारण की स्थिति आती ही नहीं। दशकों तक वाद का निस्तारण नहीं होने से वादी भी निरुत्साहित और ठगा हुआ महसूस करता है। हालांकि मुकदमों के अंबार को कम करने की दिशा में ठोस प्रयास निरंतर जारी हैं। कम्प्यूटरीकरण के माध्यम से मुकदमों की स्थिति, वाद की तारीख और अन्य जानकारी मुहैया कराई जाने लगी है। इससे वादियों को इस मायने में राहत है कि मुकदमे की स्थिति, तारीख आदि के लिए चक्कर नहीं काटने पड़ते हैं। लेकिन काम के बोझ और न्यायाधीशों की कमी के कारण निस्तारण में तेजी नहीं आ पा रही है।
हमारे देश में 14 हजार के लगभग निचली अदालतें कार्यरत हैं। इसी तरह से 24 हाईकोर्ट और इनकी बेंच सेवाएं दे रही हैं। सर्वोच्च न्यायालय की विभिन्न बेंचों में अब 34 न्यायाधीपतियों द्वारा मुकदमों का निस्तारण किया जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय देश में लंबित मुकदमों के प्रति काफी गंभीर है। सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को पुराने मामलों को प्राथमिकता से निस्तारित करने के निर्देश दिए हैं। पांच साल से पुराने मामलों की सूची तैयार कर इन्हें शीघ्र निस्तारित करने को कहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने तो यहां तक सुझाव दिया है कि मुकदमों के अंबार को कम करने के लिए बहुत ही इमरजेंसी को छोड़कर न्यायाधीश कार्य दिवस को छुट्टी ना लें। लाखों मामले जहां समझाइश से निपटाए जा सकते हैं या एक ही पेशी में निस्तारित करने की स्थिति में होते हैं जैसे यातायात नियमों का उल्लंघन या मामूली कहासुनी या कुछ इसी तरह के अन्य मामले जो लाखों की संख्या में हैं, जिनका फैसला बिना अगली तारीख दिए हो सकता है। सबसे चिंतनीय यह है कि अदालतों में करीब 90 लाख मामले दीवानी प्रकृति के हैं। एक मोटे अनुमान के अनुसार इनमें से 20 लाख मामलों में तो सम्मन तक जारी नहीं हुए हैं। इसके अलावा बहुत से मामले ऐसे भी हैं जिनकी सुनवाई होते-होते सजा की अवधि तक पूरी हो चुकी है पर अपील आज तक लंबित चल रही है। ऐसे मामलों को सीधे बहस में लेकर निपटाया जा सकता है। जिस तरह से अदालतों में अब कम्प्यूटरीकरण के बाद ऑनलाइन व्यवस्थाएं होने लगी हैं उससे मानवीय श्रम की बचत होने लगी है। निश्चित रुप से इससे काम का अनावश्यक दबाव भी कम होगा। पिछले दिनों जिस तरह से अनावश्यक पीएलआई के प्रति न्यायालय गंभीर हुए हैं और अनावश्यक दावों के प्रति सख्ती का रुख अपनाना आरंभ किया है उससे नई आशा का संचार हुआ है। ऐसे में आशा की जानी चाहिए कि आने वाले समय में न्यायालयों में मुकदमों के अंबार में कमी आएगी।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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