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नरेंद्र मोदी की विलक्षणता

08/07/2019

नरेंद्र मोदी की विलक्षणता

गर पिछले आम चुनाव में देश की जनता ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आशा प्रकट करते हुए भारतीय जनता पार्टी को पहली बार पूर्ण बहुमत देकर सत्ता में पहुंचाया था तो इस बार की जीत नरेंद्र मोदी की नेतृत्व क्षमता में उनके विश्वास का परिणाम है। इस बार के चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी को अब तक के चुनावों में सबसे अधिक सीटें नहीं मिली हैं। पहले तीन आम चुनावों में जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस को इससे अधिक सीटें मिली थीं। उसके बाद इंदिरा गांधी के नेतृत्व में 1971 और 1980 में कांग्रेस को इससे अधिक सीटें मिलीं। बाद में 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या की भर्त्सना स्वरूप लोगों ने कांग्रेस को सत्ता में पहुंचाया। कांग्रेस की वह जीत वास्तव में सिख अलगाववाद के खिलाफ की गई लोगों की तीव्र प्रतिक्रिया थी। लोगों को इंदिरा गांधी की हत्या से इतना क्षोभ हुआ था कि कांग्रेस को अब तक की सबसे बड़ी जीत हासिल हो गई थी। लेकिन कांग्रेस की यह सभी विजय उतनी विलक्षण और ऐतिहासिक नहीं थी जितनी नरेंद्र मोदी की इस बार की विजय है। पहले तीन आम चुनावों में हुई कांग्रेस की विजय जवाहर लाल नेहरू के राजनैतिक पुरुषार्थ का परिणाम नहीं थी। देश में उस समय कांग्रेस को लेकर जो भरोसा था वह महात्मा गांधी के समय पैदा हुआ था। उनके नेतृत्व में कांग्रेस देश के कोने-कोने में फैलकर देश की आशा और आकांक्षा का प्रतीक हो गई थी।

गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने अपनी राजनैतिक और प्रशासकीय कुशलता का जो परिचय दिया, उसी ने राष्ट्रीय राजनीति का अंग बने बिना उनकी छवि को राष्ट्रीय बना दिया। 2014 के चुनाव के समय स्वयं भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भी उनका मार्ग प्रशस्त करने में आनाकानी कर रहा था। लेकिन देश के लोग देश का नेतृत्व करने के लिए एक सक्षम नेतृत्व की बाट जोह रहे थे। मनमोहन सिंह के नेतृत्व की सफलता ने लोगों की यह लालसा और बढ़ा दी थी। परिणाम यह हुआ कि न केवल भारतीय जनता पार्टी को अपनी कमान नरेंद्र मोदी को सौंपनी पड़ी बल्कि देश ने उन्हें कई दशक बाद पूर्ण बहुमत देकर सत्ता में पहुंचा दिया।

जवाहर लाल नेहरू एक लोकप्रिय नेता थे, लेकिन यह लोकप्रियता उन्हें गांधी जी का निकट सहयोगी होने के नाते ही मिली थी। उनके शासनकाल में धीरे-धीरे उसका क्षरण हुआ और उनकी मृत्यु के बाद हुए चौथे चुनाव में कांगे्रस केवल किसी विकल्प के अभाव में सत्ता में लौट आई। राज्यों में अलबत्ता उसका पतन आरंभ हो गया था। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु उसमें अग्रणी थे। इंदिरा गांधी को बांग्लादेश की लड़ाई के कारण एक पराक्रमी नेत्री अवश्य माना गया। लेकिन 71 का चुनाव जीतने के कुछ ही समय बाद गुजरात और बिहार में आंदोलन आरंभ हो गया था, जो उनके नेतृत्व में अनास्था का प्रतीक था। इंदिरा गांधी शासन की यह असफलता ही थी कि आंदोलन को शांत करने के बजाय आपात स्थिति लगाई गई और उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप 1977 में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। विपक्ष तब तक भी कोई विश्वसनीय विकल्प पैदा नहीं कर पाया था। जोड़-बटोरकर जो जनता पार्टी बनी वह नेताओं की महत्वाकांक्षा का शिकार होकर सत्ता खो बैठी।

1980 में सत्ता में इंदिरा गांधी की वापसी विपक्षी नेताओं से हुई लोगों की निराशा का ही परिणाम थी। कुछ ही वर्षों में फिर इंदिरा गांधी के नेतृत्व पर प्रश्नचिह्न लगे। 1984 में उनकी हत्या हो गई। वह जिन परिस्थितियों में हुई थी, उसके कारण लोगों में तीव्र रोष था। उसकी जो भावनात्मक अभिव्यक्ति हुई उसने राजीव गांधी को अनायास सबसे बड़ी जीत दिलाकर सत्ता में पहुंचा दिया। उनकी शासकीय अकुशलता और भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण सत्ता फिर कांग्रेस के हाथ से निकल गई और उसके बाद से 2014 तक किसी दल को पूर्ण बहुमत से सत्ता में पहुंचने का अवसर नहीं मिला। एक लोकप्रिय नेता के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी सत्ता में आए लेकिन तब तक भारतीय जनता पार्टी अपना देशव्यापी संगठन खड़ा नहीं कर पाई थी। भाजपा पहली बार सत्ता में पहुंची थी। वह अकेली ऐसी बड़ी राष्ट्रीय पार्टी थी, जो नेहरू की विचारधारा से भिन्न विचारधारा लेकर पनपी और बढ़ी थी। लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी ने इस संक्रमण को मध्यमार्ग अपनाकर सहज और सरल बनाने की कोशिश की। यह मध्यमार्ग लोगों पर कोई प्रभाव नहीं छोड़ सका और 2004 में सत्ता भाजपा के हाथ से निकल गई। अगले दस वर्ष मनमोहन सिंह की सरकार चली। वे एक दुविधाग्रस्त जनादेश से सत्ता में आए थे।

नरेंद्र मोदी 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी के शासन के दौरान गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे। जल्दी ही उनकी सरकार को गोधरा कांड और उसके बाद हुए भीषण सांप्रदायिक दंगों को झेलना पड़ा। देश के गैर भाजपा राजनीतिक प्रतिष्ठान ने दंगों में उनकी सरकार की संलिप्तता दिखाने की कोशिश की। लेकिन कांग्रेस और कम्युनिस्टों के नेतृत्व में चला यह अभियान नरेंद्र मोदी की छवि नहीं बिगाड़ पाया। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने अपनी राजनैतिक और प्रशासकीय कुशलता का जो परिचय दिया, उसी ने राष्ट्रीय राजनीति का अंग बने बिना उनकी छवि को राष्ट्रीय बना दिया। 2014 के चुनाव के समय स्वयं भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भी उनका मार्ग प्रशस्त करने में आनाकानी कर रहा था। लेकिन देश के लोग देश का नेतृत्व करने के लिए एक सक्षम नेतृत्व की बाट जोह रहे थे। मनमोहन सिंह के नेतृत्व की सफलता ने लोगों की यह लालसा और बढ़ा दी थी। परिणाम यह हुआ कि न केवल भारतीय जनता पार्टी को अपनी कमान नरेंद्र मोदी को सौंपनी पड़ी बल्कि देश ने उन्हें कई दशक बाद पूर्ण बहुमत देकर सत्ता में पहुंचा दिया।

नरेंद्र मोदी नेहरूवादी विचारधारा के ठीक उलट हैं। उनका नामदार और कामदार का नारा हवा में नहीं उछाला गया। राजा की सार्थकता प्रजा का हितैषी होने में है, इस सदा से चली आई भारतीय मान्यता को केंद्र में रखकर ही उन्होंने अपनी शासन शैली विकसित की है। गुजरात में सबसे पहले उन्होंने पानी की कमी से जूझ रहे किसानों की समस्याएं हल की थी। पंचायतों में सर्वानुमति से चुनाव हो, यह परंपरा उन्होंने ही डाली थी। उनके शासन में मुस्लिम समुदाय का वीटो का अधिकार समाप्त हो गया। लेकिन अपनी पार्टी में उनके प्रतिनिधित्व के बिना भी उन्होंने शासन में उनसे कोई भेदभाव नहीं बरता जाने दिया।

2014 तक भी भारतीय जनता पार्टी अपने संगठन का देशव्यापी विस्तार नहीं कर पाई थी। लेकिन नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता देशव्यापी हो गई थी। उसका परिणाम नरेंद्र मोदी के सत्तारोहण के बाद हुए राज्यस्तरीय चुनावों में देखने को मिला। एक के बाद एक राज्य कांग्रेस के हाथ से निकलते चले गए। उससे उत्साहित होकर भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया। राज्यों में भारतीय जनता पार्टी का यह अश्वमेघ अभियान सालभर पहले कर्नाटक में जनता दल सेक्यूलर और कांग्रेस की मिलीजुली सरकार बनने तक आबाद रूप से चला था। छह महीने पहले मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस सत्ता में लौटी। यह सत्ता परिवर्तन लोकतांत्रिक राजनीति में समय-समय पर होने वाले सत्ता परिवर्तनों का ही परिचायक था। लेकिन इन परिवर्तनों के दौरान यह भी स्पष्ट था कि लोगों ने नरेंद्र मोदी की नेतृत्व क्षमता में विश्वास नहीं खोया।

राज्यस्तरीय नेतृत्व के लंबे शासन में आई शिथिलता के कारण उन्हें सत्ता से बाहर किया है। पर विपक्ष ने इन सत्ता परिवर्तनों को नरेंद्र मोदी को सत्ता से बाहर करने का एक अवसर बनाने की कोशिश की। पिछले सालभर एक अत्यंत नकारात्मक राजनैतिक अभियान चलाया गया। उससे नरेंद्र मोदी को बल ही मिला और उन्हें एक अभूतपूर्व जनादेश के द्वारा सत्ता में निरंतरता बनाए रखने का अवसर मिल गया। इस आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को जितनी बड़ी जीत मिली है, उसका आरंभ में स्वयं उसे ही भरोसा नहीं था। विपक्ष ने पिछले सालभर में मोदी शासन की असफलता का जो हल्ला मचाया, उसने मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी में भी कुछ आशंकाएं पैदा कीं। 2004 में शाइनिंग इंडिया के नारे के बाद सत्ता हाथ से निकल जाने का बुरा अनुभव भाजपा के नेताओं को था। नोटबंदी और जीएसटी लागू किए जाने से लोगों को जो कठिनाइयां हुईं, उनका चुनाव में नुकसान न हो यह डर भी था।

विपक्ष ने बेरोजगारी, किसानों की आत्महत्याएं और भ्रष्टाचार के मनगढ़ंत आरोपों के आधार पर जो राजनैतिक तूफान खड़ा करने की कोशिश की, उसने भी आशंकाएं पैदा की होंगी। उसकी झलक सबको लुभाने वाले बजट और अग्रणी जातियों को दिए गए दस प्रतिशत आरक्षण जैसी नीतियों में देखी जा सकती है। लेकिन कुल मिलाकर मोदी सरकार ने अपनी नीतियों की दिशा को लेकर कोई समझौता नहीं किया। स्वयं नरेंद्र मोदी को यह भरोसा था कि उन्होंने देश के साधनहीन लोगों के लिए जो कल्याणकारी योजनाएं शुरू की है और उन्हें सीमित समय में अत्यधिक दक्षता के साथ लागू भी करवा दिया है, उससे आम लोगों में उनके शासन में भरोसा बढ़ा होगा। हमें यह याद रखना चाहिए कि यह योजनाएं कांग्रेस की कल्याणकारी राज्य की लिबरल राजनीति का परिणाम जैसी नहीं थी। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने जो प्रयोग किए थे, उनका विस्तार थीं। नरेंद्र मोदी नेहरूवादी विचारधारा के ठीक उलट हंै। उनका नामदार और कामदार का नारा हवा में नहीं उछाला गया। राजा की सार्थकता प्रजा का हितैषी होने में है, इस सदा से चली आई भारतीय मान्यता को केंद्र में रखकर ही उन्होंने अपनी शासन शैली विकसित की है। गुजरात में सबसे पहले उन्होंने पानी की कमी से जूझ रहे किसानों की समस्याएं हल की थी।

पंचायतों में सर्वानुमति से चुनाव हो, यह परंपरा उन्होंने ही डाली थी। उनके शासन में मुस्लिम समुदाय का वीटो का अधिकार समाप्त हो गया। लेकिन अपनी पार्टी में उनके प्रतिनिधित्व के बिना भी उन्होंने शासन में उनसे कोई भेदभाव नहीं बरता जाने दिया। नरेंद्र मोदी की इस चुनाव में विजय की अब तक जो समीक्षाएं हुई हैं, उनमें उनके शासन के किसी एक पहलू को प्रधानता देने की कोशिश हुई है। कुछ लोग उनकी लोककल्याणकारी योजनाओं को अधिक महत्व देते हैं तो दूसरे लोग बालाकोट में की गई कार्रवाई को। दरअसल उनके पांच वर्ष के शासनकाल में कभी लोगों का विश्वास उनसे डिगा नहीं। लोकतांत्रिक राजनीति में लोगों की अपेक्षाएं बढ़ती हैं और उनके पूरा न होने पर आसानी से असंतोष उभरता है। ऐसा असंतोष उनके शासन से भी हुआ। वह समाज के मुखर वर्गों में दिखाई भी दिया। लेकिन उस असंतोष के बल पर उनके विपक्षी कोई आंदोलन नहीं खड़ा कर पाए। नोटबंदी और जीएसटी से पैदा हुई कठिनाइयां इसका उदाहरण हैं। लोगों ने इन कठिनाइयों को चुपचाप झेल लिया। क्योंकि उन्हें नरेंद्र मोदी के शासन की सदाशयता पर अविश्वास नहीं था। नरेंद्र मोदी की सफलता केवल उनके शासन की नीतियों का परिणाम नहीं है।

नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता उनके भारतीय समाज से एक रूप हो जाने से उपजी है। उन्होंने राजनीति की दशा और दिशा ही बदल दी है। एक झटके में भारतीय राजनीति से सेक्यूलरिज्म हवा हो गया। अब सेक्यूलरिज्म सिद्ध करने के लिए इμतार पार्टियां नहीं दी जाती। भारतीय सभ्यता की दृढ़मूल मान्यताओं के पक्ष में खड़ा होने में किसी को झिझक नहीं होती। राजनीति की दिशा की अधकचरी नकल ने बेचारे राहुल गांधी को जनेऊधारी और शिवभक्त बना दिया। उनका पूरा परिवार सार्वजनिक कर्मकांड में निष्ठा दिखाता घूमता फिरा। लेकिन नरेंद्र मोदी की राजनीति की दिशा कर्मकांड नहीं भारतीय सभ्यता है। कांग्रेस राष्ट्रीय आंदोलन के दिनों में महात्मा गांधी के नेतृत्व के कारण इसी दिशा में जा रही थी। नेहरू ने उसे यूरोपीय विचारों और सभ्यता की ओर मोड़ दिया। अब भारतीय राजनीति फिर वापस अपनी उस दिशा की ओर लौटने लगी है। यही नरेंद्र मोदी की विलक्षणता है।


 
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