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चमत्कार करके मानेंगे सीजेआई

05/10/2019

चमत्कार करके मानेंगे सीजेआई

संजय कुमार झा

भारत के मुख्य न्यायाधीश अयोध्या मामले की सुनवाई में किसी तरह की बाधा स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। भटकाने के तमाम प्रयासों के बीच उन्होंने जिस तरह से सुनवाई को आगे बढ़ाया है, वह काफी कुछ कहता है।

दो दिन बीतते नहीं हैं कि एक नया शिगूफा सामने आता है। बीते गुरुवार को ऐसा ही हुआ जब एक अधिवक्ता ने पांच सदस्यीय संविधान पीठ के सामने कहा कि ‘उसका और निर्मोही अखाड़ा की जमीन पर अधिकार को लेकर झगड़ा है, इसलिए उसे भी सुना जाए।’ उस पर मुख्य न्यायाधीश ने नाराजगी जताते हुए कहा कि ‘आज 32वां दिन है और आप कह रहे हैं कि आपको भी सुनें। क्या हम मेरे रिटायरमेंट तक इसकी सुनवाई करेंगे।’ मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने सभी पक्षकारों को साफ कर दिया कि सुनवाई की तारीख एक दिन भी आगे नहीं बढ़ेगी।
सभी को अपनी बात रखने के लिए 18 अक्टूबर तक समय है। मुसलमान पक्षकारों के वकील राजीव धवन अपनी बहस लगभग पूरी कर चुके हैं। उसके बाद उनकी ओर से मीनाक्षी अरोड़ा ने पुरातात्विक साक्ष्यों पर सवाल खडेÞ किए। उनका कहना था कि गिराए गए ढांचे के नीचे मिले अवशेष किसी ईदगाह के हो सकते हैं। उस पर न्यायमूर्ति अशोक भूषण ने सवाल किया कि मुस्लिम पक्ष का कहना है कि मस्जिद खाली जमीन पर बनायी गयी थी। अब आप कह रही हैं कि उसके नीचे ईदगाह था। अगर ऐसा था तो आपकी याचिका में यह क्यों नहीं था।
मीनाक्षी अरोड़ा का जवाब था कि जब यह केस दायर हुआ तब यह मुद्दा ही नहीं था। इस दौरान पीठ ने उनको कई बार टोका। सीधी सी बात है कि अरोड़ा पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की रिपोर्ट पर बेसिर-पैर के सवाल खड़ी कर रही थीं। अंतत: गुरुवार को राजीव धवन ने कहा कि पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की रिपोर्ट लिखने वाले पर सवाल खड़ी करने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने अदालत का वक्त बरबाद के लिए माफी भी मांगी। इससे पहले जफरयाब जिलानी ने न्यायालय का अच्छा-खासा समय लिया। उनने कहा कि रामचरितमानस और बाल्मिकी रामायण में रामजन्मभूमि पर बने किसी मंदिर की चर्चा नहीं है। उस पर पीठ ने सवाल किया कि किसी ग्रंथ में चर्चा नहीं होने के आधार पर क्या यह मान लेना चाहिए कि वहां मंदिर नहीं था।
उन्होंने पीठ से कहा कि मूल मुद्दा जन्म का वास्तिविक स्थान है। राम का वास्तिविक जन्म स्थान वह नहीं है जो कहा जा रहा है। न्यायमूर्ति एसए बोवडे ने कहा कि पीठ के सामने तीन विकल्प हैं, जिस पर विचार किया जा रहा है। पहला, बाबर ने मंदिर गिराने के बाद मस्जिद का निर्माण कराया। दूसरा, बाबर ने उस जगह मस्जिद बनवाया, जहां कभी मंदिर था। तीसरा, बाबर ने खाली जमीन पर मस्जिद बनवाया। उस पर जिलानी ने कहा कि उनका मानना है कि बाबर ने खाली जमीन पर मस्जिद का निर्माण कराया। अगर वहां कभी मंदिर था, तो वह कब का मिट्टी में मिल चुका था। इस पर जस्टिस बोवडे ने जिलानी से कुछ अहम सवाल किए जैसे कि आइन-ए-अकबरी में बाबरी मस्जिद की चर्चा क्यों नहीं है, जबकि उसमें उस काल की छोटी से छोटी बात दर्ज है।
दूसरा सवाल था कि क्या इस तरह के और भी मस्जिद बादशाह या उसके सेनापति ने बनवाए। साफ है कि जितने तरह के तर्क गढ़े जा रहे हैं, उसका मकसद मामले को सुलझाना नहीं बल्कि उलझाना है। रोज नए तर्क, नयी बातें और नए पक्षकार को सुनने की गुहार से और क्या साबित होता है। वह तो मुख्य न्यायाधीश का कड़ा रुख है कि सुनवाई अभी तक चल रही है, वरना उसे कब का भटकाया जा चुका होता। नियम 24 की चर्चा इसी संदर्भ में की गयी, जिसमें पुरातत्व कमिश्नर को कटघरे में खड़ा करने की बात है। न्यायमूर्ति रंजन गागोई 17 नवंबर को सेवानिवृत्त होने वाले हैं और वह चाहते हैं कि मामला उससे पहले निपट जाए। अगर ऐसा हुआ तो यह सचमुच चमत्कार ही होगा।


 
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