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मराठों की ऐतिहासिक जीत

11/07/2019

मराठों की ऐतिहासिक जीत

सुधीर जोशी

मराठा आरक्षण पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुहर लगा दी है। हालांकि कोर्ट ने सरकार द्वारा दी गई 16 फीसद की सीमा को कम करने का आदेश देते हुए इसे 12-13 फीसद कर दिया।

बॉम्बे उच्च न्यायालय ने 27 जून को अपने फैसले में मराठा समाज को सरकारी नौकरियों में 13 तथा शिक्षा क्षेत्र में 12 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की। राज्य सरकार की ओर मराठा समाज के लिए प्रस्तावित आरक्षण पर न्यायलयीन मुहर लगने को राज्य सरकार की जीत के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन न्यायालय ने आरक्षण प्रतिशत 16 की जगह नौकरियों के लिए 13 तथा शिक्षा के लिए 12 प्रतिशत करने के निर्देश देकर यह भी बता दिया कि न्यायालय मराठा समाज को आरक्षण देने के सरकारी प्रस्ताव का समर्थन तो करता है, लेकिन आरक्षण का प्रतिशत उतना नहीं देना चाहता, जितना सरकार चाहती है।
न्यायालय ने राज्य सरकार की ओर से घोषित किए गए 16 प्रतिशत आरक्षण को कम करके सरकार के सामने पेंच भी खड़ा किया है। संविधान के अनुसार अधिकतम पचास प्रतिशत आरक्षण देने का अधिकार राज्य सरकार को है। उच्च न्यायालय की ओर से मराठा आरक्षण बाबत जो फैसला सुनाया गया है, उस फैसले का राज्य के प्रमुख विरोधी दल कांग्रेस के अलावा अन्य विपक्ष दलों ने भी स्वागत किया है। राज्य की देवेंद्र फडणवीस सरकार ने 1 जुलाई को विधानमंडल में मराठा आरक्षण सुधार विधेयक मंजूर कर लिया, इसलिए अब मराठा समाज को 16 प्रतिशत के स्थान पर शिक्षा में 12 तथा नौकरी में 13 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उक्त सुधारित आरक्षण विधेयक विधिमंडल के दोनों सभागृह के समक्ष रखा, जिसे ध्वनिमत से पारित कर दिया गया। अब तक राज्य में आठ मुख्यमंत्री देने वाले मराठा समाज को आरक्षण देने के बारे में जो फैसला न्यायालय की ओर से किया गया है, उसकी सत्ता पक्ष तथा विपक्ष दोनों ने ही प्रशंसा की है। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री तथा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा है कि मुंबई उच्च न्यायालय द्वारा मराठा आरक्षण को वैध ठहराया जाना मराठा समाज के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। 30 प्रतिशत जनसंख्या वाले मराठा समाज का राज्य की सत्ता में भी दबदबा रहा है। राज्य की 80 प्रतिशत जमीन का मालिकाना हक रखने वाले मराठा समाज से जुड़े लोगों के पास 105 चीनी मिले हैं।
मराठा आरक्षण के मुद्दे पर ऐसे वक्त फैसला आया है, जब राज्य में विधानसभा चुनाव की तैयारियां की जा रही हैं। दबी जुबान से ही सही कुछ विपक्षी नेता कह रहे हैं कि मराठा समाज को आरक्षण देने का सीधा अर्थ यही है कि विधानसभा चुनाव में मराठा समाज का वोट सत्तारूढ़ दल के खेमें में डालने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करना है। राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट के आधार पर मराठ समाज के पिछड़े होने की पुष्टि के बाद राज्य संविधान की धारा 15 (4) तथा 16 (5) के आधार पर राज्य सरकार ने आरक्षण देने का उत्तरदायित्व पूरा किया। एक मराठा, लाख मराठा के मूक नारे के बूते पर मराठा समाज ने जिस तरह की एकता का परिचय दिया, उससे राज्य सरकार को इस बात का एहसास हो गया कि इस समाज की मांग पर गंभीरता से विचार किया जाना जरूरी है।
सामाजिक तथा राजनीतिक क्षेत्र में अच्छा प्रतिनिधित्व रखने वाले मराठा समाज के अधिकांश परिवार आर्थिक रूप से सबल नहीं हैं, इसलिए इस समाज को आर्थिक तथा शैक्षणिक क्षेत्र के मुख्य प्रवाह में लाना बहुत जरूरी है। मराठा समाज को आरक्षण देने के बाद धनगर, मुस्लिम समाज की ओर से भी आरक्षण देने की जोरदार मांग की जा रही है। आर्थिक रूप से विपन्न ब्राह्मण समाज को भी आरक्षण का लाभ मिले, इस मांग को लेकर भी पूर्व में प्रदर्शन हो चुके हैं, अब देखना यह है कि विधानसभा चुनाव से पहले किन-किन समाज की ओर से आरक्षण दिए जाने की मांग जोर पकड़ती है। सन 1980 से मराठा समाज आरक्षण की मांग उठा रहा है। आखिरकार 39 साल की प्रतीक्षा के बाद मांग पूरी होने पर पूरा मराठा समुदाय आनंदित हो उठा है।
पिछड़ा वर्ग के अंतर्गत आने वाले मराठा समाज को आरक्षण देने का समर्थन शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने भी किया है। इसी क्रम में मंत्री एकनाथ शिंदे के माध्यम से मराठा क्रांति मोर्चा के समन्वयक विनोद पाटिल, मराठा क्रांति मोर्चा के वकील तथा अन्य पदाधिकारियों ने शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे से मुलाकात करके उनका आभार माना। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सुधारित मराठा आरक्षण विधेयक विधानमंडल के दोनों सदनों में पेश करके फडणवीस सरकार ने मराठा समाज का दिल जीत लिया है, अब देखना यह है कि मराठा समाज राज्य सरकार के इस फैसले का उत्तर किस रूप में देता है।


 
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