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कुछ अलग हैं सातवें आर्थिक सर्वेक्षण के मायने

07/06/2019

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
इसबार का इकोनॉमिक सर्वे कई मायनों में अलग स्थान रखता है। खासतौर से देश के सामने उभर रही आर्थिक चुनौतियों और बेरोजगारी की समस्या को देखते हुए आर्थिक सर्वेक्षण की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। हालिया आम चुनावों में राजनीतिक दलों द्वारा बेरोजगारी को प्रमुखता से मुद्दा बनाया गया और इसमें कोई दो राय भी नहीं कि बेराजगारी के जिस तरह के आंकड़े सामने आ रहे हैं, वह वास्तव में चिंतनीय है। 
केन्द्र सरकार ने देश में सातवें आर्थिक सर्वेक्षण की आरंभिक तैयारियां पूरी कर ली है और सर्वेक्षण के लिए देशभर में प्रशिक्षण का काम जारी है। माना जा रहा है कि अगले छह माह में देश का समग्र आर्थिक सर्वेक्षण का काम पूरा कर लिया जाएगा। इस आर्थिक सर्वेक्षण को यदि रोजगार सर्वेक्षण नाम दिया जाए तो अधिक सामयिक लगता है। दरअसल, केन्द्र सरकार ने आर्थिक सर्वेक्षण मेें रोजगार के आंकड़े जुटाने का खास निर्णय लिया है। गली-कूचे की चाय-पान की दुकानों से लेकर पटरी पर बैठने वालों तक को सर्वेक्षण के दायरे में लाने का निर्णय किया गया है। इस सर्वेक्षण में देशभर के 27 करोड़ परिवारों को शामिल किया जाएगा। इसके साथ ही 7 करोड़ अन्य स्थापित लोगों को भी इस दायरें में लाने का निर्णय किया गया है। सरकार ने इस तरह के सर्वेक्षण प्रत्येक तीसरे साल कराने का निर्णय किया है। 
देखा जाए तो रोजगार के मामले पर चाहे किसी भी दल की सरकार हो, वह विपक्ष के निशाने में रहती आई है। पिछले नवंबर-दिसंबर में राजस्थान सहित तीन राज्यों और हाल ही में हुए लोकसभा के चुनावों में पक्ष-विपक्ष के बीच बेरोजगारी का मुद्दा प्रमुखता से उठा और बेरोजगारों को भत्ता देने सहित देश में करीब 21 लाख पद खाली होने के बावजूद नहीं भरे जाने और जीएसटी व नोटबंदी के कारण रोजगार के अवसर घटने को लेकर काफी विवाद रहा है। सभी दलों ने बेरोजगारी पर चिंता भी जताई और अपने घोषणा पत्रों व वादों के अनुसार युवाओं को अपनी और आकर्षित करने के प्रयास भी किए। खैर अब चुनाव परिणाम आ चुके हैं और केंद्र में भारी बहुमत से दोबारा मोदी सरकार है। यह सही है कि देश में बढ़ती बेरोजगारी चिंता का कारण भी है। बेरोजगारी भत्ता इसका कोई समाधान भी नहीं हो सकता। पर रोजगार के अवसर पैदा करना सरकार का दायित्व है। 
दरअसल, आर्थिक सर्वेक्षेण के माध्यम से सरकार स्पष्ट व सही डाटा प्राप्त करना चाहती है। यही कारण है कि इस साल सर्वेक्षण का दायरा बढ़ाया गया है। हालांकि यह सातवां आर्थिक सर्वेक्षण होगा पर इसका सबसे बड़ा लाभ सरकार के सामने देशवासियों की आर्थिक तस्वीर सामने आ जाएगी। इसी को ध्यान में रखते हुए सर्वेक्षण में ठेला, रेहड़ी, पटरी वाले दुकानदारों सहित देश के छोटे-बड़े सभी प्रतिष्ठानों, इनमें काम करने वाले कार्मिकों, आर्थिक गतिविधियों का सर्वेक्षण किया जाएगा। इससे देश के सामने असली तस्वीर आ सकेगी और उसी तस्वीर के आधार पर भावी रूपेरखा तैयार हो सकेगी। 
आर्थिक सर्वेक्षण का काम आरंभ हो चुका है। इसको लेकर केन्द्र सरकार ने दो कमेटियां भी बना दी हैं। आर्थिक सर्वेक्षण में सही जानकारी और सही आंकड़े आना जरूरी है। क्योंकि सर्वेक्षण से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर ही आर्थिक व सामाजिक विकास का रोडमेप तैयार किया जा सकेगा। देखा जाए तो जो आंकड़े सरकार के पास आते हैं, उन्हीं आंकड़ों के आधार पर भावी योजना तैयार की जाती है। यह माना जाना चाहिए कि इस सर्वेक्षण से देश की आर्थिक स्थिति खासतौर से परिवार की प्रति व्यक्ति आय, रोजगार की स्थिति, संगठित और असंगठित क्षेत्र में रोजगार के अवसर, गरीबी रेखा से नीचे और गरीबी रेखा के आसपास वाले परिवारोें की स्थिति, रोजगार की संभावनाएं, आधारभूत सुविधाओं की स्थिति और उनकी उपलब्धता, कृषि और गैर कृषि क्षेत्र में रोजगार, संसाधनों की उपलब्धता आदि की जानकारी संग्रहित हो सकेगी। इन आंकड़ोें का विश्लेषण कर सरकार को सामाजिक आर्थिक विकास की योजनाओें का फीडबेक और धरातलीय स्थिति का पता चल सकेगा और उसी के आधार पर सरकार को विकास का रोडमेप बनाने में सहायता मिल सकेगी। इस सर्वेक्षण से प्राप्त आंकड़ों का समय रहते विश्लेषण करने के साथ ही रोजगार की संभावनाओं वाले क्षेत्रों को चिन्हित कर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के ठोस प्रयास करने होंगे।
एक बात साफ हो जानी चाहिए कि सरकारी नौकरी का मोह छोड़ना होगा। इस मोह को छुड़ाने के लिए सरकार को स्वरोजगार या परंपरागत या लघु उद्योगों को बढ़ावा देना होगा ताकि स्थानीय स्तर पर ही रोजगार के बेहतर अवसर उपलब्ध हो सके। सर्वेक्षण से सरकार के सामने 70 करोड़ परिवारों की आर्थिक स्थिति सामने आने के बाद  उपलब्ध संसाधनों की जानकारी के साथ ही आधारभूत सुविधाओं की तस्वीर भी सामने होंगी। इसके साथ ही लोगों की आय और आजीविका की तस्वीर सामने होगी। गरीबी रेखा के वास्तविक आंकड़े सामने होंगे तो सरकार को लोगों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने, गरीबी रेखा के नीचे के लोगों को गरीबी रेखा से उपर लाने, पानी-बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन आदि की सुविधाओं के विस्तार में भी सहायता मिल सकेगी। ऐसे में यह आर्थिक सर्वेक्षण महत्वपूर्ण हो जाता है। 
सर्वेक्षण को विकास का रोडमेप बनाने के लिए सर्वेक्षण करने वालों और सभी देशवासियोें को सही और तथ्यात्मक जानकारी देने व लेने का दायित्व बन जाता है। क्योंकि यह साफ है कि अगला सर्वेक्षण तीन साल बाद होगा, हांलाकि इससे पहले पांच साल में सर्वेक्षण की व्यवस्था होने के बावजूद अभी तक आजादी के बाद आर्थिक सर्वेक्षण छह बार ही हुए हैं। ऐसे में बीपीएल, एपीएल, आवास, रोजगार, उर्जा, काम-धंधे, आय आदि की सूचना जितनी सही होगी उतना ही सही भावी रोडमेप बन सकेगा इसलिए सर्वेक्षण की सफलता के लिए सभी की भागीदारी और अहम जिम्मेदारी हो जाती है। माना जाना चाहिए कि सर्वेक्षण के आंकड़े आते ही सरकारी स्तर पर विश्लेषण से लेकर उसके आधार पर आर्थिक विकास की व्यावहारिक योजनाओं को धरातल पर लाना होगा ताकि लोगों के जीवन स्तर में सुधार हो और देश के प्रत्येक नागरिक के पास सम्मानजनक जीवन यापन के साधन हो।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


 
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