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संवेदनहीन सभ्यता के सबूत शरणार्थी

18/06/2019

(विश्व शरणार्थी  दिवस, 20 जून पर विशेष)

डॉ. राकेश राणा
रीबी, अकाल, गृहयुद्ध और बिगड़ते परिस्थितिकीय संतुलन के चलते पूरे विश्व में शरणार्थियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। अफ्रीका और एशिया महाद्वीप में शरणार्थियों की बड़ी संख्या निवास करती है। परिणामस्वरुप आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष और तेज हो रहे हैं। इस समय पूरी दुनिया में करीब  6.5 करोड़ बेघर लोग शरण मांगने को मजबूर हैं। संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थी मामलों की संस्था के हाई कमिश्नर फिलिपोग्रांडी का बयान कि 'अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिहाज से ये अभी भी दिल दुखाने वाली असफलता है। ऐसा लगता है कि दुनिया शांति कायम करने में असफल है। लोगों का जबरन घर छोड़ने को मजबूर होना उन युद्धों का प्रतीक है जो कभी खत्म नहीं होते।' दक्षिणी सूडान में हिंसा भड़कने पर साढ़े तीन लाख लोग पड़ोसी देश युगांडा में चले गए। सीरिया से भी दो लाख युगांडा पहुंच गए। 
दुनियाभर में करोड़ों की संख्या में लोग जबरन विस्थापित होते हैं। यह एक विश्व संकट बन चुका है। इस संकट का सामना करने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को साझा प्रयास करने की जरूरत है। इसके स्थायी समाधान के लिए अंतरराष्ट्रीय शरणार्थी कानून बनना चाहिए। मानवाधिकर और मानवीय कानूनों के सिद्धांतों से निर्देशित स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी होना चाहिए। शरणार्थी मानवीय सभ्यता पर एक बड़ा सवालिया निशान हैं। एक संवेदनहीन सभ्यता के सबूत हैं।
सर्वप्रथम 1969 में 'अफ्रीका यूनिटी कन्वेंशन' के संगठन में शरणार्थी की परिभाषा तय की गयी। उसके अनुसार 'हर व्यक्ति जो अपने मूल राष्ट्र में बाह्य आधिपत्य, विदेशी शासन या सार्वजनिक शांति को बुरी तरह भंग हो जाने की घटनाओं के कारण अपने देश से बाहर शरण ले वह शरणार्थी है।' यह परिभाषा सभी शरणार्थियों को अपनी परिधि में समेटने में सक्षम नहीं है। शरणार्थियों के ज्यादातर संघर्ष तो आंतरिक ही हैं। उनमें भी बड़ी फौज पर्यावरणीय शरणार्थियों की है। पर्यावरण विशेषज्ञ 'अल्थर वोस्टिंग' का कहना है कि जितनी संख्या शरणार्थियों की है उससे कहीं ज्यादा पर्यावरणीय शरणार्थियों की संख्या है। विशेषज्ञों का एक अनुमान है कि विश्व में जितने शरणार्थी पहचान किये गये हैं उससे कहीं अधिक शरणार्थी बिना पहचान वाले हैं। जो लोग अपने राष्ट्र की सीमाओं के अंदर ही भूख, गरीबी, अभाव, परिस्थितिकीय असंतुलन के कारण शरणार्थियों-सा अमानवीय जीवन जीने को अभिशप्त हैं। शरणार्थियों की कई श्रेणियां हैं, यथा- आंतरिक शरणार्थी, वाह्य शरणार्थी, धार्मिक शरणार्थी, आर्थिक शरणार्थी और पर्यावरणीय शरणार्थी। अध्ययन बताते हैं कि शरणार्थी समस्या की जड़ में मुख्य रूप से असुरक्षा है। यह सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक या पर्यावरणीय कैसी भी हो सकती है। इसमें पर्यावरणीय कारक प्रमुख रूप से सामने आये हैं। जिसका परिणाम 'एन्वारमेंन्टल रिफ्यूजीज' हैं। इसका कारण परिस्थितिकीय असंतुलन है जो जंगलों के कटाव, भूमिक्षरण, जलमृदा व वायु प्रदूषण, जैव विविधता का विनाश, समुद्रीय संसाधनों का विनाश, प्राकृतिक आपदाओं का परिणाम है। लोग अपने स्थायी ठिकानों से संघर्ष, हिंसा, युद्ध से बचकर सुरक्षा के लिए भाग रहे हैं। तो कुछ किसी अन्य वजहों से कुछ लोग गरीबी से तंग आकर बेहतर हालात की आशा में निकलते हैं। लोग जीवन अस्तित्व और बेहतर हालात की उम्मीद में भटक रहे हैं। शरणार्थियों और प्रवासियों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है। शरणार्थियों, प्रवासियों और व्यक्तिगत कारणों की वजह से शरण मांगने वालों की बहुत बड़ी संख्या कुछ देशों में ही रहने को मजबूर है। इस बड़ी संख्या के विस्थापित होने से बहुत-सी जटिलताएं पैदा हो रही हैं। इनके व्यापक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव हो रहे हैं। शरणार्थियों की समस्या को समझने के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया को सहानुभूति वाली और दरियादिली वाली होनी चाहिए। इतनी बड़ी संख्या में शरणार्थियों की स्थिति और जरूरतों को समझने और उनकी मदद करने के लिए विभिन्न साझीदारों को मिल-जुलकर तालमेल के साथ काम करना होगा। इस संकट का सामना करने के लिए संबद्ध पक्षों से मदद लेना होगा। यूएनएचसीआर ने अपनी सालाना ग्लोबल ट्रेंड्स रिपोर्ट में बताया कि 2017 के अंत तक 6.85 करोड़ लोग विस्थापित हुए। इनमें संकट और अत्याचार के कारण अपना देश छोड़कर भागने वाले शरणार्थियों की संख्या 2.54 करोड़ है। इस मामले में म्यांमार के रोहिंग्या समुदाय का लगातार अपने देश से निकाला जाना हाल के वर्षों की बहुत संवेदनहीन घटना है।
दुनिया में हर दिन करीब 44,500 लोगों के विस्थापित होने के संकेत मिलते हैं। दुनिया में हर 110वां व्यक्ति विस्थापित होता है। यूनीसेफ की एक टिप्पणी बताती है कि '21 वीं सदी में दुनिया में गरीबी में रह रहे लोगों की बड़ी तादाद बच्चों और महिलाओं की है। युद्धों में मरने वालों में भी बच्चे और औरतें ज्यादा हैं। युद्धों और पर्यावरण की मार से बेघर हुए शरणार्थियों में बच्चे और महिलायें ही सर्वाधिक हैं। शरणार्थियों के साथ युद्धग्रस्त क्षेत्रों में बलात्कार को एक योजनाबद्ध तरीके से लड़ाई के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया है। इन्हीं शरणार्थियों में से हर साल दुनियाभर से 5 से 15 साल की करीब 20 लाख लड़कियों को वेश्यावृत्ति में झोंक दिया जाता है।' शरणार्थियों की विश्व में लगातार बढ़ती संख्या इसे एक अंतरराष्ट्रीय समस्या बना रही है। साथ ही अनेक समस्याएं पैदा कर रही है। विशेष तौर से उन विकासशील देशों के लिए तो यह अभिशाप बन रही है जो अपनी घरेलू समस्याओं से पहले से ही जूझ रहे हैं। शरणार्थियों की बड़ी संख्या ऐसे विकासशील देशों पर भारी बोझ है जहां आधारभूत ढांचा पहले ही कमजोर है। इसलिए समय रहते इस गंभीर समस्या पर वैश्विक पहल जरूरी है। 
(लेखक युवा समाजशास्त्री हैं।)


 
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