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मप्र का सियासी नाटक

31/08/2019

डॉ. अजय खेमरिया
क्या मध्य प्रदेश में एकबार फिर से सिंधिया राजघराने के परकोटे में कांग्रेस सरकार के पतन की पटकथा उसी तरह लिखी जा रही है, जैसे 1967 में तब की राजमाता और कांग्रेस नेत्री राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने डीपी मिश्रा की जमीन हिलाकर देश भर की सियासत में हलचल मचा दी थी और देश में पहली संविद सरकार बनाने का राजनीतिक इतिहास रचा था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार 2019 में राजमाता विजयाराजे सिंधिया के प्रपौत्र और कांग्रेस महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बनाए जाने से नाराज होकर कांग्रेस की कमलनाथ सरकार को जमींदोज कर सकते हैं। उन्होंने कथित रूप से पार्टी को अल्टीमेटम भी दे दिया है, ऐसा इन रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि सिंधिया 30 कांग्रेस विधायकों को लेकर बीजेपी में शामिल हो सकते हैं। हालांकि दो दिनों पहले ही उन्होंने उज्जैन में इन खबरों का खंडन किया था कि वे बीजेपी ज्वाइन करने जा रहे हैं। लेकिन हाल के दिनों में मप्र की कांग्रेस की सियासत में घटनाक्रम तेजी से बदला है। प्रदेश प्रभारी दीपक बाबरिया ने इसी महीने पीसीसी चीफ पर निर्णय का बयान दिया और मुख्यमंत्री कमलनाथ भी दिल्ली पहुंचे। सीएम के इस दौरे को नए प्रदेश अध्यक्ष के मनोनयन के साथ जोड़ा जा रहा है। इससे पहले दीपक बाबरिया प्रदेश के नेताओं से व्यापक रायशुमारी कर अपनी रिपोर्ट आलाकमान को सौंप चुके हैं लेकिन मामला इतने भर का नहीं है।
असल कहानी तो यह है कि मप्र के सीएम कमलनाथ और पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह किसी सूरत में नहीं चाहते कि सिंधिया को पीसीसी को कमान सौंपी जाये। दोनों के बीच इस एक मुद्दे पर आपसी समझ और सहमति जगजाहिर है क्योंकि सिंधिया का पीसीसी चीफ बनने का सीधा मतलब है मप्र में सीएम, दिग्गी राजा के बाद सत्ता का तीसरा शक्ति केंद्र स्थापित होना। पहले से ही जुगाड़ के बहुमत पर टिकी कमलनाथ सरकार के लिये यह चुनौती से कम नहीं होगा। इसीलिए दो दिनों पहले अचानक दिग्विजय सिंह सक्रिय हुए हैं। उन्होंने अपने ढेड़ दर्जन सीनियर विधायकों के साथ पूर्व सीएम अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह के भोपाल आवास पर बैठक की। रिश्ते में दिग्विजय सिंह के भांजे दामाद अजय सिंह को पीसीसी चीफ की दौड़ में शामिल कराया जाना, असल में कमलनाथ और दिग्गीराजा की जुगलबंदी ही है। मुख्यमंत्री पहले ही प्रदेश में आदिवासी अध्यक्ष का कार्ड ओपन कर गृहमंत्री बाला बच्चन का नाम आगे किये हुए। जाहिर है सिंधिया को रोकने के लिये मप्र कांग्रेस में उनकी व्यापक घेराबंदी की गई है। इधर कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटने के बाद से ही यह खबर सोशल और प्रिंट मीडिया पर वायरल है कि सिंधिया बीजेपी में जाने वाले हैं। उनकी बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से बैठक का दावा भी इन खबरों में किया जा रहा है। करीब 20 दिनों बाद सिंधिया ने उज्जैन में इसका खंडन किया लेकिन बहुत ही सतही तौर पर।
अब प्रश्न यह है कि क्या वाकई सिंधिया मप्र में कमलनाथ सरकार को जमीन पर लाने की स्थिति में हैं? जिन 30 विधायकों का दावा किया जा रहा है उनकी वस्तुस्थिति वैसी नहीं है। सिंधिया के सर्वाधिक विधायक ग्वालियर चंबल में हैं जहां कुल सीटों की संख्या 34 है। इनमें से 25 पर कांग्रेस के विधायक हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि ये सभी विधायक सिंधिया के प्रति वफादार हों। 25 में से 9 विधायक तो दिग्विजय सिंह कोटे से आते हैं और इनका सिंधिया से सीधा टकराव है। लहार विधायक डॉ. गोविन्द सिंह, केपी सिंह पिछोर, जयवर्धन सिंह राधौगढ़, लक्ष्मण सिंह चाचौड़ा, गोपाल सिंह चंदेरी, घनश्याम सिंह सेंवढ़ा, जंडेल सिंह श्योपुर, प्रवीण पाठक ग्वालियर साउथ, एडल सिंह सुमावली ऐसे नाम हैं जो घोषित रूप से दिग्गी राजा के करीब हैं। इनके अलावा भांडेर से रक्षा संतराम पर किसी की छाप नहीं है। भितरवार से लाखन सिंह, पोहरी से सुरेश धाकड़, करैरा से जसवंत जाटव अपैक्स बैंक अध्यक्ष और घुर सिंधिया विरोधी अशोक सिंह के सम्पर्क और अतिशय प्रभाव में माने जाते हैं। जाहिर है अंचल के 25 में से 13 कांग्रेस विधायक सिंधिया समर्थक नहीं है। इनके अलावा जो विधायक हैं वे अधिकतर पहली बार चुनकर आये हैं और सरकार के परफॉर्मेंस से इनकी हालत अपने-अपने क्षेत्रों में बेहद पतली हो चुकी है।
अंचल से बाहर की बात करें तो सांवेर इंदौर से तुलसी सिलावट, सुर्खी सागर से गोविंद राजपूत, वदनावर धार से राज्यवर्धन, दत्तीगांव सांची रायसेन से प्रभुराम चौधरी की गिनती सिंधिया समर्थकों में होती है लेकिन इनमें से प्रभुराम, गोविंद राजपूत, तुलसी सिलावट कैबिनेट मंत्री हैं। समझा जा सकता है कि दलबदल अगर होगा तो इन सभी की सदस्यता जायेगी और लोकसभा परिणाम बताते हैं कि इन सभी के इलाकों में पार्टी का सफाया हो चुका है। जाहिर है 30 विधायकों के साथ दलबदल की मीडिया रिपोर्ट्स जमीनी हकीकत से काफी दूर है। यह सही है कि सिंधिया लोकप्रिय चेहरा हैं लेकिन जमीनी स्तर पर उनका मामला दिग्गी राजा की तरह मजबूत नजर नहीं आता है। इस तथ्य को भी ध्यान रखना होगा कि कोई भी कांग्रेस विधायक इस वक्त चुनाव का सामना करने की स्थिति में नहीं है। जिन मन्त्रियों ने सिंधिया को अध्यक्ष बनाने का अभियान चला रखा है, उनके विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी अभी हाल ही में 50 हजार से भी ज्यादा वोटों से पराजित हुई है। खुद सिंधिया की चमत्कारी पराजय मप्र की जनता के मूड का इंडिकेटर मानी जा सकती है।
अब प्रश्न यह है कि 1967 में जिस तरह राजमाता ने राजनीति की चाणक्य कहे जाने वाले डीपी मिश्रा की सरकार को अपदस्थ किया था, क्या वही हालात आज उनके प्रपौत्र ज्योतिरादित्य के सामने है? गहराई से देखा जाए तो राजमाता ने कभी पद की अभिलाषा से राजनीति नहीं की। वह 36 कांग्रेस विधायकों को लेकर पार्टी से बाहर आई थीं, उनके मुद्दे जनहित से जुड़े थे। तब के छात्र आंदोलन में हुआ बर्बर गोलीकांड एक मुद्दा था लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ इस समय ऐसा टैग नहीं लगा है, वे स्वयं चुनाव हार चुके हैं और पार्टी के साथ उनका गतिरोध पद को लेकर है। राजमाता सिंधिया के साथ उनके वफादार अनुयायियों की फौज थी जो दलीय सीमाओं और सत्ता की चमक-धमक से दूर थे। ऐसे समर्पित अनुयायियों की फौज सिंधिया के पास नहीं है। अगर वे कांग्रेस छोड़ने का निर्णय करते हैं तो इस बात की संभावना है कि कमलनाथ सरकार के मामले में मोदी-शाह की जोड़ी कर्नाटक का प्रयोग नहीं दोहराएगी और नए चुनाव ही मप्र में कराए जायेंगे। इन परिस्थितियों में सिंधिया समर्थक विधायक क्या जनता के बीच जाने की हिम्मत दिखा पाएंगे? इसकी संभावना न के बराबर है।
एक दूसरा पहलू यह भी है कि अगर सिंधिया अपने समर्थकों के साथ बीजेपी में आते भी हैं तो उनके समर्थकों को टिकट के मामले में बीजेपी कैडर कैसे समन्वित कर पायेगा। बीजेपी में आये दूसरे दलों के नेताओं का अनुभव बहुत ही दुखान्तकारी रहा है। मप्र में कर्नाटक मॉडल पर सरकार बनाना बीजेपी की कोई मजबूरी नहीं है। शिवराज सिंह आज भी प्रदेश के सबसे लोकप्रिय चेहरा हैं और वह चुनाव हारने के बावजूद मप्र में मुख्यमंत्री कमलनाथ से ज्यादा सक्रिय हैं। सच्चाई यह है कि मप्र में कांग्रेस ने बीजेपी को नहीं हराया है बल्कि खुद बीजेपी, बीजेपी से ही पराजित हुई है। प्रदेश में बीजेपी को वोट भी सत्ताधारी दल से ज्यादा मिले है। इसलिए बीजेपी के उत्तरी अंचल में पार्टी का मूल कैडर सिंधिया को आसानी से पार्टी में पचा पायेगा, इसकी संभावना बहुत ही कम है।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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