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प्रेरणा ऐप से प्रेरित नहींं शिक्षक

09/10/2019

प्रेरणा ऐप से प्रेरित नहींं शिक्षक

सौरभ राय

त्तर प्रदेश के परिषदीय स्कूलों में अधिक पारदर्शिता लाने के दावे के साथ राज्य सरकार प्रेरणा एप नाम से आॅनलाइन सॉμटवेयर लेकर आयी है। दावा है कि इस ऐप की मदद से शिक्षकों, शिक्षामित्रों, अनुदेशकों व अनुचरों के अवकाश निश्चित समय में स्वीकृत हुआ करेंगे। इसके अतिरिक्त अन्य कई प्रकार के मामलों में यह सॉμटवेयर मदद करेगा। सरकार जो भी दावा करे, इसके विपरीत बड़ी संख्या में शिक्षकों के लिए यह नया ऐप वास्तव में मुसीबत की तरह लग रहा है। खास कर तैनाती वाली जगह से शिक्षकों को दिन में अलग-अलग समय पर छात्रों और अन्य अध्यापकों के साथ सेल्फी लेकर भेजने की व्यवस्था उन्हें परेशान करने वाली है। गजब है कि हर दूसरे के हाथ आइफोन होने के दौर में अधिकतर शिक्षक ऐसे फोन चलाने में अपने को अनजान भी बताने लगे हैं।

ऐप के जरिये उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए तीन विकल्प उपलब्ध कराये गये हैं। शिक्षक और कर्मचारी ऐप के जरिए स्वयं, अपने साथ दूसरे शिक्षक तथा समस्त शिक्षकों की उपस्थिति दर्ज करा सकेंगे। मूल बात यह है कि सभी विकल्प में एक बात जरूर होगी, वह होगी फोटो लेने की जगह।

प्राथमिक शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. दिनेश चंद्र शर्मा तो ऐप की व्यवस्था से इतने नाराज हैं कि वे इसे डंडे के बल पर काम लेने की तरह बता रहे हैं। वे इस बात से भी आशंकित हैं कि अध्यापकों के भेजे सेल्फी वाले फोटो का दुरुपयोग हो सकता है। परिषदीय स्कूलों के लिए प्रेरणा ऐप सरकार के लिए किस कदर खास है, इसका अंदाज इसी बात से लग जाता है कि इसे स्वयं मुख्यमंत्री ने लॉन्च किया। शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों के लिए यह व्यवस्था पूरे प्रदेश में 4 सितम्बर यानी, शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा लागू की गई। अवकाश के लिए भी शिक्षक अब प्रेरणा ऐप के जरिए ही आवेदन करेंगे। जब तक शिक्षक इस सिस्टम से पूरी तरह दक्ष नहीं हो जाते, आॅनलाइन के साथ आॅफलाइन आवेदन की व्यवस्था भी एक अक्टूबर तक जारी रहेगी।

चर्चा है कि मोबाइल ऐप के जरिए शिक्षकों को विद्यालय में अपनी उपस्थिति सुनिश्चित कराना सबसे बड़ी मुसीबत है। उत्तर प्रदेशीय जूनियर हाईस्कूल (पूर्व माध्यमिक) शिक्षक संघ के अध्यक्ष योगेश त्यागी और महामंत्री नरेश कुमार कौशिक ने बेसिक शिक्षा मंत्री को पत्र लिखकर इस व्यस्था की खामियों की ओर ध्यान दिलाया है। उनका कहना है कि केवल चार से पांच प्रतिशत लापरवाह शिक्षकों के कारण प्रदेशभर के अध्यापक समुदाय की निष्ठा पर शक करना उचित नहीं है। दोनों अध्यापक नेता लाखों छात्राओं और बड़ी संख्या में महिला अध्याकों की तस्वीर अपलोड करने को उनकी निजता का हनन करार देते हैं। वे याद दिलाते हैं कि बढ़ते साइबर क्राइम के दौर में यह ठीक नहीं होगा। फैजाबाद- गोरखपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से विधान परिषद सदस्य देवेन्द्र प्रताप सिंह ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर इसी तरह की चिंता से अवगत कराया है। भय के बीच अध्यापकों से कार्य कराए जाने से शिक्षण के स्तर में गिरावट की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया जा रहा है।

आश्वस्त कर रहा है प्रशासन

आइएएस अधिकारी विजय किरण आनंद नये बने बेसिक शिक्षा महानिदेशालय के पहले प्रमुख होंगे। इस नियुक्ति के पहले तमाम विसंगतियों पर बेसिक शिक्षा विभाग के विशेष सचिव, मध्याह्न भोजन प्राधिकरण के निदेशक, सर्व शिक्षा अभियान परियोजना निदेशक विजय किरण आनन्द ने खुलकर बातचीत की। उन्होंने इसे शिक्षा जगत में परिवर्तन हेतु आवश्यक माना। विजय किरण आनन्द इस बात से सहमत नही हैं कि अध्यापक इस सुगम प्रेरण ऐप का विरोध कर रहे हंै। सिस्टम अपडेट होने में थोड़ा समय लग रहा है। जहां तक 50 वर्ष से अधिक उम्र के अध्यापकों को स्मार्टफोन चलाना नही आने की बात है, तो जिलों और विकास खण्डों में प्रशिक्षण कार्य पहले से चल रहा है। यह आगे भी चलता रहेगा। शिक्षकों में इस ऐप को लेकर व्याप्त भय के बारे में सर्व शिक्षा अभियान परियोजना निदेशक कहते हैं कि यह कोई दण्डात्मक प्रक्रिया नही है। न ही इसमें कोई जवाबदेही तय कर रहे हैं। अध्यापकों के सहयोग, जैसे उनके मेडिकल, छुट्टी और अन्य समस्याओं के समाधान के लिए इस ऐप को लांच किया गया है।

योगेश त्यागी और नरेश कुमार कौशिक लगे हाथ देश भर में शिक्षकों से गैर शिक्षण कार्य कराने का जिक्र भी करते हैं। दोनों याद दिलाते हैं कि भारत के निर्वाचन आयोग ने तो चुनाव प्रक्रिया में शिक्षकों के योगदान को विशेष तौर पर सराहा है। वे कहते हैं कि निर्वाचन सहित शिक्षकों से कुल 81 कार्य लिए जाते हैं। वे इस बात पर जोर देते हैं कि तकनीक का उपयोग करना ही है, तो शिक्षा विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार कम करने पर ध्यान देना चाहिए। वैसे ऐप संबंधी आदेश में कहा गया है कि महिला शिक्षकों के लिए पुरुष अध्यापकों के साथ फोटोग्राफ अपलोड करने की अनिवार्यता नहीं होगी। शिक्षकों को विद्यालय में सुबह प्रार्थना के समय, दोपहर के भोजन के समय और अवकाश के समय छात्रों के समूह फोटोग्राफ अपलोड करने होंगे। आॅफलाइन मोड में भी फोटो ली जा सकेगी, जो कि नेटवर्क उपलब्ध होने पर सर्वर के जरिए स्वत: अपलोड हो जाएगी।

चिकित्सा, मातृत्व और बाल्य देखभाल अवकाशों के आॅनलाइन आवेदन के साथ चिकित्सा प्रमाण पत्र अपलोड करने का विकल्प भी रखा गया है। आगे ये आवेदन दो दिन के अन्दर ही निपटाने की व्यवस्था है। ऐसा नहीं होने पर आवेदन स्वत: स्वीकृत माना जाएगा। इस ऐप के माध्यम से मध्याह्न भोजन योजना के लिए बच्चों की सही संख्या भी ट्रेक की जा सकेगी। विद्यालय के शिक्षकों को प्रेरणा ऐप के माध्यम से बच्चों की संख्या और फोटो अपलोड करने होगें। इसी के आधार पर मध्याह्न भोजन की धनराशि जारी की जा सकेगी। इस ऐप में कई तरह के मॉड्यूल के जरिए विद्यालय में सम्बन्धित बुनियादी संसाधनों जैसे पानी, ब्लैकबोर्ड, शौचालय, विकास योजना, बिजली, साबुन, सफाई, खेल का मैदान आदि सुविधाओं की मासिक सूचना देनी होगी। निरीक्षण अधिकारियों को अपनी रिपोर्ट भी करनी होगी।

बहरहाल, अन्य कई शर्तों और सुविधाओं वाले ऐप की प्रशंसा करते अधिकारी थकते नहीं। दूसरी ओर ऐप के लांच होते ही शिक्षकों के मध्य विरोध के स्वर गूंज रहे है। अधिकांश जिलों में पहले दिन ही 5 सितम्बर को अध्यापक समूहों ने नेटवर्क और अपलोडिंग की दिक्कतों की शिकायत की। इनका रखरखाव प्राइवेट एजेन्सी द्वारा किया जा रहा है, जिसमें दुरुपयोग की ज्यादा आशंका है। आरोप तो यहां तक लगाए जा रहे हैं कि प्रेरणा ऐप के बाद अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों की निगरानी के लिए भी एक प्राइवेट संस्था को जिम्मेदारी दी जा रही है। सूत्र कहते हैं कि ऐसी संस्थाओं के संचालक राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों के परिजन ही हैं। इसी लिए इन पर ज्यादा जोर है।

अध्यापक कहते हैं कि अनुशासन गलत नहीं, पर इस ऐप को लागू करने से पहले बेसिक शिक्षा विभाग को कुछ बदलाव या सुधार करना चाहिए। एकल विद्यालय में तैनात अकेला अध्यापक फोटो अपलोड करने और मोबाइल पर सूचना भेजने में ही व्यस्त रहेगा। फिर अन्य कार्यों में लगाए गए अध्यापकों का समुचित रिकॉर्ड रखना भी जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चे खेतीकिसा नी में भी अपने पिता का सहयोग करते हैं। इस कारण वह देर से या कभी-कभी विद्यालय नही पहुंच पाते है। ऐसी स्थिति में फोटो अपलोड करने की बाध्यता के चलते शिक्षक संशय की स्थिति में हंै। क्योंकि इस ऐप के लागू होने के बाद शिक्षकों को विद्यालय पर तभी उपस्थित माना जाएगा, जब उनके साथ अपलोड फोटो में विद्यालय के रजिस्टर में अंकित संख्या के बराबर छात्र होंगे। कुल मिलकार लगता है कि समस्याएं बहुत हैं। फिर भी एक बात तय है कि अध्यापकों पर कुछ प्रशासनिक अधिकारियों की कृपा से बनी प्राइवेट कंपनी से निगरानी की योजना है। दूसरी ओर अध्यापक किसी भी तरह की सख्ती मानने को तैयार नहीं हैं। शिक्षक दिवस पर पांच सितंबर को सांकेतिक विरोध किया गया तो रिपोर्ट लिखे जाने तक व्यापक आंदोलन की तैयारी चल रही थी। उधर, सरकार भी कुछ समस्याओं पर बातचीत को तैयार लग रही थी।




 
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