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कोरोना संकटः संग्रहालयों की ऑनलाइन उपलब्धता की आवश्यकता

17/05/2020

विश्व संग्रहालय दिवस 18 मई पर विशेष 
डॉ. ललित पाण्डेय
विश्व संग्रहालय दिवस हर साल 18 मई को इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ म्यूजियम्स के निर्देशानुसार 1977 से निरंतर मनाया जा रहा है। हर साल इस अवसर पर विश्व भर में राजकीय-निजी संग्रहालयों में विशेष कार्यक्रमों का आयोजन होता है लेकिन इसबार पूरे विश्व में व्याप्त कोरोना महामारी के चलते संग्रहालय सूने रहेंगे। इस संकटकाल ने संग्रहालयों की भी ऑनलाइन उपलब्धता की आवश्यकता को मजबूती से उभारा है। इस दिशा में नई नीति बनाकर भारत में संग्रहालयों को नए डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आकर्षक रूप के साथ डिजिटल दुनिया की ओर बढ़ती नई पीढ़ी के ‘ऑनलाइन पगफेरे’ संग्रहालयों की ओर बढ़ाए जा सकते हैं।
विश्व संग्रहालय दिवस के अवसर पर यह जानने की इच्छा स्वत: होती है कि दुनिया में संग्रहालय कब और कैसे प्रारंभ हुए। संभवत: पोथीखानों और शासकीय दस्तावेजों के संरक्षण की भावना ने ही इनके विकास का मार्ग खोला। यह निर्विवादित है कि विश्व में पहले संग्रहालय की स्थापना ऑक्सफोर्ड में 1683 में हुई और इसको एश्मोलियम कहा गया। भारत में पहला संग्रहालय 1815 में कोलकाता में बना तो राजस्थान का पहला संग्रहालय 1887 में जयपुर में शुरू हुआ। इसकी स्थापना रामनिवास बाग में की गई। यह आज भी पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केन्द्र है। यह अल्बर्ट हॉल म्यूजियम के नाम से विख्यात है। यह भवन इंडोसारसेनिक शैली पर बना है जो उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध की एक प्रमुख शैली थी।
इतिहास पर नजर डालें तो इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ म्यूजियम्स का गठन 1946 में पेरिस में हुआ था। अपनी स्थापना से ही यह काउंसिल संग्रहालयों के विकास में निरंतर संलग्न थी। वर्ष 1997 में काउंसिल द्वारा संग्रहालय दिवस को व्यापक स्तर पर आयोजित करने का निर्णय लिया गया और प्रतिवर्ष एक विशिष्ट विषय निर्धारित कर आयोजन का निर्णय लिया गया। शनै:-शनै: इसमें अधिकाधिक राष्ट्र जुड़ते रहे। वर्तमान में इस दिवस का आयोजन लगभग 138 देशों के 44000 संग्रहालयों में होता है। संग्रहालयों की अंतरराष्ट्रीय काउन्सिल द्वारा वर्तमान में विश्व की 39 भाषाओं में पोस्टर जारी किए जाते हैं जो संग्रहालयों की प्रसिद्धि का स्वत: प्रमाण है। इस वर्ष का ध्येय विषय समानता, लोकतंत्र और समावेषितता से है जो अत्यंत प्रासंगिक है। इस भावना के प्रोत्साहन में संग्रहालय अग्रणी भूमिका का निर्वहन कर सकते हैं क्योंकि संग्रहालय में प्रदर्शित अवशेष भूत, वर्तमान और भविष्य की एक ऐसी मजबूत कड़ी हैं जो जाति, धर्म, राष्ट्र की सीमाओं से परे जाकर हमें समरूपता का संदेश देते हैं।
आज कोविद-19 (कोरोना वायरस) ने वर्तमान में मानव समाज के सम्मुख असाधारण प्रतिकूल परिस्थितियां उत्पन्न कर दी हैं। ऐसे समय में संग्रहालयों के संदर्भ में अमरीका में इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ म्यूजियम्स यूनाइटेड स्टेट्स (आईकॉम यूएस) का गठन और संग्रहालय संबंधी सूचनाओं की ऑनलाइन उपलब्धता की सुविधा का जिक्र यहां समसामयिक होगा। आईकॉम यूएस ऑनलाइन माध्यम से विश्व के 44 हजार संग्रहालयों से जुडऩे की सुविधा उपलब्ध कराता है। एक निर्धारित प्रक्रिया और पंजीकरण के बाद आईडी कार्ड या नंबर के माध्यम से शोधार्थी, शौकीन, शिक्षक आदि पूरे विश्व के संग्रहालयों से जुड़ जाते हैं। 
ऐसी ही कोई योजना भारत में भी राष्ट्रीय स्तर पर बनाई जा सकती है। भारत में पिछले सालों में प्रयास शुरू हुए हैं लेकिन वे सीमित ही कहे जा सकते हैं। इन प्रयासों का दायरा एक केन्द्रीयकृत व्यवस्था के तहत लाकर इसे विश्व के अन्य संग्रहालयों से जुड़ाव तक बढ़ाया जाए तो ज्ञानार्जन और रुचि रखने वाले इन संग्रहालयों से डिजिटल माध्यम से जुड़ जाएंगे। यहां यह कहना भी उचित प्रतीत हो रहा है कि कोविड-19 की वजह से भारत सहित विश्व में पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था भी लम्बे समय तक प्रभावित होने की आशंका है। भारत में संग्रहालय भी पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऐसे में इस संकटकाल में भारत के संग्रहालय नीतिगत शुल्क के साथ डिजिटल प्लेटफार्म पर उपलब्ध होंगे तो इसका फायदा कहीं न कहीं अर्थव्यवस्था को भी मिलेगा। 
संग्रहालयों में प्रदर्शित पुरावशेष वर्तमान में हमें प्रेरणा देते हैं कि अनेकानेक प्रतिकूलताओं के बाद भी मानव की जीवित रहने की अंत: प्रेरणा ने उसको पाषाण काल से आज के सेटेलाइट युग में पहुंचा दिया और यह हमारी संघर्ष पर विजय पाने की चेतना का ही प्रमाण है। संग्रहालय किसी भी समाज और राष्ट्र की उन समेकित उपलब्धियों का आइना होते हैं जो मानव समाज द्वारा अनाम-निष्काम कर्म की भावना से ही संभव हो सकी है। ऐसे अतीत के सामूहिक हस्ताक्षरों के प्रति उपेक्षा स्वस्थ समाज का लक्षण नहीं है। भारत में वैसे भी अबतक संग्रहालयों को अध्ययन का गंभीर माध्यम नहीं स्वीकार किया गया है और कोविड-19 ने इसके और भी उपेक्षित होने की आशंका बढ़ा दी है। ऐसे विपरीत समय को अवसर में बदलते हुए बिना किसी विशेष परेशानी के ऑनलाइन माध्यम से संग्रहालयों का अध्ययन किए जाने की प्रविधि विकसित कर इनको ज्ञान अर्जित करने का एक माध्यम बनाया जाना आज की आवश्यकता बन गया है। 
(लेखक वरिष्ठ पुराविद् एवं इतिहासविद् हैं।)


 
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