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घटने की बजाय बढ़ गए टीबी के मामले

02/10/2019

डाॅ. रमेश ठाकुर
केंद्र सरकार पोलियो की भांति टीबी को भी वर्ष 2025 तक खत्म करने की कार्ययोजना पर काम कर रही है। बीमारी को खत्म करने का मिशन तैयार हो चुका है। लेकिन इस वर्ष टीबी मरीजों की बढ़ी संख्या ने दोबारा सोचने पर मजबूर कर दिया है। टीबी यानी तपेदिक बीमारी की रोकथाम के लिए ‘डाॅट्स‘ व अन्य दवाओं का प्रचलन और प्रचार-प्रसार जिस उम्मीद के साथ किया गया था उसके परिणाम उतने उत्साहजनक नहीं निकले। कमोबेश, स्थिति पहले से भी ज्यादा चिंताजनक हो गई है। बीमारी में लगातार बढ़ोतरी की खबर सामने आई है। टीबी पर आई एक ताजा रिपोर्ट से पता चला है कि कुल दर्ज आंकड़ों में सर्वाधिक मामले उत्तर प्रदेश से हैं। जो गत वर्ष के मुकाबले 16 फीसदी ज्यादा हैं। पूरे देश में 21, 55, 894 टीबी के नए केस सामने आए हैं। सबसे दुखद पहलू यह है, टीबी संक्रमित की बढ़ी हुई यह वृद्धि पंद्रह से बीस साल के युवाओं में दर्ज की गई। रिपोर्ट पर गौर करें तो समूचे हिंदुस्तान में 15 साल से कम उम्र के बच्चों में टीबी रोग युद्धस्तर पर फैल रहा है। निजी व सरकारी अस्पतालों से लिए आंकड़ों में कुल 1,33,059 बच्चों में टीबी पाई गई है, जो कुल मामलों का करीब सात फीसद है।
बता दें, भारत वर्ष 2025 तक टीबी को समाप्त करने के मिशन पर है। पर, मौजूदा रिपोर्ट उनके अरमानों पर पानी फेरने का काम कर रही है। विगत दो दशक पहले की बात करें, तब स्वास्थ्य विभाग ने वैश्विक स्तर पर टीबी की रोकथाम के लिए डाॅट्स पर निर्भरता दिखाई थी। कुछ मुल्कों में डाॅट्स के परिणाम चमत्कारी रहे थे। उसको देखते हुए भारत सरकार ने इस दवा का वितरण जारी किया। तब, डब्ल्यूएचओ ने भी उम्मीद जताई थी कि डाॅट्स दवा के कोर्स से टीबी का इलाज मुमकिन होगा। पर, नतीजे वैसे नहीं आए। मामलों दर्ज की गई बढ़ोतरी से स्वास्थ्य मंत्रालय भी चिंतित है। इस मसले पर बात करने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डाॅ. हर्षवर्धन ने इसी सप्ताह राज्य के स्वास्थ्य मंत्रियों की बैठक भी बुलाई है।
संसार भर में बीमारियों से मौत के एक तिहाई शीर्ष कारणों में टीबी को प्रमुख बताया गया है। हालिया रिपोर्ट इस बात की वकालत करती है कि भारत में दुनिया के 24 फीसदी टीबी के मामले हैं और इस रोग से हर साल करीब पांच लाख भारतीयों की मौत हो रही है। आंकड़ों के बाद अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्थिति कितनी भयावह है। हिंदुस्तान में टीबी की बीमारी दिन प्रतिदिन विकराल रूप ले रही है। ऐसा भी नहीं है कि रोकने के प्रयास न हो रहे हों, काफी हो रहे हैं। पर, बेअसर साबित हो रहे हैं। टीबी के बढ़ते मामलों को देखकर एक बात जेहन में आती है कि एक तरफ हम आर्थिक विकास की सेहत को चंगा करके दुनिया को देश की खुशनुमा शक्ल दिखाने में लगे हैं। वही, दूसरी तरफ देशवासियों के स्वास्थ्य से हम इस कदर बे-ख्याल हैं कि किसी न किसी बीमारी की गिरफ्त में आकर उनके चेहरे की रंगत पीली पड़ रही है।
हिंदुस्तान में टीबी के संबंध में वही पुरानी उक्ति ‘परहेज इलाज से बेहतर है’ चरितार्थ होती है क्योंकि टीबी के संक्रमण का प्रभाव हर आदमी पर नहीं पड़ता यानी जिनका इम्यून सिस्टम (रोगों से लड़ने की क्षमता) कमजोर हो, वही इसकी चपेट में आता है। शायद यही वजह है कि कुपोषण तथा पोषण तत्वों की कमी की वजह से गरीब इससे अधिक प्रभावित होते हैं। बीड़ी, सिगरेट व तंबाकू टीबी के लिए सबसे ज्यादा हानिकारक हैं। बावजूद इसके लोग सेवन करते हैं। तेजी से बढ़ते टीबी मरीजों की संख्या के पीछे एक और कारण निकलकर आया है। चिकित्सक बताते हैं कि पाॅल्युशन टीबी रोग को बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहा है। सड़क पर उड़ने वाली धूल-मिट्टी और कंस्ट्रक्शन वर्क से फैलने वाला प्रदूषण इंसान को तेजी से टीबी की तरफ धकेल रहा है। निर्माण कार्य के दौरान अगर सावधानी नहीं बरती जाए तो धूल के कण उड़कर व्यक्ति के पेट में चले जाते हैं, जिससे धीरे-धीरे वह संक्रमण की चपेट में आता है। प्रदूषण इंसानों के फेफड़ों में लगातार जम रहा है। 
दरअसल, टीबी एक संक्रामक रोग है, जो बीमारी घेरने से पहले आमतौर पर फेफड़ों को प्रभावित करता है। टीबी की बीमारी दूषित खानपान, प्रदूषण और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम होने पर फैलती है। यह न केवल फेफड़ों, बल्कि शरीर के दूसरे हिस्से जैसे किडनी व दिमाग पर भी हमला करती है। मौजूदा रिपोर्ट पर गौर करें, तो टीबी की स्थिति बहुत ही भयावह है। इसलिए सरकार की जिम्मेवारी बनती है कि इस बीमारी को रोकने के लिए पोलियो जैसा अभियान चलाया जाए। जबतक कोई कारगर विधि नहीं अपनाई जाएगी, यह बीमारी फैलती रहेगी। पूर्व की सरकारों ने इस बीमारी को रोकने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई, जिसका खामियाजा आमजन उठा रहे हैं।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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