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केंद्र सरकार आर्सेनिक का दुष्प्रभाव खत्म करने की योजना पर करे पुनर्विचार: एनजीटी

11/09/2019

संजय
नई दिल्ली, 11 सितम्बर (हि.स.)। नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल (एनजीटी) ने कहा है कि स्वच्छ पानी मौलिक अधिकार है और ये हमारे संविधान में निहित जीवन के अधिकार में शामिल है। एनजीटी ने कहा कि देश की करोड़ों आबादी आर्सेनिक युक्त पानी का दुष्प्रभाव झेल रही है। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों का ये संवैधानिक दायित्व है कि वे लोगों को स्वच्छ जल मुहैया कराने के लिए प्रयास करें। एनजीटी ने केंद्र और राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वो आर्सेनिक का दुष्प्रभाव खत्म करने की वर्तमान योजना पर पुनर्विचार करें।

एनजीटी यूपी, असम, बिहार, झारखंड, कर्नाटक पंजाब और पश्चिम बंगाल में भूजल के आर्सेनिक युक्त होने के मामले पर सुनवाई कर रहा है। एनजीटी ने कहा कि राज्य सरकारें पेयजल की आपूर्ति के विकल्पों पर तुरंत विचार करें और केंद्र सरकार उसकी मानिटरिंग करे। एनजीटी ने इस संबंध में केंद्रीय जलशक्ति मंत्रालय के सचिव को अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया।

एनजीटी ने इन राज्यों की रिपोर्ट के आधार पर पाया कि पिछले 25 जून तक इन राज्यों के 13,972 आवासीय इलाके आर्सेनिक युक्त पानी से प्रभावित हैं। इन आवासीय इलाकों के एक करोड़ 11 लाख से ज्यादा की आबादी आर्सेनिक युक्त पानी से प्रभावित हैं। इनमें सबसे ज्यादा पश्चिम बंगाल में करीब 70 लाख लोग आर्सेनिक युक्त पानी से प्रभावित हैं, जबकि दूसरा नंबर असम का है। वहां 16 लाख से ज्यादा आबादी आर्सेनिक युक्त पानी से प्रभावित है।

6 अप्रैल को एनजीटी ने यूपी के बलिया और आसपास के कुछ जिलों में आर्सेनिक युक्त भूजल पर केंद्रीय जल संसाधन विभाग और पेयजल विभाग की रिपोर्ट पर असंतोष जताया था। एनजीटी ने कहा था कि देश के कई राज्यों का भूजल आर्सेनिक से युक्त है और उसकी वजह से लाखों लोगों की जान जा रही है। एनजीटी ने केंद्रीय जल संसाधन विभाग के सचिव को निर्देश दिया था कि वो सभी राज्यों से रिपोर्ट एकत्र कर तीन महीने में एनजीटी को सौंपे। एनजीटी चेयरपर्सन जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की अध्यक्षता वाली बेंच ने राज्य सरकारों को भी निर्देश दिया था कि वे केंद्रीय जल संसाधन विभाग को सहयोग करें और अपने राज्यों में आर्सेनिक युक्त जल से प्रभावितों को बचाने की दिशा में काम करें।

एनजीटी के आदेश पर उत्तर प्रदेश जल संसाधन विभाग ने जो रिपोर्ट सौंपी थी, उसके मुताबिक यूपी के सात जिलों के भूमिगत जल में आर्सेनिक बड़ी मात्रा में पाया गया है। ये जिले हैं बलिया, लखीमपुर, खीरी, आगरा, मथुरा, गोंडा और गोरखपुर। इसके अलावा यूपी के 28 जिले भी आर्सेनिक से प्रभावित हैं। जब वन और पर्यावरण मंत्रालय की टीम ने इन जिलों का दौरा किया तो पाया कि पानी में आर्सेनिक होने की वजह से होनेवाली बीमारियों से काफी संख्या में लोगों की मौत हुई है। इसके बाद पेयजल विभाग ने भी इस मामले पर संज्ञान लिया। कृषि मंत्रालय ने इसके लिए कुछ कदम भी उठाए।

उत्तर प्रदेश जल निगम ने बलिया के 310 गांवों और लखीमपुर खीरी के 165 गांवों की पहचान की, जहां के भूमिगत जल में जरूरत से ज्यादा आर्सेनिक पाया गया। केंद्रीय भूजल बोर्ड ने पाया कि न केवल बलिया और लखीमपुर खीरी बल्कि बहराईच, बलरामपुर, बरेली, बस्ती, बिजनौर , चंदौली, गाजीपुर, गोंडा, गोरखपुर, मेरठ, मिर्जापुर, मुरादाबाद, रायबरेली, संतकबीरनगर, शाहजहांपुर, सिद्धार्थनगर, संत रविदासनगर और उन्नाव में भी तय मात्रा से काफी ज्यादा मात्रा में आर्सेनिक मौजूद है।

एनजीटी ने कहा कि नीति आयोग ने जून 2018 में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि देश में 70 फीसदी जल प्रदूषित है। भारत वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स में 122 देशों में 120वें स्थान पर है। करीब दो लाख लोगों की हर साल सुरक्षित पानी न मिलने की वजह से मौत हो जाती है। एनजीटी ने आर्सेनिक युक्त पानी से निपटने के लिए 25 अक्टूबर 2018 को दिशानिर्देश जारी किया था। उन दिशानिर्देशों में प्रभावित इलाकों में सामुदायिक आधार पर आर्सेनिक हटाने वाली युनिट्स वाले हैंडपंपों को लगाने और स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के लिए टैंकर और पाइप लाइन स्थापित करने का निर्देश दिया गया। एनजीटी ने रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम स्थापित करने, लोगों खासकर शैक्षणिक संस्थानों में जागरुकता अभियान चलाने, खेती के लिए आर्सेनिक युक्त जल का इस्तेमाल रोकने के लिए कदम उठाने का निर्देश दिया। एनजीटी ने यूपी के मुख्य सचिव को इन दिशानिर्देशों के पालन की मुख्य जिम्मेदारी सौंपी थी।

हिन्दुस्थान समाचार 


 
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