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क्या गुल खिलायेगा यह बड़ा कदम

07/08/2019

केपी सिंह 
अंततोगत्वा जम्मू कश्मीर का विशेष संवैधानिक दर्जा समाप्त कर ही दिया गया। इसके साथ ही एक झटके में इस राज्य को तकसीम भी कर दिया गया है। लद्दाख जम्मू कश्मीर से अलहदा हो गया है। दोनों राज्य केन्द्र प्रशासित होंगे। जम्मू कश्मीर की अपनी विधानसभा भी होगी। केन्द्र का प्रतिनिधि अब इन क्षेत्रों के लिए उपराज्यपाल होगा।
सरकार ने लिया चकमेबाजी का सहारा
वैसे तो यह कदम अप्रत्याशित नहीं होना चाहिए। क्योंकि, जनसंघ के गठन के समय से ही उसके नेता एक देश, एक विधान, एक निशान की बात करते आ रहे हैं। लेकिन इसे चरितार्थ करने की इच्छा पहले कभी नहीं देखी गई। अकेले अटल के सरकार के समय ही नहीं मोदी सरकार पार्ट-01 में भी इसे लेकर चकमेबाजी की जाती रही। यहां तक कि अनुच्छेद 370 को समाप्त करने की वचनबद्धता भूलकर भाजपा ने अलगाववाद समर्थक पीडीपी के साथ जम्मू कश्मीर में सरकार चलाने का रास्ता चुना था। निश्चित रूप से मोदी सरकार पार्ट-01 में तमाम बड़बोलेपन के बावजूद आत्मविश्वास की कमी थी। इसलिए पूर्ण बहुमत होने के बावजूद पहली बार सरकार अपने मूल एजेंडे से किनारा करती रही। मसला चाहे कश्मीर का हो, अयोध्या या समान नागरिक संहिता का। उसे डर था कि अपने अतिवादी एजेंडे पर अमल का उतावलापन दिखाकर वह अपनी सत्ता की कब्र खोद लेगी।
हालिया लोकसभा चुनाव नतीजों से युग परिवर्तन
लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद जैसे देश का राजनीतिक परिदृश्य नये युग के अवतरण की तरह एकदम बदल गया। भाजपा की सर्वसत्ता के इस दौर में विपक्ष का दूर-दूर तक पता नहीं है। भले ही नीतीश कुमार भाजपा के साथ अब अपने को बहुत खुश महसूस नहीं कर रहे, लेकिन जब वे भाजपा से दोबारा जुड़ने जा रहे थे, उस समय उन्होंने कहा था कि मोदी को अगले बीस बरस तक कोई सत्ता से हिला नहीं पाएगा। यह बात अब समूची राजनीतिक बिरादरी के अंदर घर कर चुकी है जिसके कारण किसी में सरकार के विरोध का आत्मबल नहीं बचा है।
हालांकि धारा 370 को बनाये रखने वालों के पास भी नैतिक, राजनीतिक और वैधानिक तर्क हैं जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। लेकिन भाजपा को जिस एजेंडे पर भरपूर जनादेश मिला है उसे अमल में लाने का उसको पूरा हक है। कश्मीर समस्या एक अंधेरी सुरंग में जाकर फंस गई थी। लोग इससे ऊबकर जड़ता तोड़ने के लिए व्यग्र होने लगे थे जिसके अनुरूप सरकार ने फैसला लिया। भले ही इससे आगे कोई भी नफा-नुकसान हो।
फंतासी में जीने की चुकानी पड़ी कीमत
वैसे दुनिया में किसी देश का इतिहास-भूगोल एक जैसा नहीं रहा। दुनिया के हर कोने में उथल-पुथल का सिलसिला चलता रहता है। इसलिए किसी भी उथल पुथल से असहज नहीं हुआ जाना चाहिए। सारी दुनिया के एक दिन दारूल उलूम में तब्दील कर लेने की फंतासी का ही नतीजा था कि इस देश को आजादी का तोहफा बंटवारे की अभिशप्त उथल-पुथल के बीच मिला। लेकिन पाकिस्तान के रूप में अवतरित हुआ दारूल उलूम सारी दुनिया को आप्लावित करने की बजाय अपना ही वजूद कायम नहीं रख सका। यह दारूल उलूम छलावा और भुलावा नहीं होता तो पाकिस्तान को तोड़कर अलग बांग्लादेश बसाने की नौबत क्यों आती? आज की दुनिया में वे ही देश कायम रह पा रहे हैं और आगे बढ़ पा रहे हैं जिनमें विविधता को संजोने की क्षमता है। क्या यह जो हो रहा है वह खुदा की मर्जी के बगैर हो पा रहा है?
कश्मीरियत के जज्बे में तब तक दम था जब तक इसमें मजहबी पहलू नहीं उभर आया था। उस समय कश्मीर की जन्नत को बचाने के लिए हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों से दूरी बनाकर रहने की ख्वाहिशें बुलंद होती थी तो उसे व्यापक हमदर्दी मिलती थी। लेकिन यह सुनहरा ख्वाब उस दिन मनहूसियत का शिकार हो गया जब मजहबी उन्माद इस पर तारी होने लगा। पंडितों का कत्लेआम करके घाटी से भगाया जाने लगा जबकि वे उनके अपने ही भाई थे। पाकिस्तान के कब्जे वाले हिस्से में कश्मीरियों की जलालत के किस्से सामने आने के बावजूद पाकिस्तान अलगाववादियों को कैसे सगा महसूस हुआ यह एक पहेली है। इस कारण निजी और ऐतिहासिक कुंठाओं की बुनियाद पर बने पाकिस्तान को कश्मीर में अपना खेल खेलने का मौका मिला। नतीजतन, खुदा की यह जन्नत तबाह होती चली गई। अमन बहाली की सारी कोशिशें इसी खलनायक की बदौलत दम तोड़ती रही। फिर भी तथाकथित मुजाहिदीन पाकिस्तान के प्रति मोह से बाहर नहीं आ सके।
मुस्लिम समाज के कॉम्प्लेक्स आ रहे थे आड़े
2014 के पहले तक तमाम मुद्दों पर इसलिए गतिरोध बना हुआ था क्योंकि उसके पहले यह कल्पना नहीं की जा सकती थी कि सारे मुस्लिम समुदाय के विरोध में लामबंद होने का जोखिम उठाकर कोई इस देश में सत्ता हासिल कर सकता है। 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी को भाजपा और संघ ने जब प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित किया तो इस मिथक की वजह से यह बहुत जोखिम भरा दांव माना गया था। लेकिन उस चुनाव में जो हो नहीं सकता था वह हो गया। राजनीति की तस्वीर ही बदल गई। 2019 का चुनाव आते-आते तो राजनीति में मुसलमान जैसे हाशिये पर चले गये। कश्मीर के मामले में सरकार द्वारा दिखाई गई दिलेरी के पीछे इस कारक का भी बड़ा हाथ है। अगर पूर्वाग्रह से मुक्त होकर सोचा जाये तो कश्मीर में अनर्थ होने की बजाय नई संभावनाओं के द्वार भी सरकार के फैसले से खुल सकते हैं। भूमंडलीकरण के इस दौर में आदिम टापू की तरह किसी इलाके को सुरक्षित रखने के आग्रह का कोई तुक नहीं है। कश्मीर की स्थिति बदलने से वहां निवेश बढ़ेगा। उद्योग बढ़ेंगे तो कश्मीरियों के लिए रोजगार से लेकर हर क्षेत्र में नये अवसर पैदा होंगे। 
वैसे मुस्लिम समुदाय तन्हा नहीं है जिसके अपने कॉम्प्लेक्स हैं। ऐसी ग्रन्थियां कमोबेश भारतीय समाज के हर घटक में हैं। हाल के वर्षों में इस तरह की ग्रन्थियों के चलते ही सरकार को समय-समय पर उन कौमों की आरक्षण की जिद का सामना करना पड़ा जो सम्पन्नता से लेकर किसी भी पैमाने पर दुर्बलता की श्रेणी में शामिल नहीं की जा सकती। ऐसे में राजनीतिक शक्तियों के पास दो ही विकल्प होते हैं। या तो वे हठवादिता के पोषण का शार्टकट रास्ता अपनाकर अपनी गोटी लाल करते रहें या फिर लोगों को भावनात्मक उन्माद से बाहर लाकर वास्तविकता के धरातल पर खड़ा करने की हिम्मत दिखाएं। कमोबेश मोदी सरकार ने इस मामले में बेहतर उद्यम किया। नये प्रयोगों में हर कौम को यह आश्वस्त करते हुए कि इसके पीछे कोई दुर्भावना या किसी को परेशान करने का इरादा नहीं है तो बदलावों को लेकर मुसलमानों की बेचैनी खत्म हो गई है। फिर चाहे मसला तीन तलाक का हो या कश्मीर का, मुसलमान तार्किक और परिपक्व ढंग से सोचने लगे हैं। यह इस देश के लिए गर्व की बात हो सकती है कि हमारा मुस्लिम अवाम दुनिया में सबसे ज्यादा समझदार और प्रगतिशील साबित हो रहा है। पूरे इस्लामिक विश्व में सकारात्मक बदलाव के लिए हिन्दुस्तानी मुसलमान रोल मॉडल के रूप में नुमाया होने को दरपेश है। हालांकि अब सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी को बहुसंख्यक लोगों की इस मामले में चिंता करनी पड़ेगी जो विकार ग्रस्त ग्रन्थियों के चलते तेजी से असभ्य व्यवहार की ओर प्रवृत्त होने लगे हैं।
मंजर बदला तो समर्पण की मुद्रा में समर्थन
बदले हुए मंजर का नतीजा है कि सपा और बसपा ने भी कश्मीर के मामले में लिये गये फैसले पर सरकार का सरेंडर होकर समर्थन किया है। दूसरी ओर कांग्रेस में विरोध के रूख की वजह से विद्रोह की हद तक असहमति फूटने लगी है। इस फैसले से भाजपा के लिए राजनीतिक फलितार्थों की चर्चा भी अप्रासांगिक नहीं होगी। उत्तर प्रदेश में विधानसभा के एक दर्जन उपचुनाव होने हैं। महाराष्ट्र, दिल्ली, झारखंड और हरियाणा जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा के आम चुनाव सन्निकट हैं। यहां चुनावी बिगुल बजने के पहले ही भाजपा ने जैसे बाजी जीत ली है। अपराजेय छवि का मनोवैज्ञानिक माहौल मजबूत रखने के लिए मोदी मौके पर कोई न कोई असाधारण कदम उठाने की रणनीति अख्तियार किये हुए हैं। कश्मीर पर निर्णायक कदम के मौके को लेकर इस पर गौर किया जाना चाहिए। दूसरी ओर इस फैसले के कारण विस्फोटक चुनौतियां सामने आने के आसार भी कम नहीं हैं। हालांकि सरकार इससे अवगत है। इसलिए विध्वंसक कार्रवाइयों से लेकर कूटनीतिक संकट तक के मद्देनजर पूरी सतर्कता बरती जा रही है।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।) 


 
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