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माता की उपासना के निहितार्थ

07/07/2019

हृदयनारायण दीक्षित
सभी जीव मां का विस्तार हैं। मां न होती तो हम भी न होते। मां सृष्टि की प्रथम अनुभूति है। ऋग्वेद में मां की अनुभूति का चरम है। कुछ लोग मानते हैं कि ऋग्वेद पुरूष सत्ता वाले समाज के अभिजनों की रचना है। वे ऋग्वेद में देवी उपासना की प्रतिष्ठा पर ध्यान नहीं देते। वैज्ञानिक दृष्टिकोण में पृथ्वी सौरमण्डल का एक ग्रह है। यही आर्यो की दृष्टि में भी सत्य है लेकिन आर्य अनुभूति में पृथ्वी माता है। यही पोषक है। हमारी देह के सभी अंगों की निर्मिति का मूल आधार है। पृथ्वी को माता जानना ऋग्वैदिक पूर्वजों मंत्र रचना की प्रकृति भी है। धरती माता है तो कोई पिता भी होना चाहिए। इसी अनुभूति में पृथ्वी माता के साथ आकाश पिता हैं। (6.70.5 व 6) प्राचीन यूनानी दर्शन में आकाश को महत्व नहीं मिला। प्राचीन यूनानी दार्शनिक आकाश के तत्व नहीं मानते थे लेकिन ऋग्वेद (1.160.4) के अनुसार पृथ्वी और आकाश दोनों पहले मिले हुए एक थे। दोनों को मरूतों ने अलग किया। यह स्थापना उचित भी है। सृष्टि सृजन के पूर्व प्रकृति की सारी शक्तियां एक में ही थी। पृथ्वी-आकाश भी एक थे। तब दोनों का संयुक्त नाम रोदसी था। एक सूक्त (1.159.1-2) में दोनों का एक संयुक्त मन भी बताया गया है।
पृथ्वी माता की अनुभूति खांटी पितृसत्तात्मक समाज में नहीं हो सकती। मातृसत्तात्मक समाज में ही माता की श्रेष्ठता संभव है। ये ऋषि नदियों को भी माता कहते हैं। ऋग्वेद में अनेक नदियों के उल्लेख हैं लेकिन सरस्वती सिंधु का ज्यादा है। सिंधु और सरस्वती भी माता हैं। प्रारम्भ में विवाह संस्था नहीं थी। मां ही प्रमुख थी। देवी उपासना का विकास उसी कालखण्ड में हुआ था। ऋग्वेद में देवी उपासना का भी महत्व है। चार्ल्स डारविन के विकासवादी सिद्धांत में सृष्टि का विकास जल से हुआ है। प्राचीन यूनानी दार्शनिक थेल्स का विचार भी यही है। जल के प्रति राग और जल उपासना भी प्राचीन है।
ऋग्वेद में जल आपः मातरम् - जल माताएं हैं। ऋग्वेद की अपो देवी या आपतः मातरम् - जलमाताएं मातृ सत्तात्मक समाज की ही अनुभूति है। यही आपः मातरम् या जलमाताएं संपूर्ण जड़-स्थिर और गतिशील की माताएं हैं - विश्वस्य स्थातुरर्जगतो जनित्री। (6.50.7) जल को सृष्टि की माता कहना बड़ी अनुभूति है। ऋग्वेद में अनेेक देवियां हैं। एक वाग्देवी हैं। वे रूद्र और वसुओं के साथ गतिशील हैं। (10.125) वे राष्ट्र और राष्ट्र की वैभवदाता ‘राष्ट्र संगमनी हैं। (10.125.3) वे संपूर्ण जगत् को आच्छादित करती हैं। लेकिन इन देवियों से विशिष्ट हैं वनदेवी। ऋग्वेद (10.146) में उनका नाम ‘अरण्यानी’ है। अरण्य का अर्थ वन या जंगल होता है। ऋग्वैदिक ऋषि के भावबोध में वन प्राणी भी अरण्यानी के गीत गाते हैं, “तमाम जीव हैं। कुछ बैल की तरह बोलते हैं। कुछ जीव चीं-चीं बोलते हैं। वे वीणा के स्वर की तरह अरण्यानी का गुणगान करते हैं। (वही 2) ऋषि अरण्यानी देवी का दर्शन करना चाहते हैं। लेकिन वे घने अरण्य में विलुप्त हो जाती हैं। (वही 1)
ऋषि वन देवी के प्रति श्रद्धालु हैं। उनकी इच्छा है कि वे वन में न रहें, गांव चलें, वही रहें। कहते हैं “आप यहां निर्जन वन में क्यों रहती हैं? (वही) वन निर्जन हैं। यहां तमाम जीव हैं। ऋषि पूछते हैं कि क्या यहां आपको डर नहीं लगता? बताते हैं कि अरण्यानी पर कोई आक्रमण नहीं करता। वे वे किसी को कष्ट नहीं देती।” (वही) स्तुति करते हैं, “हम मृग नाभि की सुगंध से व्याप्त फल फूल से समृद्ध लेकिन कृषि कार्य से रहित अरण्यानी की स्तुति करते हैं।” (वही 5 व 6) इस ऋषि कथन में अरण्यानी देवी ‘कृषि कार्य से रहित’ हैं। ऋग्वेद के कई देवता हल जोतते हुए बताए गए हैं। वन में खेती नहीं होती। वन देवी खेती नहीं करतीं। इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि महिलाएं खेती के काम में नहीं लगती थीं।
सूर्योदय के ठीक पहले का दिक्काल ऊषा है। ऋग्वेद में ऊषा भी आर्यो की उपास्य देवी हैं। वे सुंदरी हैं। पुराणी युवती हैं। सभी मनुष्यों को जगाती हैं और नमस्कारों के योग्य हैं। ऋषि उन्हें रात्रि की छोटी बहन बताते हैं। रात्रि भी देवी हैं। वे ऋग्वेद के ऋषियों की दृष्टि में “अविनाशी अमर बताई गई हैं। वे आकाश की पुत्री हैं। वे आती हैं तो पहले अंतरिक्ष को आच्छादित करती हैं। फिर धरती के ऊंचे नीचे क्षेत्रों को भरती हैं।” ऋषि संवाद करते हैं, “उनके आगमन पर हम सब गौ, अश्व आदि और पशु पक्षी विश्राम करते हैं। उनसे स्तुति है कि हिंसक जानवरों व चोरों को हमसे दूर रखें। हमारी स्तुतियां सुनें।” (10.127) प्रकृति की अनेक शक्तियों व आयामों को देवी रूप श्रद्धा करने की परंपरा ऋग्वेद में हैं।  
प्रकृति की शक्ति का ज्ञान-विज्ञान का ही भाग होता है। ज्ञान, विज्ञान और दर्शन से प्राप्त जानकारी अस्तित्व और उसके रूपों के प्रति विश्वास बढ़ाती है। ऋग्वेद के ऋषि तर्क प्रतितर्क और अनुभव आदि प्रत्यक्ष उपकरणों से अपने निष्कर्ष का सतत् निरीक्षण भी करते थे। विज्ञान और दर्शन में कोई भी निष्कर्ष अंतिम नहीं होता। जांचा परखा निष्कर्ष अंततः सिद्धांत बनता है। भावबोध में यही श्रद्धा हो जाता है। श्रद्धा अंधविश्वास नहीं है। यह जांचा परखा विश्वास है। ऋग्वेद में ‘श्रद्धा’ भी एक देवी हैं। श्रद्धा हमारी आंतरिक अनुभूति है।
प्रकृति की प्रकट विभूति है श्रद्धा। एक विशिष्ट अनुभूति और दिव्य चित्त दशा। श्रद्धा आश्चर्य पर विश्वास है। इन्द्र प्रत्यक्ष नहीं हैं। वे प्रकृति की शक्ति हैं। इस शक्ति पर विश्वास श्रद्धा है। वायु का ज्ञान स्पर्श से होता है। वायु आंख से नहीं देखी जा सकती। ऐसे तमाम आश्चर्यो पर विश्वास श्रद्धा है। ऋग्वेद के ऋषियों ने श्रद्धा को देवी बताकर नई परिकल्पना दी है। अस्तित्व या उसकी शक्तियों पर श्रद्धा करना सही है तो पहले श्रद्धा पर श्रद्धा करना भी जरूरी है। जैसे माता पिता का आदर आवश्यक है। ‘आदर’ एक चित्तदशा है। माता पिता के आदर के पहले आदर का आदर करना आवश्यक है। श्रद्धा ऐसी ही दिव्यता है। ऋषि कहते हैं कि श्रद्धा प्रकृति की विभूतियों में शिखर है, “श्रद्धा भगस्तस्य मूर्धनि। (10.151.1) श्रद्धा की उपासना का मंत्र बड़ा प्यारा है। जीवन की प्रत्येक गतिविधि में श्रद्धा की प्रतिष्ठा है। ऋषि बताते हैं, “श्रद्धा प्रातर्हवामहे, श्रद्धा मध्यंदिन परि, श्रद्धां सूर्यस्य निम्रुचि श्रद्धे श्रद्धापयेह नः’ - हम प्रातः काल श्रद्धा का आवाहन करते हैं, मध्यान्ह में श्रद्धा का आवाहन करते हैं, सूर्यास्त काल में श्रद्धा की ही उपासना करते हैं। हे श्रद्धा, हम सबको श्रद्धा से परिपूर्ण करें। (10.151.5) यहां श्रद्धा जीवन और कर्म की शक्ति हैं, श्रद्धा से ही श्रद्धा की याचना में गहन भावबोध है।
मन संकल्प का केन्द्र है और विकल्प भी। मन पदार्थ नहीं है। तो भी गतिशील कहा जाता है। मन की गतिशीलता पर ऋग्वेद से लेकर रामायण, महाभारत काल तक व्यापक चिंतन हुआ है। आधुनिक मनोविज्ञान भी मन का ही विवेचक शास्त्र है। मन की चंचलता कर्मसाधना में बाधक प्रभाव डालती है। मन के साधक मनीषी कहे जाते हैं। मनीषी और विद्वान पर्यायवाची हो गए हैं। यों मनीषी का अर्थ विद्वान नहीं होता। मन को एकाग्र कर लेने वाला ही मनीषी है। मन की एकाग्रता का परिणाम ज्ञान में खिलता है और मनीषी विद्वान हो जाता है। मन की शासक शक्ति की उपासना से मनीषी होने का कठिन मार्ग सरल हो जाता है। ऋग्वेद में मन की शासक शक्ति की भी मंत्र उपासना है। इस शक्ति का नाम ‘मनीषा देवी’ है। ऋषि मनीषा देवी का आवाहन करते हैं - ‘प्र शुकैतु देवी मनीषा’। (7.34.1) देवी उपासना का स्रोत जम्बूद्वीप है। जम्बूद्वीप के भीतर भरतखण्ड है। इसका दार्शनिक स्रोत माता है। माता ही हम सबके जनन का स्रोत है। वह जननी है। प्रत्यक्ष रूप में अपनी माता के प्रति अचल, अविचल और धु्रव श्रद्धा ही इसका मूल है। इस जगत् में हम सबके संभवन का उद्गम, कारण माता है। इसी अनुभूति का विस्तार ऋग्वेद में पृथ्वी माता है। ऋग्वेद की इस अनुभूति का विस्तार अथर्ववेद में भूमि सूक्त है। यहां पृथ्वी हमारी माता है हम सब इसके पुत्र हैं - पुत्रो अहम् पृथित्याः। ऋग्वेद की इसी प्रेरणा से गंगा-यमुना आदि नदियां माता हैं। वनस्पतियां औषधियां माता हैं। पृथ्वी के साथ पृथ्वी की रजकण भी माता है। माता जन्मदाता पोषक, पालक विधाता है। माता देवी को बार-बार नमस्कार।
(लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)


 
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