यथावत

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लाली मेरे लाल की

18/09/2019

लाली मेरे लाल की

राकेश कायस्थ

मेरा एक युवा सहकर्मी सोमवार की सुबह-सुबह पूरे टशन के साथ दμतर में हाजिर हुआ। चाल में वही चुस्ती थी लेकिन आंखों पर सलमान खान की तरह काला सन ग्लास चढ़ाये मैने उसे पहली बार देखा। दμतर के भीतर कुछ ऐसा अंदाजÞ देखकर मुझे थोड़ा अजरज हुआ। बिना कुछ पूछे वह मेरा सवाल समझ गया और बोल पड़ा— सर आई μलू हो गया है। मेरी वजह से इनफेक्शन घर के बाकी लोगों को भी हो गया। इसलिए यह आॅफिस में काला चश्मा लगाकर आना पड़ा। डॉक्टर कहते हैं कि इसका इनफेक्शन इतना बुरा होता है कि आंखों में देख लेने भर से कोई इसका शिकार हो सकता है। उसकी बात बिल्कुल ठीक थी। मुझे आई μलू हो चुका है। मुझे अंदाजा है कि यह किस तरह फैलता है। उस नौजवान की कहानी सुनकर मुझे अचानक कबीरदास याद आ गये, जो लगभग 600 साल पहले लिख गये हैं— लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल दोहा रहस्यवादी और आध्यात्मिक है लेकिन आई μलू के मामले में कितना सटीक है!

भोजपुरी में एक कहावत है, जिसका हिंदी अनुवाद कुछ इस तरह है— आंख का आना, आंख का जाना, आंख का उठना और आंख का बैठना सब बुरे हैं।

मुंबई में कुछ खास मौसम में जित देखो तित लाल होता है। लाली देखने की गलती नहीं करनी चाहिए वर्ना दूसरे के आंखों की लाली आपके आंख तक भी पहुंच जाएगी। एक डॉक्टर ने मुझे बड़ी दिलचस्प बात बताई। उनका कहना है कि आई μलू वाले सीजन में कई प्रेमी जोड़े इकट्ठा उनके पास आते हैं। नजÞरों के तीर से घायल होना एक मुहावरा है। लेकिन आई μलू इसके मायने बदल देता है। आंखों में आंख डालने नहीं बल्कि हाथों में हाथ थामने से भी आई μलू होता है। पूर्वी भारत में आई μलू को आंख आना भी कहते हैं। मेरी दादी भोजपुरी में एक कहावत कहती थीं, जिसका हिंदी अनुवाद कुछ इस तरह है— आंख का आना, आंख का जाना, आंख का उठना और आंख का बैठना सब बुरे हैं। इस पुरानी लोकोक्ति को ना जाने कितने शायरों में अपने-अपने ढंग से इस्तेमाल किया है। शायरों की यही खूबी होती है, संदर्भ और प्रतीकों को अपने ढंग से इस्तेमाल करके एक अलग ही दृश्य रच देते हैं।

कई बार ऐसा भी होता है कि शायरी और कविता कही किसी और संदर्भ में जाती है और लागू दूसरी तरह होती है। सिगरेट पीने वाले दोस्तों के बीच में गलती से घिर जाउं तो मुझे गुलजार के गाने की लाइनें याद आती हैं— तुम्हारे सीने से उठता धुंआ हमारे सीने में उतर रहा है। खैर बात यहां आई μलू की चल रही थी। आई μलू का एक और नाम जय बांग्ला है। इस नाम को लेकर कई धारणाएं प्रचलित हैं। पुराने लोगों का कहना है कि 1971 की लड़ाई के दौरान बांग्लादेश से शरणार्थी बहुत बड़ी तादाद में भारत आये थे। उन्हीं की यह वजह से पहली बार यह संक्रमण देश के बाकी हिस्सों में बड़े पैमाने पर फैला था। लेकिन कुछ अनुभवी बंगाली इस मामले में एक अलग दलील पेश करते हैं। वे कहते हैं कि पूर्वी और पश्चिमी बंगाल में बहुत ज्यादा इस्तेमाल होनेवाली देसी शराब का नाम बांग्ला है। इसके पीने से आंखे लाल-लाल हो जाती हैं।

आई μलू का नाम जय बांग्ला इसलिए पड़ा है क्योंकि इसमें आंखे उसी तरह लाल होती हैं, जिस तरह ‘बांग्ला’ पीने से होती है। उद्गम चाहे जो भी हो लेकिन यह बीमारी बहुत परेशान करने वाली है। आंखे लाल करना एक मुहावरा है। लेकिन आंखें सचमुच लाल हो जायें तो तकलीफ कई बार नाकाबिल- ए-बर्दाश्त हो जाती है। देखा जाये तो यह बीमारी एक मायने में फायेदमंद भी है। इसका इस्तेमाल रणनीतिक लाभ के लिए किया जा सकता है। मान लीजिये बरसात के मौसम में कोई काला चश्मा लगाये दμतर पहुंचे और बॉस से कहे कि आई μलू की वजह से कंप्यूटर पर काम बिल्कुल नहीं कर सकता तो छुट्टी आसानी से मिल जाएगी। दुनिया का शक्की से शक्की बॉस भी चश्मा उतरवाकर सत्यापन की गलती नहीं करेगा। मुझे पता नहीं है कि कितने लोगों ने यह नुस्खा आजमाया है। वैसे नई पीढ़ी बहुत स्मार्ट है। छुट्टी लेने के सैकड़ों मौलिक बहाने उसे आते हैं। इन बहानों से जुड़ी कहानियां फिर कभी।


 
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