युगवार्ता

Blog single photo

वैश्विक आर्थिक सुस्ती का असर नहीं

28/10/2019

वैश्विक आर्थिक सुस्ती का असर नहीं

प्रजेश शंकर

मॉनसून को देखते हुए यह दावा किया जा सकता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर दुनिया में व्याप्त मौजूदा आर्थिक सुस् ती का बहुत ज्यादा असर पड़ने वाला नहीं है।

दुनिया के 90 फीसदी देशों में आर्थिक सुस् ती का दौर जारी है, जिसका असर भारतीय अर्थव् यवस् था में भी देखने को मिल रहा है। पिछले तिमाही में सकल घरेलू उत् पाद जीडीपी भी पिछले छह साल में सबसे कम 5 फीसदी रहा है। भारतीय अर्थव् यवस् था में व् याप् त सुस् ती का असर साफ तौर पर दिखने लगा है। हालांकि, इस वैश्विक सुस् ती की वजह मौजूदा ट्रेड वार है, जिसकी चर्चा हाल ही में अंतरराष् ट्रीय मुद्रा कोष प्रमुख क्रिस् टलीना जॉर्जिवा ने भी की है। बतौर आईएमएफ मैनेजिंग डायरेक् टर अपने पहले भाषण में उन् होंने कहा कि दुनिया के अधिकांश देश इसकी चपेट में हैं, जिसका असर भारत पर पड़ेगा।
आईएमएफ ने विकास दर का जो अनुमान है उसे घटाकर 7 फीसदी कर दिया है। इस बीच अंतरराष् ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज ने एक दिन पहले ही भारत की विकास दर के अनुमान को मौजूदा वित् त वर्ष में घटाकर 6.2 फीसदी कर दिया है। वहीं, रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया ने भी पिछले हμते चालू वित् त वर्ष में जीडीपी ग्रोथ रेट का अनुमान घटाकर 6.1 फीसदी कर दिया है। ऐसे में यदि हम देखें तो भारतीय अर्थव् यवथा जो कि मूलरूप से कृषि पर आधारित है। इस साल के मॉनसून को देखते हुए हम ये जरूर दावा कर सकते हैं कि भारतीय अर्थव् यवस् था पर दुनिया में व् याप् त मौजूदा आर्थिक सुस् ती का बहुत ज् यादा असर पड़ने वाला नहीं है।
दरअसल, उसकी कई सारी वजहें भी हैं, जिसका दावा एक तरह से देश के सबसे बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बेंक स् टेट बैंक आॅफ इंडिया (एसबीआई) के चेयरमैन रजनीश कुमार ने किया। इसी हμते एक अंग्रेजी दैनिक को दिए इंटरव् यू में उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था के कई सेगमेंट में सुस्ती का असर घरेलू बैंकों के क्रेडिट ग्रोथ पर पड़ा था। यह असर धीरे-धीरे घट रहा है, क्योंकि त् यौहारी सीजन शुरू होने से लोग खर्च कर रहे हैं। उन् होंने कहा कि आमतौर पर सितंबर से अप्रैल के बीच चलने वाले त् यौहारी सीजन में कर्ज की मांग ज् यादा होती है, जिसकी वजह से उम् मीदें ज् यादा बढ़ी है। कुमार के मुताबिक खुदरा कर्ज में बढ़ोतरी हुई है, लेकिन कंपनियों की कर्ज की मांग में सुस् ती है।
इन सब के अलावा रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया (आरबीआई) ने भी लगातार अपनी ब् याज दरों यानी रेपो रेट 7 फरवरी, 2019 से लेकर 4 अक् टूबर 2019 तक पांच बार कुल मिलाकर 1.35 फीसदी की कटौती राजकोषीय घाटा को ध् यान में रखकर अभी तक किया है। ताकि अर्थव् यवस् था में व् याप् त आर्थिक सुस् ती को कम किया जा सके। इसके साथ ही आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने देश के सभी निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से रेपो रेट को आॅटोमेटिक तरीके से जोड़ने के निर्देश दिए हैं, जिसका अधिकांश बैंकों ने पालन भी एक अक् टूबर से शुरू कर दिया है, ताकि कंज् यूमर को ज् यादा से ज् यादा लाभ मिल सके।
इसके अलावा सरकार ने भी अपने स् तर पर जीएसटी दरों एवं कॉरपोरेट टैक् स के स् लैब में भी कटौती करके इसको दुनिया के अन् य देशों के मुकाबले लाया है, ताकि इंडस् ट्रीज में जो थोड़ी बहुत सुस् ती दिख रही है। उसको दूर किया जा सके। इसके साथ ही सरकार ने एक देश एक टैक् स यानी जीएसटी में व् याप् त कमी को दूर करने के लिए भी एक 12 सदस् यीय समिति का गठन किया है, जो 15 दिनों में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपेगी। वित् त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बैंकों में भी बड़ी पूंजी डालने का ऐलान पिछले महीने किया था। वहीं, टैक् सपेयर्स के लिए जो समिति बनी थी उसकी रिपोर्ट भी लागू की जानी है। इन सबको देखते हुए हम ये जरूर कह सकते हैं कि जो लोग दावा कर रहे हैं कि भारतीय अर्थव् यवस् था पर इसका ज् यादा असर पड़ने वाला है सही नहीं है। सच तो यह है कि इसका ज् यादा असर नहीं पड़ने वाला है।


 
Top