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देश के महान सपूत थे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी

05/07/2019

(जन्म दिवस, 06 जुलाई पर विशेष)

वीरेन्द्र सिंह परिहार
देश की एकता और अखण्डता के संरक्षक, राष्ट्रवादी विचारधारा से ओतप्रोत और भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी नि:संदेह भारत माता के सच्चे सपूत थे। तभी तो 1940 में गांधीजी ने उनसे कहा था कि 'सृष्टि और प्राणियों की रक्षा के लिए समुद्र मंथन से निकला विष पीकर जो कार्य भगवान शिव ने किया था, उसी प्रकार भारतीय राजनीति का विष पीने के लिए भी किसी की आवश्यकता थी, तुम वही काम करोगे।'
भारत माता के ऐसे महान सपूत का जन्म 06 जुलाई 1901 को भवानीपुर, उत्तर कोलकाता में हुआ था। उनके पिता का नाम सर आशुतोष मुखर्जी और माता का नाम योगमाया देवी था। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के पिता सर आशुतोष मुखर्जी अपने समय के उद्भट विद्वान थे। डॉ. मुखर्जी ने 1917 में मैट्रिक पास किया तथा 1921 में बी.ए. की डिग्री हासिल की। 1923 में लॉ करने के पश्चात वे विदेश चले गए और 1926 में इंग्लैण्ड से बैरिस्टर बनकर देश लौटे। 1934 में 33 वर्ष की उम्र में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने। इस पद पर नियुक्ति पाने वाले वे सबसे कम आयु के कुलपति थे। बताना जरूरी लगता है कि डॉ. मुखर्जी के पिता भी कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति रह चुके थे। कुलपति रहते हुए डॉ. मुखर्जी ने जो सबसे पहला और प्रमुख कार्य किया वह शिक्षा प्रणाली में अंग्रेजी भाषा की प्रधानता को समाप्त करते हुए बांग्ला व अन्य भाषाओं को प्रमुख स्थान देना। उन्होंने बांग्ला भाषा की पाठ्य पुस्तकें तैयार कराने के साथ बांग्ला भाषा की समृद्धि के लिए भी महत्वूपर्ण कदम उठाए। विश्वविद्यालय में अपने चार वर्षों के कार्यकाल उन्होंने पूरी तरह ध्यान रखा कि ऐसे शिक्षित युवा वर्ग तैयार हों जो राष्ट्र के निर्माण और अपनी सभ्यता, संस्कृति को बचाए रखने में अपनी भूमिका सहज रूप से समझें और पूर्णतः समर्पित होकर अपने दायित्वों का निर्वहन करें। 
डॉ. मुखर्जी ने देश सेवा के लिए पत्रकारिता के क्षेत्र में भी हाथ आजमाया। उन्होंने बंगवाणी नाम से बांग्ला भाषा की एक पत्रिका भी निकाली। 1938 के पश्चात डॉ. मुखर्जी ने यह तय किया कि देश को दमनकारी और अलगाववादी शक्तियों से बचाने के लिए उन्हें सक्रिय राजनीति में जाना होगा। वह हिन्दू महासभा से जुड़ गए। 1940 में हिन्दू महासभा के तत्कालीन अध्यक्ष विनायक दामोदर सावरकर के अस्वस्थ हो जाने पर डॉ. मुखर्जी को हिन्दू महासभा का कार्यवाहक अध्यक्ष नियुक्त किया गया। 1940 में जो चुनाव हुए उसमें बंगाल में मुस्लिम लीग को विजय मिली। अपनी योजना के तहत मुस्लिम लीग ने बंगाल में भीषण दंगे कराए। उसमे कई हिन्दुओं का कत्ल कर दिया गया था। इससे डॉ. मुखर्जी इतने विचलित हुए कि अपने प्राणों की परवाह किए बगैर इन दंगों में प्रमुख भूमिका निभाने वाले नबाब के महल में वह अकेले ही जा पहुंचे। वहां से लौटकर उन्होंने पूरे देश को मुस्लिम लीग की घातक साजिशों से अवगत कराया। फलस्वरूप सरकार को विवश होकर दंगा रोकवाना पड़ा और मुस्लिम लीग की योजना धरी की धरी रह गई। डॉ. मुखर्जी एक यथार्थवादी राजनेता थे। उन्होंने कृषक प्रजा पार्टी को जो मुस्लिम लीग की सहयोगी थी, उसे अपनी सूझ-बूझ से अलग कर लिया और फजलुल हक के नेतृत्व में नई सरकार बनवाई। डॉ. मुखर्जी इस सरकार में वित्त मंत्री बने।
12 अगस्त 1942 को डॉ. मुखर्जी ने भारत के गर्वनर जनरल लार्ड लिनलिथिंगों को पत्र लिखकर मांग किया कि ब्रिटिश सरकार भारत को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देने की घोषणा करे। भारत की राष्ट्रीय सरकार को यह अधिकार हो कि वह अपनी आंतरिक और बाहरी शत्रुओं से सुरक्षा करने के लिए भारतीय सेना का गठन कर सके। साथ ही भारत की गुलामी का प्रतीक इंडिया आफिस बंद कर दिया जाए। इसके साथ ही उन्होंने खुलकर राष्ट्रीय आंदोलन का समर्थन करना आरंभ कर दिया। उन्होंने 16 नवम्बर 1942 को बंगाल के गर्वनर को अपना त्यागपत्र भेज दिया। अपने इस्तीफे में लिखा कि यदि अपने देश को स्वतंत्र देखने की कामना रखना तथा विदेशी शासन को हटाने का प्रयत्न करना अपराध है तो प्रत्येक स्वाभिमानी भारतीय अपराधी हैं।
 इसी बीच वर्ष 1943 में बंगाल में भयंकर अकाल पड़ा, लेकिन ब्रिटिश सरकार और बंगाल की मुस्लिम लीग की सरकार ने कोई सहायता नहीं पहुंचाई। ऐसी स्थिति में डॉ. मुखर्जी के नेतृत्व में बंगाल के अकाल पीड़ितों को सहायता पहुंचाने के लिए जो कार्य किए गए, वह एक अमिट उदाहरण बन गया। इसी दौरान ब्रिटिश सरकार ने भारत को धर्म के आधार पर विभाजित करने वाले क्रिप्स प्रस्ताव को पुनः अमल में लाने की प्रक्रिया आरंभ कर दी। पहले से ही उपयुक्त समय की ताक में बैठी मुस्लिम लीग ने भी इस प्रस्ताव के आधार पर पृथक मुस्लिम राष्ट्र बनाने की अपनी मांग तेज कर दी। कांग्रेस पार्टी का रवैया इस मामले पर समर्थन देने वाला जैसा ही था। इधर मुस्लिम लीग पूरा बंगाल और पंजाब पाकिस्तान में मिलाना चाहती थी। इसके लिए उन्होंने हिन्दू बहुल पश्चिम बंगाल के लोगों को बंगाल से खदेड़ने के लिए वहां साम्प्रदायिक दंगे भड़का दिए। डॉ. मुखर्जी द्वारा बनाए गए हिन्दुस्तान नेशनल गार्ड नामक संगठन के स्वयंसेवकों और जागरूक हिन्दुओं ने डॉ. मुखर्जी के नेतृत्व में लीगी आतताइयों का जमकर मुकाबला किया और बंगाल को हिन्दू मुक्त करने की मुस्लिम लीग की योजना को विफल कर दिया।
डॉ. मुखर्जी ने विभाजन को अपरिहार्य देखते हुए निर्णय लिया कि बंगाल के हिन्दू बहुल पश्चिमी भाग को मुस्लिम बहुल पूर्वीं भाग से अलग कर दिया जाए। ऐसी ही सोच उनकी पंजाब के बारे में थी उन्हें अच्छी तरह पता था कि यदि दोनों प्रान्त पूरी तरह पाकिस्तान में गए तो दोनों ही जगह हिन्दुओं का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। इस तरह से डॉ. मुखर्जी के प्रयासों से यह मुद्दा जन आंदोलन बन गया और ब्रिटिश सरकार को बंगाल और पंजाब का विभाजन करना पड़ा। 
देश विभाजन के पश्चात 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र भारत में जब प्रथम सरकार का गठन हुआ तो कांग्रेस पार्टी द्वारा उन्हें देश के प्रथम मंत्रिमण्डल में शामिल होने के लिए निमंत्रण दिया गया। कांग्रेस में सरदार पटेल उनका बहुत आदर करते थे। इस पहल में उनका महती योगदान था। डॉ. मुखर्जी ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। उन्हें उद्योग मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई। उन्होंने सफलतापूर्वक अपने दायित्व का निर्वहन किया। लेकिन 1947 में जब पाकिस्तान ने कबाइलियों के माध्यम से जम्मू-कश्मीर पर हमला कर उसके करीब एक तिहाई हिस्से पर कब्जा कर लिया, तब देश के हालात बड़ी तेजी से बिगड़ने लगे। पंडित नेहरु जिस प्रकार पाकिस्तान के प्रति दुर्बलता का परिचय दे रहे थे, उसने डॉ. मुखर्जी को चिंतित कर दिया। पाकिस्तान ने कश्मीर के हिन्दुओं के साथ पूर्वी बंगाल के डेढ़ करोड़ हिन्दुओें को भी त्रस्त करना शुरू कर दिया था। डॉ. मुखर्जी ने ऐसी स्थिति में तुरंत नेहरु सरकार पर दबाव डालते हुए स्मरण कराया कि बंगाल विभाजन के समय वे पूर्वी बंगाल के हिन्दुओं के प्रति प्रत्येक प्रकार से रक्षा का वचन दे चुके थे। अतः अब वचन निभाने का समय आ गया है। लेकिन पंडित नेहरु पाकिस्तान सरकार से इधर-उधर के समझौते करते रहे, जिनका कोई मतलब नहीं निकलना था। अंतत: अप्रैल 1950 में उन्होंने पंडित नेहरु को मंत्री पद से अपना इस्तीफा सौंप दिया।
इसके पश्चात डॉ. मुखर्जी ने देश की तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों का आंकलन करने के बाद यह निश्चय किया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही वह संगठन है जो एक नए राजनीतिक दल का आधार बन सकता है। इसी भित्ति पर जनवरी 1951 में दिल्ली में भारतीय जनसंघ के नाम से एक नए राजनीतिक दल का गठन हुआ। डॉ. मुखर्जी उसके संस्थापक अध्यक्ष बने। 1952 के चुनाव परिणामों में जनसंघ को 03 लोकसभा और 33 विधानसभा सीटों पर ही विजय मिल सकी। यद्यपि यह अपेक्षित नहीं था। फिर भी जनसंघ के प्रत्याशियों को जिस प्रकार जनमत प्राप्त हुआ था, उसने उसे देश के चार प्रमुख राजनीतिक दलों में शामिल कर दिया था। यह डॉ. मुखर्जी की योग्यता ही थी कि विपक्ष के 25 सदस्यों को संगठित कर उस गुट के नेता बन गए और कांग्रेस सरकार ने उन्हें विरोधी दल के नेता के रूप में स्वीकार कर लिया। 
पूर्वी बंगाल में नेहरु सरकार के निष्क्रिय और उदासीन रवैए के चलते डॉ. मुखर्जी अपना सत्याग्रह आरंभ करने वाले थे कि तभी कश्मीर की समस्या अत्यन्त भयावह हो उठी। उस समय जम्मू-कश्मीर में परमिट व्यवस्था लागू थी। उसके तहत जम्मू कश्मीर जाने के लिए सरकार से अनुमति लेनी पड़ती थी। डॉ. मुखर्जी इसके विरोध में थे। उन्होंने इसका विरोध करने के लिए बिना परमिट जम्मू कश्मीर जाने का निर्णय किया। 8 मई 1853 को वे अपने चार साथियों के साथ रवाना हुए। जब वे तवी नदी के पुल पर जम्मू -कश्मीर की सीमा के भीतर पहुंचे तो पुलिस ने उन्हें दो साथियों समेत गिरफ्तार कर लिया और नजरबंद कर दिया। वहीं पर 23 जून 1953 की प्रातः 03 बजकर 40 मिनट पर उनकी मृत्यु हो गई। 
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।) 


 
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