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सियासी पिच पर हिट सुदेश

01/08/2019

सियासी पिच पर हिट सुदेश

डॉ. शारदा वंदना

आज झारखंड का जो राजनीतिक परिदृश्य बन गया है उसमें सुदेश कुमार महतो की प्रासंगिकता अन्य क्षेत्रीय दलों के नेताओं की तुलना में ज्यादा बेहतर बनी है।

झारखंड में विपक्षी दलों की एकजुटता के बावजूद एनडीए ने जिस प्रकार जीत दर्ज की है वह नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता के अलावा भाजपा- आजसू की ठोस सियासी रणनीति का भी परिणाम है। विपक्ष ने जिस प्रकार का सामाजिक समीकरण सेट किया था उसे तोड़ना आसान नहीं था। एनडीए के खिलाफ सूबे के सभी क्षत्रप एकजुट होकर हमला बोल रहे थे। उससे मुकाबले के लिए मजबूत गठजोड़ जरूरी था। भाजपा-आजसू नेतृत्व ने इसे भांप लिया और फिर क्षेत्रीय क्षत्रपों के पैरों तले की जमीन खिसका दी। 14 में से 12 सीटें जीत कर विपक्ष को धराशायी कर दिया। झामुमो की संथाल की सियासी जमीन पूरी तरह खिसका दी। झामुमो अभी भी हार से उबर नहीं पाई है।
जानकारों की मानें तो एनडीए की प्रचंड जीत में आजसू ने बड़ी भूमिका निभाई है। साथ ही पहली बार लोकसभा में उपस्थिति दर्ज करा कर पुराना रुतबा कायम कर लिया है। झारखंड विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राज्य में भाजपा से गठबंधन कर एक सीट हासिल करनेवाले सुदेश महतो प्रदेश की राजनीति में फिर से प्रासंगिक हो गये हैं। सुदेश ने न सिर्फ अपनी पार्टी के उम्मीदवार चंद्रप्रकाश चौधरी के लिए पसीना बहाया, बल्कि अपनी पकड़ वाले क्षेत्र में भी भाजपा उम्मीदवारों के लिए एड़ी-चोटी एक कर दी।
नतीजा रहा कि जहां महागठबंधन की मजबूत पकड़ थी, वहां भी विपक्षी दलों की हार हुई। एनडीए का यह मजबूत गठजोड़ अब आगामी विधानसभा चुनाव में भी साथ रहकर विपक्षी गठबंधन के लिए गले की हड्डी बनेगा। झारखंड गठन के बाद पहली बार 2005 में विधानसभा का चुनाव हुआ, इसमें आजसू ने सिल्ली से सुदेश महतो और रामगढ़ से चंद्रप्रकाश चौधरी ने जीत दर्ज की थी। आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत 1991 में की थी। सुदेश महतो एक कार्यकर्ता के रूप में आजसू पार्टी में शामिल हुए थे और आज वह पार्टी के अध्यक्ष हैं। सुदेश साल 2000 में सिल्ली से पहली बार विधायक बने।
इसके बाद वह 2005 और 2009 में भी विधायक रहे। सूबे की राजनीति में साख रखने वाली आजसू दो सीटों से आज लोकसभा तक पहुंच गयी है। बहरहाल, सुदेश महतो गृह क्षेत्र सिल्ली से लगातार दो बार विधानसभा का चुनाव हारने के बावजूद निराश नहीं हुए, जमीन पर लगातार काम करते रहे, कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाते रहे। उनमें राजनीति के वे सारे गुर हैं, जो उन्हें ऊंचाई तक पहुंचा सकते हैं। लोकसभा चुनाव में तालमेल होने के बाद सुदेश ने आजसू को भाजपा का सच्चा सहयोगी साबित कर दिया है। हालांकि, 2014 का लोकसभा और विधानसभा चुनाव भाजपा और आजसू ने अलग-अलग लड़ा था। जिसमें विधानसभा में छह विधायक जीत कर आये थे।
लेकिन सिल्ली से सुदेश महतो चुनाव हार गए। सुदेश पहले 2014 के लोकसभा चुनाव में रांची से जीतने में नाकामयाब हुए, फिर 2014 के विधानसभा चुनाव में सिल्ली विधानसभा सीट भी हार गए। लेकिन कहते हैं, राजनीति में अवसर आते हैं और वह अवसर आजसू पार्टी के सुप्रीमो सुदेश महतो के लिए भी आया। देश को मजबूत नेतृत्व देने की खातिर उन्होंने भाजपा से बिना शर्त हाथ मिलाया। उन्हें इसका पुरस्कार भी मिला और भाजपा आलाकमान ने उन्हें गिरिडीह सीट सौंप दी। सुदेश ने एक बार फिर न सिर्फ खुद को साबित कर दिखाया है, बल्कि एनडीए के वोट बैंक में इजाफा और विपक्ष के वोट बैंक के बिखराव का बड़ा कारण बने।
राजनीतिक जानकार कहते हैं कि इसके लिए सुदेश महतो ने खुद को और पार्टी को मजबूत करने के लिए राज्य के हर जिले में अभियान शुरू किया। ऐन चुनाव से पहले उन्होंने राज्य के पांच हजार से अधिक गांवों की पदयात्रा की। इस दौरान उन्होंने उन इलाकों पर विशेष ध्यान दिया, जो कुरमी-महतो बहुल थे। इसका सकारात्मक परिणाम भी चुनाव में नजर आया। झारखंड के बारे में यह हकीकत सभी जानते हैं कि यहां की राजनीति में कुरमी-महतो की उपेक्षा की कोई जगह नहीं है। भाजपा के पास कुरमी-महतो नेता के रूप में रामटहल चौधरी का चेहरा था, लेकिन रांची से उन्हें टिकट नहीं मिला, तो वह बागी बन गये।
ढुल्लू महतो और विद्युत वरण महतो भी इसी जमात के हैं, लेकिन उनकी स्वीकार्यता हर क्षेत्र में नहीं है। ऐसी स्थिति में भाजपा यह भांप गयी कि रामटहल चौधरी की बगावत के कारण पैदा हुई विपरीत परिस्थिति को वह सुदेश महतो की मदद से नियंत्रित कर सकती है। सुदेश तब तक साबित कर चुके थे कि यदि वह रामटहल चौधरी से आगे नहीं हैं, तो पीछे भी नहीं हैं। भाजपा नेतृत्व के इस आकलन को सुदेश ने भी चुनाव परिणाम आने के बाद साबित किया।


 
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