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देश में गहराता जल संकट

01/07/2019

योगेश कुमार गोयल
भीषण गर्मी और मानसून की बेरूखी के चलते हर कोई परेशान है। परेशानी की एक बड़ी वजह गर्मी के मौसम में गहराता जल संकट है। हालात कितने विकट होते जा रहे हैं, उसका अनुमान चेन्नई, कोलकाता, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, बिहार, झारखण्ड या फिर देश की राजधानी दिल्ली की स्थिति को देखकर लगाया जा सकता है। चेन्नई के हालात ज्यादा चिंताजनक हैं, जहां कई कालोनियों में महिलाओं को रात-रातभर जागकर पानी इकट्ठा करना पड़ता है। देशभर में कई जगह से पानी को लेकर लोगों के बीच आपस में मारपीट, झगड़े-फसाद की खबरें आ रही हैं। हालांकि पिछले कुछ वर्षों से केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया के कई देशों में जल संकट गहराता जा रहा है। खासतौर से गर्मी के मौसम में यह समस्या अब हर साल विकट रूप धारण करने लगी है। पिछले साल इसी मौसम में शिमला जैसे पर्वतीय क्षेत्र में भी पानी की कमी को लेकर जो हाहाकार मचा था, वह आंखें खोलने के लिए पर्याप्त था। प्रधानमंत्री ने रविवार को अपने 'मन की बात' में जल संकट को लेकर आगाह किया है। फिर भी जल संकट से निपटने के लिए देशभर में कोई गंभीर प्रयास होते नहीं दिख रहे। यही वजह है कि देश में बहुत सारे शहर चेन्नई और शिमला जैसे हालातों से जूझने के कगार पर खड़े हैं।
देश में जल संकट के गहराते जाने की प्रमुख वजह है भूमिगत जल का निरन्तर घटता स्तर। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि इस समय दुनियाभर में करीब तीन बिलियन लोगों के समक्ष पानी की समस्या मुंह बाये खड़ी है। विकासशील देशों में तो यह समस्या कुछ ज्यादा ही विकराल होती जा रही है। वहां करीब 95 प्रतिशत लोग इस समस्या को झेल रहे हैं। पानी की समस्या एशिया में और खासतौर से भारत में तो बहुत गंभीर रूप धारण कर रही है। यह भविष्य में कितना खतरनाक रूप धारण कर सकती है, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि अब अधिकांश विशेषज्ञ आशंका जताने लगे हैं कि जिस प्रकार तेल के लिए खाड़ी में युद्ध होते रहे हैं, उसी तरह आने वाले वर्षों में पानी के लिए विभिन्न देशों के बीच युद्ध लड़े जाएंगे। आशंका तो यहां तक जताई जा रही है कि अगला विश्व युद्ध पानी के मुद्दे को लेकर ही लड़ा जाएगा। दरअसल, दुनियाभर में जल संधियों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव कोफी अन्नान का मानना रहा है कि उन्हें इस बात का डर है कि आगामी वर्षों में पानी की कमी गंभीर संघर्ष का कारण बन सकती है।
ये आशंकाएं निराधार नहीं हैं। हम इस तथ्य को नकार नहीं सकते कि पानी जीवन की अमूल्य निधि है। पानी के बिना पृथ्वी पर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिए अगर पृथ्वी पर जल संकट इसी कदर गहराता रहा तो इसे निश्चित मानकर चलना होगा कि पानी हासिल करने के लिए विभिन्न देश आपस में टकराने लगेंगे। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच पानी के मुद्दे को लेकर पहले से ही तनातनी चल रही है। इसके अलावा उत्तरी अफ्रीका के कुछ देशों के बीच भी पानी की वजह से झगड़े होते रहे हैं। इजराइल, जोर्डन, मिस्र तथा इथोपिया जैसे कुछ अन्य देशों के बीच भी पानी को लेकर काफी गरमा-गरमी देखी जाती रही है। अपने देश में विभिन्न राज्यों के बीच पानी के बंटवारे को लेकर पिछले कुछ दशकों से बहुत गहरे मतभेद बरकरार हैं। इस वजह से राज्यों के आपसी संबंधों में काफी खटास उत्पन्न हो चुका है। दिल्ली-हरियाणा हो अथवा छत्तीसगढ़-ओडिशा, पानी के मुद्दे पर अक्सर इन राज्यों में किचकिच देखने को मिलती है। 
पृथ्वी के कुल क्षेत्रफल के करीब दो तिहाई भाग पर पानी है लेकिन इसमें से पानी की बहुत ही कम मात्रा मानव के लिए पेयजल, सिंचाई, उद्योगों आदि की दृष्टि से उपयोगी है। इस संबंध में 'इंटरनेशनल एटोमिक एनर्जी एजेंसी' का कहना है कि पृथ्वी पर उपलब्ध पानी की कुल मात्रा में से मात्र तीन प्रतिशत पानी ही स्वच्छ बचा है। उसमें से भी करीब दो प्रतिशत पानी पहाड़ों व ध्रुवों पर बर्फ के रूप में जमा है। शेष एक प्रतिशत पानी का उपयोग ही पेयजल, सिंचाई, कृषि तथा उद्योगों के लिए किया जाता है। बाकी 97 प्रतिशत पानी खारा होने अथवा अन्य कारणों की वजह से उपयोगी अथवा जीवनदायी नहीं है। पृथ्वी पर उपलब्ध एक प्रतिशत पानी में से भी करीब 95 फीसदी भूमिगत जल के रूप में पृथ्वी की निचली परतों में उपलब्ध है। बाकी पानी पृथ्वी पर सतही जल के रूप में तालाबों, झीलों, नदियों अथवा नहरों में तथा मिट्टी में नमी के रूप में उपलब्ध है। इससे स्पष्ट है कि पानी की हमारी अधिकांश आवश्यकताओं की पूर्ति भूमिगत जल से ही होती है लेकिन इस भूमिगत जल की मात्रा इतनी नहीं है कि इससे लोगों की आवश्यकताएं पूरी हो सकें। वैसे भी जनसंख्या की रफ्तार तो तेजी से बढ़ रही है किन्तु भूमिगत जलस्तर बढ़ने की बजाय घट रहा है। ऐसे में पानी की कमी का संकट तो गहराना ही था।
पृथ्वी की सतह पर उपयोग में आने लायक पानी की मात्रा वैसे ही बहुत कम है। साथ ही भूमिगत जल स्तर भी तेजी से गिर रहा है। तो हमारी पानी की आवश्यकताएं कैसे पूरी हों? इसके लिए हमें वर्षा के पानी पर आश्रित रहना पड़ता है। लेकिन वर्षा के पानी का भी सही तरीके से संग्रहण न हो पाने के कारण उसका समुचित उपयोग नहीं हो पाता। सही प्रबंधन एवं संरक्षण के अभाव में इसमें से आधा पानी तो व्यर्थ में बह जाता है। वर्षा के पानी का करीब 15 फीसदी वाष्प के रूप में उड़ जाता है। करीब 40 फीसदी पानी नदियों में बह जाता है। शेष पानी जमीन द्वारा सोख लिया जाता है, जिससे थोड़ा बहुत भूमिगत जल स्तर बढ़ता है और मिट्टी में नमी की मात्रा में कुछ बढ़ोतरी होती है। हम अगर वर्षा के पानी का संरक्षण किए जाने की ओर खास ध्यान दें तो व्यर्थ बहकर नदियों में जाने वाले पानी का संरक्षण करके उससे पानी की कमी की पूर्ति आसानी से की जा सकती है और जल संकट से काफी हद तक निपटा जा सकता है।
1987 में पानी को मानव की अमूल्य राष्ट्रीय धरोहर व अति विशिष्ट प्राकृतिक संसाधन मानते हुए जल संसाधनों के नियोजन एवं विकास के लिए 'राष्ट्रीय जल नीति' घोषित की गई थी। लेकिन इसके क्रियान्वयन के मामले में लगातार उदासीनता बरती जाती रही है। राष्ट्रीय जल नीति की घोषणा करते समय कहा गया था कि देश में उपलब्ध जल संसाधनों के विकास, संरक्षण, समुचित उपयोग एवं प्रबंधन के लिए सभी आवश्यक उपाय किए जाएंगे और जरूरी कदम उठाए जाएंगे। लेकिन पिछले तीन दशकों में इस दिशा में सरकारी उदासीनता एवं लापरवाही कदम-कदम पर स्पष्ट झलकती रही है। देश में जल संकट के विकराल रूप धारण करते जाने के पीछे जनसंख्या विस्फोट की समस्या के साथ-साथ पानी की उपलब्धता में होती जा रही कमी तो जिम्मेदार है ही, इसके अलावा पानी का दुरूपयोग, कुप्रबंधन एवं दूषित होता पेयजल आदि और भी कई ऐसी वजहें हैं, जो इस समस्या के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं। इस समस्या का समाधान तभी संभव है, जब आमजन में इस दिशा में जागरूकता पैदा करने के अपेक्षित प्रयास किए जाएं तथा सरकारी प्रयासों के साथ-साथ हर नागरिक भी पानी की एक-एक बूंद बचाने के लिए अपने-अपने स्तर पर प्रयास करे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)  


 
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