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उम्मीद बंधाते देश के युवा निशानेबाज

31/05/2019

मनोज चतुर्वेदी
गले साल यानी  2020 में टोक्यो ओलंपिक का आयोजन होना है। इन खेलों में भाग लेने के लिए निशानेबाज आजकल ओलंपिक कोटा हासिल करने के प्रयास में जुटे हैं। भारत के अब तक सात निशानेबाजों ने ओलंपिक में कोटा हासिल किया है। इन निशानेबाजों को देखने से यह साफ है कि देश में अब युवा निशानेबाजों का जलवा दिखने लगा है। ओलंपिक कोटा हासिल करने वाले सात में से पांच निशानेबाज 26 साल से कम उम्र के हैं। सबसे ज्यादा उम्र 29 साल के अभिषेक वर्मा और 28 साल की राही सरनोबत की है। इन सात निशानेबाजों में से तीन सौरभ चौधरी, दिव्यांश सिंह पंवार और मनु भाकर मात्र 17 साल के हैं। खास बात यह है कि यह तीनों ही अगले साल टोक्यो से पदक के साथ लौटने का माद्दा रखते हैं।
यह भारतीय निशानेबाजी में आए बदलाव का परिणाम है। 2016 में हुए रियो ओलंपिक में भाग लेने वाली भारतीय निशानेबाजी टीम को हम देखें तो इसमें 43 वर्षीय प्रकाश नानजप्पा, इतनी ही उम्र के मानवजीत सिंह संधू, 36 वर्षीय गगन नारंग और अभिनव बिंद्रा शामिल थे। इनमें से  ज्यादातर  निशानेबाज  2012 के लंदन ओलंपिक और 2008 के बीजिंग ओलंपिक की भारतीय निशानेबाजी टीम में भी शामिल थे। लेकिन हम टोक्यो ओलंपिक का कोटा हासिल करने वाले निशानेबाजों को देखते हैं तो साफ होता है कि निशानेबाजी में पीढ़ीगत बदलाव आ गया है। इस बदलाव की वजह रियो ओलंपिक तक एक्शन में दिखे कुछ भारतीय निशानेबाजों ने संन्यास ले लिया है और कुछ इस यंग ब्रिगेड के प्रदर्शन में दबकर रह गए हैं।
खेलों में पीढ़ीगत बदलाव आना कोई नई बात नहीं है। हमने कुछ सालों पहले क्रिकेट में इस तरह का बदलाव देखा था। इस बदलते दौर में देशवासियों ने टीम इंडिया में सचिन तेंदुलकर, वीवीएस लक्ष्मण, राहुल द्रविड़, सौरव गांगुली और वीरेंद्र सहवाग की जगह विराट कोहली, शिखर धवन, चेतेश्वर पुजारा, रोहित शर्मा और हार्दिक पांड्या को खेलते देखा था। टीम इंडिया को यह बदलाव रास आया और यह टीम इंडिया आजकल इंग्लैंड में विश्व कप जीतने के लिए विराट की अगुआई में जुटी हुई है। यही स्थिति आजकल निशानेबाजी टीम में भी नजर आ रही है। यह बदलाव अगले साल टोक्यो में होने वाले ओलंपिक की निशानेबाजी में एक से ज्यादा स्वर्ण पदक जीतने की उम्मीद बंधा रहा है। भारत ने ओलंपिक में अब तक चार ही पदक जीते हैं। सबसे पहले राज्यवर्धन सिंह राठौर ने 2004 के एथेंस ओलंपिक में रजत पदक जीतकर शुरुआत की। चार साल बाद बीजिंग में अभिनव बिंद्रा ने स्वर्ण पदक जीता। 2012 के लंदन ओलंपिक में विजय कुमार ने रजत और गगन नारंग ने कांस्य पदक जीता था।
इसी हफ्ते म्यूनिख आईएसएसएफ विश्व कप में राही सरनोबत और मनु भाकर ने ओलंपिक कोटा हासिल किया है। राही सरनोबत ने 25 मीटर रैपिड फायर पिस्टल का स्वर्ण पदक जीतकर टोक्यो ओलंपिक में भाग लेने की पात्रता हासिल की थी। इस स्पर्धा में सरनोबत के साथ मनु भाकर छह सीरीज पूरी होने तक उनके साथ शीर्ष पर चल रही थीं। लेकिन उनकी पिस्टल का एक पार्ट टूट जाने पर वह पिछड़ गई थीं और ओलंपिक कोटा हासिल नहीं कर सकी थीं। लेकिन मनु ने 10 मीटर एयर पिस्टल में चौथा स्थान हासिल करके ओलंपिक कोटा हासिल किया। हालांकि वह कांस्य पदक की दौड़ में 0.1 अंक से पिछड़ गईं। इसके बावजूद वह और उनके कोच जसपाल राणा पदक जीतने में पिछड़ने से मायूस होने की बजाय ओलंपिक में खेलने की पात्रता हासिल करने से खुश दिखे। महिलाओं की 10 मीटर एयर पिस्टल में ओलंपिक कोटा पाने वाली वह पहली भारतीय हैं। पुरुषों की इस स्पर्धा में सौरभ चौधरी और अभिषेक वर्मा पहले ही ओलंपिक कोटा पा चुके हैं।
ओलंपिक कोटा हासिल करने वाली मनु भाकर और दिव्यांश सिंह पंवार की इस खेल में आने की कहानी बहुत दिलचस्प है। मनु भाकर बचपन में काफी समय तक यह तय ही नहीं कर पाई कि किस खेल को अपनाएं। वह मुक्केबाजी, स्केटिंग, कबड्डी और खो-खो जैसे खेलों को अपनाने के बाद ही निशानेबाजी में आईं। कराटे की राष्ट्रीय चैंपयनशिप में तो रजत पदक तक जीत लिया था। लेकिन मनु को इस खेल में मजा नहीं आ रहा थाउन्होंने पिता रामकिशन से यह बात कही और फिर स्कूल की शूटिंग रेंज में कोच अनिल से अप्रैल 2016 में प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया। उन्होंने इस खेल को अपनाने के दो साल के भीतर विश्व कप पदक जीत लिया और तीन साल के भीतर ओलंपिक में खेलने की पात्रता हासिल कर ली। दिव्यांश की निशानेबाज बनने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। दिव्यांश मौजूदा इंटरनेट और ऑनलाइन गेम्स के दीवाने थे। कुछ समय पहले देश में पबजी ऑनलाइन गेम का जोर था। इस गेम ने देश के तमाम युवाओं को अपना शिकार बनाया था। दिव्यांश भी इससे बचे नहीं रह सके। उनके इस नशे को लेकर उन्हें कई बार अपने पिता अशो की डांट भी खानी पड़ी। पिता ने उनकी इस लत से आजिज आकर उन्हें 14 साल की उम्र में कर्णी सिंह शूटिंग रेंज में ट्रेनिंग दिलानी शुरू कर दी। उन्होंने दो साल में ही ओलंपिक पदक जीतने की उम्मीद बंधा दी है।
सौरभ चौधरी को ओलंपिक पदक जीतने का सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है। वह इस साल अब तक विभिन्न आईएसएसएफ विश्व कपों में पांच गोल्ड मेडल जीत चुके हैं। उन्होंने 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में दो और इसकी मिश्रित टीम स्पर्धा में तीन स्वर्ण पदक जीते हैं। इस 17 साल के निशानेबाज ने उम्र से कहीं ज्यादा परिपक्वता दिखाई है। सौरभ किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने भी इस मुकाम तक पहुंचने में बहुत पापड़ बेले हैं। वह बागपत के बिनौली गांव स्थित शूटिंग रेंज में अभ्यास के लिए जाया करते थे। इसके लिए उन्हें प्रतिदिन 12 किमी साइकिल चलाकर जाना पड़ता था। यह उनकी लगन का ही परिणाम है कि वह लगातार सफलताएं हासिल कर रहे हैं। सौरभ सहित ओलंपिक कोटा हासिल करने वाले सभी युवा निशानेबाजों ने यह तो दिखाया है कि वह जल्दी सीखने में महारत रखते हैं। इस कारण ही वह हालात को पीछे छोड़ने में सफल रहे हैं। देश के निशानेबाजों की यंग ब्रिगेड ने यह दिखाया है कि उनमें जल्द सीखने की क्षमता है। इसलिए उनसे टोक्यो ओलंपिक पदक के साथ लौटने की उम्मीद की जा सकती है।
(लेखक जाने-माने खेल पत्रकार हैं।) 


 
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