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‘एक देश, एक चुनाव’ लोक-हितकारी

08/07/2019

‘एक देश, एक चुनाव’ लोक-हितकारी


देश में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराये जाने के प्रस्ताव पर लंबे समय से बहस चल रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मुद्दे पर जोरदार पहल कर इसे आगे बढ़ाया है। अभी हाल ही में विधि आयोग ने भी इस बावत विभिन्न राजनीतिक दलों और प्रशासनिक अधिकारियों की राय जानने के लिये उनका एक तीन दिवसीय सम्मेलन आयोजित किया था। सम्मेलन में कुछ दलों ने तो इसके प्रति सहमति जताई किन्तु अधिकतर दलों ने इसका विरोध ही किया। विरोध करने वाले दलों के नेताओं का कहना है कि एक साथ चुनाव कराने का यह प्रस्ताव लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ है । जाहिर है,जब तक इस प्रस्ताव पर आम राय नहीं बनती, तब तक इसे धरातल पर उतारना संभव नहीं होगा। भारत दुनिया का सबसे बडा लोकतंत्र है। लिहाजा यहां प्राय: हर वर्ष किसी न किसी राज्य में चुनाव होते ही रहते हैं। इससे न केवल प्रशासनिक व नीतिगत निर्णयों का क्रियान्वयन प्रभावित होता है, सरकारी खजाने पर भारी बोझ भी पड़ता है ।

इस सबसे बचने का एकमात्र उपाय तो यही है कि ग्राम-पंचायतों व नगरपालिकाओं-निगमों को छोड कर देश की लोकसभा व राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही कराये जाएं। यह कोई नया विचार-प्रस्ताव नहीं है। अपने देश में लोकतंत्र की स्थापना के शुरुआती दौर में इन दोनों ही व्यवस्थापिकास भाओं के चुनाव एक साथ ही हुआ करते थे। सन 1952, 1957,1962,1967 में, अर्थात चार-चार बार ऐसा हो चुका है, और सफलतापूर्वक हुआ है। यह क्रम तब टूटा, जब सन 1968-69 में कुछ राज्यों की विधानसभाएं कतिपय कारणों से समय-पूर्व ही भंग कर दी गई थीं । ऐसे में सवाल यह उठता है कि तब कोई समस्या उत्पन्न नहीं हुई थी, तो अब एक साथ चुनाव कराने से लोकतंत्र का क्या नुकसान हो जाएगा? एक साथ चुनाव कराने का प्रस्ताव देश के हितकारी भी है और विकासोन्मुखी भी। क्योंकि, लगभग हर साल कहीं न कहीं होते रहने वाले चुनावों के कारण देश के सम्बन्धित प्रदेशों में बार-बार आदर्श आचार संहिता लागू करनी पड़ती है। इसकी वजह से सरकार आवश्यक नीतिगत निर्णय नहीं ले पाती और विकास की तमाम योजनाओं का क्रियान्वयन भी अधर में लटक जाता है। इससे अन्तत: नुकसान तो जनता को ही होता है ।

जिस देश में 1952 से 1967 तक लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होते रहे हैं, वहीं अब ऐसा करने में दिक्कतें महसूस की जा रही है। अजीब है कि विरोध में तर्क प्रस्तुत करने वालों में कांग्रेस पार्टी भी शामिल है।

भिन्न-भिन्न प्रदेशों में अलग- अलग समय पर चुनाव होने से जनता की गाढी कमाई से निर्मित सरकारी खजाने का एक प्रकार से दुरुपयोग ही होता है । इससे विकास-योजनाएं भी प्रभावित होती हैं और महंगाई भी बढ जाती है। इसके विपरीत, एक ही साथ चुनाव कराये जाने पर एक ही खर्च में देश-प्रदेश की चुनावी प्रक्रियाएं सम्पन्न हो जाने से उस धन की बर्बादी रुक सकती है। एक साथ चुनाव कराये जाने से काले धन के सृजन और भ्रष्टाचार के प्रचलन पर बहुत हद तक काबू पाया जा सकता है। यह तो सर्वविदित है कि चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों द्वारा चन्दा के नाम पर मोटी-मोटी राशि की जो हेरा-फेरी की जाती है, उससे कालाधन ही निर्मित होता है। यद्यपि चुनाव आयोग ने प्रत्याशियों के लिए चुनावों में किये जाने वाले खर्च की सीमा का निर्धारण कर रखा है, तथापि उन प्रत्याशियों के सम्बन्धित दलों के लिए चुनावी-खर्च की कोई सीमा निर्धारित नहीं की गई है। ऐसे में कालाधन बटोरने-खरोचने की प्रक्रिया लगातर चलती रहती है । इसी तरह, लगभग हर साल चुनाव होते रहने से राजनीतिक दलों व राजनेताओं को एक-दूसरे के पक्ष-विपक्ष में जनमत आकर्षित करने के बाबत जातीयता का विष-वमन करने अथवा अन्य संवेदनशील मसलों को उभारने में सक्रिय हो जाना पडता है। इससे सामजिक समरसता भंग होती रहती है।

किन्तु पांच साल पर एक ही साथ चुनाव कराये जाने से ऐसे अवांछित अवसर हर साल तो उत्पन्न नहीं ही होंगे। इसका एक और लाभ यह है कि सरकारी कर्मचारियों और सुरक्षा बलों को बार-बार चुनावी कार्यों पर लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इससे उनका समय बचेगा, तो उनके मूल कार्यों के क्रियान्वयन में बाधायें उत्पन्न नहीं होंगी। आज तो चुनाव कराने के लिये स्कूली शिक्षकों और सरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों का जो प्रतिनियोजन किया जाता है, उसके परिणामस्वरुप महीनों तक स्कूलों में पढाई-लिखाई बाधित हो जाती है औरअन्य कार्य भी प्राय: ठप्प ही हो जाया करते हैं। ‘एक देश एक चुनाव’ के विरोध में जो तर्क दिया जा रहा है कि यह देश के संघीय ढाँचे के विपरीत और संसदीय लोकतंत्र के लिये घातक होगा, उसमें कोई दम नही है। लोकसभा और विधानसभाओं का चुनाव एक साथ करवाने पर अधिक से अधिक सिर्फ एक बार कुछ विधानसभाओं के कार्य-काल उनकी निर्धारित सीमा के आगे या पीछे करने पड़ सकते हैं। इससे राज्यों की स्वायत्तता कतई प्रभावित नहीं हो सकती। उदाहरण है कि जिन प्रदेशों में एक बार या दो बार राष्ट्रपति शासन लागू हो चुकी हैं, वहां की स्वायतता आज तक कभी मरी नहीं है।

एक साथ चुनाव के विरोध में एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि ऐसा होने पर राष्ट्रीय मुद्दों के सामने क्षेत्रीय मुद्दे गौण हो जाने अथवा क्षेत्रीय मुद्दों के सामने राष्ट्रीय मुद्दों का महत्व कम हो जाने की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। किन्तु यह तर्क भी निराधार है।, लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनाव के मुद्दे स्वाभाविक तौर पर भिन्न -भिन्न होते ही हैं। हमारे देश के मतदाता अब इतने जागरूक जरूर हो चुके हैं कि वे राष्ट्रीय और स्थानीय मुद्दों में भेद कर तदनुसार प्रत्याशियों व दलों के पक्ष-विपक्ष में मतदान कर सकते हैं । एक साथ चुनाव के विचार का विरोध करने वालों का यह कहना भी बेकार की बात है कि अलग-अलग समय पर चुनाव होते रहने से जनप्रतिनिधियों को जनता के प्रति लगातार जवाबदेह बने रहना पड़ता है। विरोध करने वाले छोटे-छोटे अंतरालों पर किसी न किसी चुनाव का सामना करने की दलील देते हैं। विरोध करने वाले ऐसे लोगों के लिए जवाब है कि जन-प्रतिनिधियों में कर्त्तव्य-बोध केवल चुनावी पेंच के कारण ही पैदा नहीं किया जा सकता है।

‘एक देश एक चुनाव’ की अवधारणा में कोई बड़ी खामी नहीं है। फिर भी राजनीतिक दलों द्वारा इसका विरोध किया जा रहा है। इस विरोध से लगता है कि इसे निकट भविष्य में सर्वानुमति से लागू कर पाना संभव नहीं है। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत चुनावी बाढ में डुबता हुआ नजर आ रहा है। इस अनापेक्षित चुनावी बाढ से देश को उबारने के लिए ‘एक साथ चुनाव’ की व्यवस्था लागू करनी ही होगी । यदि हमारे देश में ‘एक देश एक कर-प्रणाली’, अर्थात ‘जीएसटी’ लागू की जा सकती है, तो ‘एक देश , एक चुनाव’ की व्यवस्था आखिर क्यों नहीं लागू की जा सकती है , क्या सिर्फ इसलिए कि इससे कुछ राजनीतिक दलों और उनके राजनेताओं को चुनावी दांव-पेंच का खेल खेलने में असुविधा हो सकती है ?


 
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