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कहानी कहने का सामर्थ्य

30/08/2019

कहानी कहने का सामर्थ्य

मनोज मोहन

मधुसूदन आनंद नया ज्ञानोदय के चौथे संपादक हैं। उनके संपादन काल में पहला विशेषांक कहानी केंद्रित है। वे कहानीकार भी हैं, शायद इसलिए इस विशेषांक संपादक ने अपनी पसंद का कोई सुराग अपने संपादकीय में देने की कोशिश नहीं की। वे सिर्फ इतना भर कहते हैं कि कहानी लोक-साहित्य की सर्वाधिक पुरानी विधा है। धर्मवीर भारती के बहाने वह कहानी के पक्ष में एक और तर्क देते हैं कि कविता में भी वस्तुत: एक कहानी ही होती है। आधुनिक हिंदी कहानी का इतिहास सवा-सौ साल पुराना है।
इस विशेषांक में कुल उन्नीस कथाकारों में कुछ युवा हैं, तो कुछ वरिष्ठ होती जा रही पीढ़ी के कथाकार हैं। महिला कथाकारों की संख्या अच्छी-खासी है। चार सक्रिय पीढ़ी में से स्थापित पहचान वाले कथाकारों को ही उन्होंने तरजीह दी है। बस पैमाना इतना भर है कि कहानी रोचक हो और कथन-शिल्प के स्तर पर नया यथार्थ देने और कहानी कहने का सामर्थ्य हो। इस पैमाने पर अंक में शामिल सभी कहानियां खरी उतरती हैं। दिव्या विजय की कहानी यारेगार लंबे समय तक स्मृति में बनी रहने वाली कहानी है।
आतंक के साये में अली और फरहान के पतंग उड़ाने की इच्छा और लगातार बढ़ता तनाव, जैसे नाजुक विषय पर कहानी कह जाने की कला पाठकों के जेहन को कुरेदता है। वंदना राग की कहानी ‘पवन चड्ढा हाजिर हो’ और नीला प्रसाद की ‘टाइम पास है यार’, दिल्ली के जनजीवन से निकली बेहतरीन कहानी है। तीसरे कमरे की छत, पांचवीं सीढ़ी और बारहवां सपना में दुष्यंत ने स्वतंत्रता के बाद बदलते गांव की कहानी लिखी है। राकेश मिश्र, प्रियदर्शन, पंकज मित्र, संजय कुंदन और पराग मांदले की कहानियां ध्यान से पढ़ी जानी चाहिए।
कहानी आलोचना के खाते में इकलौता लेख राकेश बिहारी का है। यहां वे समाज वैज्ञानिक की नजरिये से पिछले दशक से लेकर वर्तमान में लिखी जा रही कहानियों पर सरसरी निगाह दौड़ाई है। बेहतर होता अंक में शामिल कहानियों को लेकर एक विश्लेषणात्मक लेख होता। वरिष्ठ पत्रकार और साहित्य प्रेमी सुधांशु गुप्त ने हाल फिलहाल निरंतर प्रकाशित हो रही पत्रिकाओं के संपादकों से ‘कहानी के समकाल’ का हाल जानना चाहा है। आजकल के संपादक राकेश रेणु का कहना है कि हाशिये का जो समाज है, उसकी कथाएं परिदृश्य से बाहर है।
वहीं उसके उलट विचार लमही संपादक विजय राय की है युवा कथाकारों की कहानियों का चरित्र बाजारोन्मुख ही नहीं है, उसमें बाजार का विरोध भी है, बिसराये जा रहे सरोकार भी हैं, वंचितों की सुधि भी है। वागर्थ संपादक ऐसे कहानीकारों की जरूरत महसूस करते हैं जिनके लेखन में निरंतरता और अर्थवत्ता दोनों बनी रहे . सबसे बड़ी चुनौती ‘ सस्टेन’ करने की है और संभावनाओं के निरंतर विकास की। संजय सहाय जो हंस का संपादन करते हैं, वे कहानी के वर्तमान परिदृश्य से संतुष्ट नहीं हैं। अनिल यादव और किरण सिंह अच्छी कहानियां लिख रहे हैं, लेकिन कुल मिलाकर उनका यही कहना है कि आज का कहानीकार कोई नयी जमीन तैयार नहीं कर रहा है।
आलोक मेहता ने मनोहर श्याम जोशी और राजेंद्र माथुर के संपादकीय व्यक्तित्व को लेकर लिखा लेख पठनीय है। पाठक पूरी तरह कहानियों पर केंद्रित रहे, इस कारण इस विशेषांक में एक भी कविता नहीं है। कविताएं सबसे ज्यादा छापी जाने वाली और सबसे कम पढ़ी जाने वाली विधा है। कविता का न होना उन्नीस कहानियों को पढ़ने का माहौल तैयार करना है। यह एक चलताऊ टिप्पणी होगी कि अंक संग्रहणीय है। यह कहा जाना चाहिए कि भले इस विशेषांक की परिकल्पना हड़बड़ी में की गई हो लेकिन अंक में शामिल कोई भी कहानी हड़बड़ी नहीं लिखी गई हैं। इस सफलता का श्रेय संपादक और उनके संपादकीय सहयोगियों को जाता है।


 
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