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महात्मा गांधी की प्रासंगिकता

22/10/2019

महात्मा गांधी की प्रासंगिकता

बनवारी

ह महात्मा गांधी को विशेष रूप से याद करने का वर्ष है। उनके जन्म को 150 वर्ष बीत चुके हैं। इतना समय बीत जाने के बाद भी उनके जीवन और विचारों का महत्व हमारे लिए कम नहीं हुआ। देश की राजनीति में तो उनका स्मरण निरंतर किया ही जाता रहता है। हमारे समय का कोई दूसरा अकेला व्यक्ति ऐसा नहीं है, जिसका भारतीय समाज पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा हो। महात्मा गांधी का प्रभाव भारत के बाहर भी उतना ही व्यापक दिखाई देता है। 50 वर्ष पहले उनकी जन्म शताब्दी मनाई गई थी, तब यह बात विशेष रूप से सामने आई थी। उनकी जन्म शताब्दी मनाने में संयुक्त राष्ट्र ने पहल की थी। दुनियाभर में उनके जीवन और विचारों को लेकर कार्यक्रम आयोजित हुए थे। फिर उसी कड़ी में संयुक्त राष्ट्र द्वारा यह जानने की कोशिश की गई थी कि पिछले सौ वर्ष में महात्मा गांधी के जीवन और विचारों पर दुनिया में कहां और कितना लिखा गया है। इसके बारे में दुनियाभर में फैले अपने तंत्र द्वारा संयुक्त राष्ट्र ने जानकारी जुटाई।

उसके द्वारा करवाए गए इस सर्वेक्षण के निष्कर्ष हमारे लिए भी चैकाने वाले थे। उसके सर्वेक्षण में यह तथ्य सामने आया कि दुनिया के लगभग सभी देशों में गांधी जी पर काफी कुछ लिखा गया है। इस कालावधि में जितना उनके जीवन और विचारों पर लिखा गया है, उतना विश्व के किसी और व्यक्ति के बारे में नहीं लिखा गया। उस सर्वेक्षण में यह बात विशेष रूप से रेखांकित की गई थी कि उतना कार्ल मार्क्स पर भी नहीं लिखा गया, जितना महात्मा गांधी पर लिखा गया है। कार्ल मार्क्स पर जो लिखा भी गया है, वह अधिकतर उनके राजनैतिक विचारों को लेकर ही लिखा गया है। लेकिन गांधी जी पर लिखा गया साहित्य उससे कहीं अधिक विस्तृत है। वह जितना उनके विचारों पर केंद्रित रहा है, उतना ही उनके जीवन पर भी केंद्रित रहा है। यह तथ्य केवल मार्क्सवादियों को ही आश्चर्यजनक नहीं लगा होगा।

1917 की रूसी क्रांति के बाद दुनियाभर में मार्क्सवाद का एक क्रांतिकारी राजनैतिक विचार के रूप में जैसा प्रसार हुआ था, उसे देखकर यह तथ्य सभी को चकित करेगा। एक समय था जब विश्व की 40 प्रतिशत आबादी किसी न किसी तरह के मार्क्सवादी शासन में थी। दूसरी तरफ भारत समेत दुनिया का कोई देश ऐसा नहीं था, जो अपने यहां महात्मा गांधी के राजनैतिक विचारों के अनुरूप शासन व्यवस्था खड़ी कर पाया हो। बावजूद इसके कि महात्मा गांधी का जीवन और उनके विचार जिस तरह के नैतिक मूल्यों पर आधारित थे, वह मानव स्वभाव के अधिक अनुरूप है और उसे बड़ी सहजता से प्रभावित करता है। महात्मा गांधी के स्वराज्य संबंधित विचार दुनिया के दूसरे देशों के लिए कोई कम क्रांतिकारी नहीं थे। भारत में पराधीनता के काल से पहले भारतीय समाज भले स्वराज्य के सिद्धांत के आधार पर अपनी शासन व्यवस्था गठित किए रहा हो, दुनिया में कोई और देश ऐसा नहीं था, जिसने एक उन्नत शासन प्रणाली के रूप में स्वराज्य को स्वीकार किया हो।

बहुत सी मार्क्सवादी राज्य व्यवस्थाएं आंतरिक दबाव में भी चरमराई। इन सब कारणों से मार्क्सवादी विचारधारा का ढलान शुरू हुआ। लेकिन महात्मा गांधी के जीवन और विचारों का आकर्षण बना रहा है। उसका प्रचार किसी संगठित तंत्र के द्वारा नहीं किया गया है। उसका आंतरिक बल नैतिक है, इसलिए विचारशील लोगों में उसकी ग्राह्यता सहज रही है। दुनिया में पूंजीवाद और मार्क्सवाद के संकट ने उसके आकर्षण और उसकी ग्राह्यता को और बढ़ाया है।

यूरोपीय राजनैतिक व्यवस्थाएं तो फ्रांसी क्रांति तक सदा बहुसंख्यक जनसंख्या को दास बनाकर ही खड़ी की गई थी। यूरोप के बाहर भी सब जगह जीवन और संपत्ति का स्वामी राजा या राज्य को ही माना गया था। यह स्थिति चीन और जापान जैसी विकसित सभ्यताओं में तो थी ही, मध्य पूर्व के मुस्लिम देशों में भी यही स्थिति थी। अफ्रीका या अन्यत्र कबीलाई समाजों में एक सीमित अर्थ में सामूहिक शासन था। लेकिन कबीलाई शासन विधि पर कम, रूढ़ि पर अधिक निर्भर होता है। उसके कारण वह न्याय और नैतिकता की सीमाएं लांघता रहता है। राजनैतिक स्तर पर दुनिया में गांधी के जीवन और विचारों की जगह निश्चय ही मार्क्सवाद अधिक सफल हुआ। पर इसका कारण यह है कि उसका प्रसार बलात् हुआ था। मार्क्सवाद से प्रभावित मुट्ठीभर लोगों ने हिंसक साधनों का इस्तेमाल करके पुरानी राजसत्ताएं पलटीं और नई राजसत्ताओं की नींव डाली। सभी मार्क्सवादी राजसत्ताएं अत्यंत दमनकारी रही है। वे समानता और सामूहिकता का नारा लगाकर जबरन स्थापित की गईं थीं। लेकिन कोई मार्क्सवादी शासन अपने यहां समानता स्थापित नहीं कर पाया। सामूहिकता के नाम पर सभी लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और उत्पादन के साधनों पर उनका स्वामित्व समाप्त करके एक निरंकुश मार्क्सवादी तंत्र को सारी सत्ता सौंप दी गई। इस तरह मार्क्सवादी सत्ताओं के अस्तित्व में आने से पहले मार्क्सवादी विचार में जो क्रांतिकारिता देखी जा रही थी, वह भी उसके द्वारा स्थापित शासन प्रणालियों ने समाप्त कर दी।

दुनियाभर में मार्क्सवाद का विस्तार करने में जितनी भूमिका सोवियत शासन की रही है, उतनी ही भूमिका अमेरिकी विश्वविद्यालय और यूरोपीय शिक्षा जगत में सक्रिय वामपंथियों की रही है। सोवियत रूस और चीन में जिस तरह का निरंकुश और दमनकारी राज्य स्थापित हुआ, उससे अमेरिकी और यूरोपीय शिक्षा संस्थानों में उसके समर्थक निराश हुए। बहुत सी मार्क्सवादी राज्य व्यवस्थाएं आंतरिक दबाव में भी चरमराई। इन सब कारणों से मार्क्सवादी विचारधारा का ढलान शुरू हुआ। लेकिन महात्मा गांधी के जीवन और विचारों का आकर्षण बना रहा है। उसका प्रचार किसी संगठित तंत्र के द्वारा नहीं किया गया है। उसका आंतरिक बल नैतिक है, इसलिए विचारशील लोगों में उसकी ग्राह्यता सहज रही है। दुनिया में पूंजीवाद और मार्क्सवाद के संकट ने उसके आकर्षण और उसकी ग्राह्यता को और बढ़ाया है। इस सबके बावजूद महात्मा गांधी के जीवन और विचारों का किसी देश या समाज के जीवन पर स्थायी प्रभाव पड़ा हो, यह दिखाई नहीं देता। विचारशील लोगों में उनके विचारों का आकर्षण आदर्श के रूप में ही रहा है। उसके आधार पर दुनिया में कहीं कोई व्यवस्थाएं बनी हों, ऐसा नहीं है। दुनिया में उनका राजनैतिक प्रभाव सत्याग्रह को एक राजनैतिक अस्त्र के रूप में इस्तेमाल करने के लिए रहा है। पर उसके भी अधिक उदाहरण दिखाई नहीं देते। महात्मा गांधी जीवन भर भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उलझे रहे। इसलिए अपने विचारों को कोई व्यवस्थित और सांस्थानिक रूप देने का उन्हें मौका ही नहीं मिला।

छिटपुट टिप्पणियों के अलावा व्यवस्थित रूप से उनके विचार 1909 में लिखी गई उनकी पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ में मिलते हैं। महात्मा गांधी ने यह पुस्तक मुख्यत: भारत के स्वाधीनता संग्राम को लक्षित करके लिखी थी। लेकिन इस छोटी सी पुस्तक में उनकी सभ्यता संबंधी कुछ मुलभूत धारणाएं भी हैं। अपनी इन धारणाओं के आधार पर ही वे भारत के स्वाधीनता के संघर्ष को भारतीय सभ्यता और यूरोपीय सभ्यता के बीच संघर्ष का स्वरूप देते हुए यह प्रयत्न करते रहे कि भारत केवल ब्रिटिश शासन से ही मुक्त न हो, वह यूरोपीय सभ्यता के प्रभाव को भी छोड़ दे और अपनी सभी व्यवस्थाएं अपनी सभ्यता की मूल मान्यताओं के आधार पर बनाए। अपने जीवन काल में वे अपने राजनैतिक संघर्ष को नैतिक आधार पर संगठित करते रहने में सफल हुए। लेकिन उनके सभी अनुयायी उनकी बातों को यंत्रवत मानकर उनके पीछे-पीछे चलते भर रहे थे। किसी ने उनकी सभ्यता संबंधी अवधारणाओं को ठीक से आत्मसात किया हो और उसे लेकर आगे बढ़ा हो ऐसा दिखता नहीं है। यही वजह है कि उनके राजनैतिक जीवन के अंतिम दौर में जब देश स्वतंत्र हो रहा था तो उनके अनुयायी भी उनका बताया रास्ता छोड़कर उसी दिशा में आगे बढ़ते गए, जो पराधीनता के काल में स्थिर हुआ था। इसे हम महात्मा गांधी की असफलता नहीं कह सकते।

गांधी जी के विचारों को सबसे अधिक नुकसान अपने आपको गांधीवादी कहने वाले लोगों ने पहुंचाया है। उन्होंने गांधीजी के विचारों को रूरल डेवलपमेंट के स्तर पर उतार दिया है। उन्होंने गांधी जी के हिन्दू- मुस्लिम एकता के संदेश को भी इतने गलत रूप में ग्रहण किया है कि वे अधिकांश समय हिन्दू धर्म के विरोध में और मुस्लिम समाज के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं।

क्योंकि गांधी जी के जीवन और विचार का मूल आधार भारतीय सभ्यता की नैतिक व्यवस्थाएं ही थीं। उस रूप में वह हमारे समाज की ही असफलता थी कि वह गांधी जी जैसे तेजस्वी नेतृत्व के बावजूद अपनी सभ्यता की दिशा में आगे नहीं बढ़ पाया। स्वतंत्र भारत में जो लोग शासन में बैठे वे अपनी यूरोपीय शिक्षा के कारण भारतीय सभ्यता की अपनी स्मृति खो चुके थे। उन्हें यूरोपीय सभ्यता से विरत करने में गांधी जी जीवनभर लगे रहे। लेकिन स्वाधीनता संघर्ष न उनको इतना समय उपलब्ध कर पाया कि वे भारतीय सभ्यता और यूरोपीय सभ्यता का अंतर पूरी तरह स्पष्ट कर सकें, न वह उनके अनुयायियों को इतना समय दे पाया कि वे भारतीय सभ्यता के अनुरूप शासन को ढालने की समझ और पुरुषार्थ विकसित कर सकें। काल की गति तियर्क होती है, सीधी नहीं होती। आड़ेत् िारछे रूप में ही सही, भारतीय समाज धीरे- धीरे अपनी आस्थाओं की ओर लौट रहा है। उसकी इस यात्रा में गांधी जी के विचारों का निरंतर साथ रहा हो, यह आवश्यक नहीं है। लेकिन इसका श्रेय उन्हें अवश्य दिया जाएगा कि पराधीनता के दौर में भारतीय समाज को अपनी सभ्यता की दिशा में मोड़ने की सबसे समर्थ कोशिश उन्होंने ही की थी। उन्होंने जो लक्ष्य सामने रखा था, वह कठिन लक्ष्य था। क्योंकि पिछली दो शताब्दियों में यूरोपीय जाति अपने भौतिक जीवन का कायाकल्प करने में सफल हो गई थी। उसकी दिशा चाहे जितनी आसुरी हो उसमें बल है।

औपनिवेशीकरण के दौर में उसने जो आसुरी बल जुटाया है, उससे वह अपने साधारण नागरिकों को एक सुविधाजनक जीवन स्तर देने में सफल हो गई है। यह भौतिक जीवन ही इस समय दुनिया के सभी समाजों ने अपने लिए अनुकरणीय बना लिया है। महात्मा गांधी 18 वर्ष की बहुत कम आयु में 1888 में वकालत पढ़ने के लिए इंग्लैंड गए थे। वहां से आकर 1893 में वे वकालत करने के लिए दक्षिण अफ्रीका चले गए। उस समय तक यूरोप में उत्पादन प्रणालियों का मशीनीकरण आरंभ हो गया था। इतिहासकारों ने उसे औद्योगिक क्रांति कहा है। पर जो परिवर्तन हुए थे, उनके लिए यह भारी-भरकम शब्द है। तब तक बिजली का ऊर्जा के एक नए और विलक्षण साधन के रूप में उपयोग आरंभ नहीं हुआ था। आज यूरोप-अमेरिका जिस तरह के वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी विकास के लिए जाने जाते हैं, वे बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध की देन है। गांधी जी की वैचारिक धारणाएं जिन दिनों दृढ़ हो रही थी, वह यूरोपीय जीवन के कायाकल्प के लिहाज से आरंभिक काल ही था।

तथाकथित औद्योगिक क्रांति के समय तो वस्त्र उद्योग में व्यापक मशीनीकरण के अलावा परिवहन आदि क्षेत्र में भाप के इस्तेमाल से बड़े परिवर्तन हुए थे। मुख्य समृद्धि अमेरिकी महाद्वीप पर नियंत्रण से आई थी, जिसके बल पर यूरोपीय शक्तियां 1800 से 1900 तक लगभग समूची दुनिया पर अपना राजनैतिक वर्चस्व स्थापित करने में सफल हो गई थी। उसमें भी मुख्य योगदान आग्नेयास्त्रों के विकास का था। बीसवीं सदी में जो वैज्ञानिक प्रगति हुई है, उसकी प्रेरक शक्तियां भी युद्ध में अजेय होने की कामना से निकली हैं। इसलिए यूरोपीय सभ्यता युद्ध को केंद्र में रखकर ही खड़ी हुई है। गांधी जी अपनी कम आयु में और उस आरंभिक दौर में भी यूरोपीय सभ्यता के इन सभी पहलुओं को समझने में सफल हो गए थे, यही उनकी विलक्षणता है। उन्हें भारतीय सभ्यता को भी व्यवस्थित रूप से समझने का अवकाश नहीं था। फिर भी भारतीय समाज के बारे में उनकी समझ बहुत गहरी और पैनी दिखाई देती है। महात्मा गांधी का जीवनकाल यूरोपीय सभ्यता का उत्कर्ष काल था। उसके इस उत्कर्ष काल में उसे आसुरी बताना और मनुष्य को मनुष्यता से गिराने वाली चित्रित करना कम साहस का काम नहीं था। यह साहस उन्हें अपनी भारतीय सभ्यता में गहरी निष्ठा से मिला था।

भारतीय सभ्यता में गहरी निष्ठा के कारण ही भारतीय समाज ने उन्हें महात्मा की पदवी दी थी। पर अपने जीवन काल में ही उन्हें अपने आलोचकों का भी सामना करना पड़ा था। उनकी आलोचना मुख्यत? अहिंसा पर उनके अतिशय जोर दिए जाने के कारण हुई है। इसके अलावा उन्हें मुस्लिम आक्रामकता के सामने हिन्दुओं को सहिष्णुता की सीख देने के लिए आलोचना का शिकार बनाया जाता रहा है। गांधी जी का उद्देश्य भारतीय समाज में शौर्य जगाना था। उनकी मान्यता थी कि अंगे्रजों ने जिस हिंसक तंत्र का विकास कर लिया है, उसका मुकाबला भारतीय हिंसा से नहीं कर सकते। हिंसा का इस्तेमाल कुछ ही लोग कर सकते हैं। उसके बल पर अंग्रेजी शासन को समाप्त नहीं किया जा सकता। अंग्रेजी शासन समाप्त करने के लिए समूचे भारतीय समाज के संगठित बल की आवश्यकता थी। और वह बल नैतिक और अहिंसक साधनों से ही प्राप्त हो सकता था। वे मानते थे कि शौर्य के लिए अस्त्रों से अधिक अभय की आवश्यकता होती है और इसमें संदेह नहीं कि महात्मा गांधी ने 1919 के पहले बड़े आंदोलन से ही देश में ब्रिटिश शासन का भय समाप्त कर दिया था। यह लगता है कि कई बार उन्होंने अहिंसा पर अनुपात से अधिक जोर दिया। पर इसके लिए भी हमें अपने उस संग्राम के सेनापति की बुद्धि पर ही विश्वास करना होगा। इसी तरह मुस्लिम समस्या भी ब्रिटिश शासन की देन थी।

ब्रिटिश शासकों से पहले मराठा मुस्लिम साम्राज्य ध्वस्त कर चुके थे। मुसलमानों को फिर से राजनैतिक शक्ति बनाने और हिन्दुओं के खिलाफ खड़ा करने का काम अंग्रेजों ने किया। उन्हीं की शासकीय नीतियों के कारण देश की जनसंख्या में मुसलमानों का अनुपात 10-12 प्रतिशत से बढ़कर 25 प्रतिशत हो गया था। महात्मा गांधी इस ब्रिटिश नीति को असफल बनाने के लिए ही हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात करते रहे थे। गांधी जी ने यूरोपीय सभ्यता की मुख्यत: तीन आधारों पर तीव्र आलोचना की थी। उन्होंने कहा कि आधुनिक यूरोपीय राज्य एक सर्वनियंता शक्ति हो गया है। उसके रहते व्यक्ति स्वतंत्र नहीं रह सकता। यूरोपीय राज्य देश की सारी संपत्तियों का और प्रजा के जीवन का स्वामी है। लोग राज्य के कानूनों के दास बना दिए गए हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति के पास अपने विवेक से चलने की संभावना नहीं बचती। उसकी तुलना में उन्होंने स्वराज्य का विचार रखा। क्योंकि एक तो सभी भारतीय उसके अभ्यस्त रहे हैं, दूसरे उसमें शासन स्वविवेक और सामाजिक इकाइयों के आंतरिक अनुशासन पर निर्भर करता है। इससे सभी मनुष्यों का नैतिक विकास होता है।

यूरोपीय सभ्यता की आलोचना का उनका दूसरा आधार यह था कि औपनिवेशिक काल में यूरोपीय जाति ने धर्मांतरण के जरिए ईसाई धर्म का दुनियाभर में विस्तार किया है। धर्मांतरण की धारणा मनुष्य और ईश्वर के सहज संबंध के निषेध पर आधारित है। गांधी जी का कहना था कि जीव मात्र को अपने अंत: विवेक से ईश्वर के साथ अपना संबंध ज्ञात होता है। उसकी किसी दूसरे मजहब में बलात् निष्ठा पैदा करना दिव्य सत्ता से उसके नैसर्गिक संबंध को क्षीण करना है। ईसाई धर्म वैसे भी ईश्वर को सृष्टि से बाहर मानने के कारण उससे मनुष्य के नैर्सिगक संबंध को असंभव मानता है। इसलिए ईश्वर में निष्ठा सिर्फ एक राजनैतिक निष्ठा होकर ही रह जाती है। यूरोपीय सभ्यता की आलोचना का उनका तीसरा आधार यह था कि उसने मनुष्य को मशीनों का दास बनाने वाली प्रौद्योगिकी का विकास किया है। मशीन तभी तक संगत है जब तक वह मनुष्य के कौशल को बढ़ाने में सहायक की भूमिका निभाती है। लेकिन हम आज देखते हैं कि आधुनिक प्रौद्योगिकी ने उत्पादन प्रक्रिया में मनुष्य की भागीदारी बहुत कम कर दी है और मुट्ठीभर लोगों या शक्तियों का पूरी दुनिया पर नियंत्रण संभव बना दिया है।

आधुनिक प्रौद्योगिकी मानवहंता होने की दिशा में बढ़ रही है। वह प्रकृति के सामने तो संकट पैदा कर ही चुकी है। अब वह मानव विनाश की दिशा प्रशस्त कर रही है। गांधी जी की यही सब मान्यताएं उन्हें आज भी प्रासंगिक बनाए हुए है। भारत में उनका नाम जप होता रहा है। लेकिन उन्हें ठीक से समझने और उनके विचारों की व्यावहारिकता पहचानने की कोई गंभीर कोशिश नहीं हुई। गांधी जी के विचारों को सबसे अधिक नुकसान अपने आपको गांधीवादी कहने वाले लोगों ने पहुंचाया है। उन्होंने गांधीजी के विचारों को रूरल डेवलपमेंट के स्तर पर उतार दिया है। उन्होंने गांधी जी के हिन्दू-मुस्लिम एकता के संदेश को भी इतने गलत रूप में ग्रहण किया है कि वे अधिकांश समय हिन्दू धर्म के विरोध में और मुस्लिम समाज के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं। बहुत से गांधीवादी तो अपने आपको नास्तिक बताने में भी लज्जा अनुभव नहीं करते। कांग्रेस नेहरू काल में ही गांधी जी के विचारों से उल्टी दिशा में चली गई थी। नेहरू के कारण समूची कांग्रेस अब तक देश में यूरोपीय सभ्यता का पोषण करने में लगी रही है। उसने महात्मा गांधी की राजनैतिक पूंजी का उपयोग नेहरू-इंदिरा गांधी वंश की सत्ता बनाए रखने के लिए ही किया है।

हिन्दूवादी संगठन अंग्रेजों की मुस्लिम समर्थक नीति के कारण अस्तित्व में आए थे। उनमें से कई गांधी जी के प्रति श्रद्धा के बावजूद अहिंसा और मुस्लिम प्रश्न पर इतने पूर्वग्रह पाले रहते हैं कि गांधी जी को ठीक से समझने की कोशिश नहीं कर पाते। इस सबके कारण गांधी जी के नाम जप के अलावा उन्हें समझने की कोई गंभीर कोशिश नहीं हो पाती। पर भारतीय समाज धीरे-धीरे ही सही अपनी सभ्यता की दिशा में बढ़ रहा है। आड़े-तिरछे तरीके से सही भारतीय समाज अपने जीवन की दिशा को देर-सबेर अपनी सभ्यता की ओर पूरी तरह मोड़ने में सफल हो जाएगा। उस समय किसी को गांधी जी की याद न भी आए, पर वह गांधी जी के लक्ष्य की ही सिद्धि होगी। यही गांधी जी की सार्थकता है।


 
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