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कुनबा बदलने की मची होड़

11/08/2019

कुनबा बदलने की मची होड़

सुधीर जोशी

राज्य में विधानसभा चुनाव से पहले एनसीपी और कांग्रेस में भगदड़ का माहौल है। दल बदलकर आने वाले नेताओं की पहली पसंद सत्तारूढ़ पार्टी बनी है।

भा री बारिश और बाढ़ जैसे हालातों के बीच अपना राजनीतिक कुनबा बदलने वाले नेताओं ने जरा भी नहीं सोचा कि क्या उनका ये फैसला हालातों के अनुकूल हैं या नहीं। यानी ऐसे नेताओं के लिए अवसरवादिता विचारधारा, निष्ठा और राज्य के प्रति नैतिक दायित्व से भी बड़ी है। इन्हें केवल सत्ता की मुख्य धारा में बने रहना है। राकांपा मुंबई के अध्यक्ष सचिन अहिर ने जब शिवसेना में प्रवेश किया तो शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि सचिन अहिर के शिवसेना में आने से शिवसेना मजबूत होगी। शिवसेना प्रमुख के इस बयान ने यह बता दिया कि वे अपनी पार्टी से ज्यादा दूसरी पार्टी से शिवसेना में आए लोगों पर भरोसा करते हैं। दूसरी ओर राकांपा छोड़कर शिवसेना में आए सचिन अहिर पर आरोप लगाते हुए राकांपा सुप्रिमो शरद पवार ने कहा कि जिन लोगों को अपने आप पर भरोसा नहीं होता, वे दूसरी पार्टी में जाकर अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित करते हैं। शिवसेना का दामन थामने के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में सचिन अहिर ने कहा कि शरद पवार हमारे ह्दय में बसते हैं तो शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे मेरे शरीर में वास करते हैं। राजनीतिक पंडितों का दावा है कि सचिन अहिर भायखला निर्वाचन क्षेत्र से विधानसभा चुनावी जंग में उतर सकते हैं। इस क्षेत्र में सचिन अहिर के मामा अरूण गवली का अच्छा खासा दबदबा है, इसलिए यहां से सचिन अहिर की जीत को नकारा नहीं जा सकता। सचिन अहिर से पहले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राधाकृष्ण बिखे पाटिल को अपनी पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो चुके हैं। इसी क्रम में, पहले शिवसेना और उसके बाद कांग्रेस में लंबा समय गुजारने वाले नारायण राणे को भाजपा में सीधे गेट से प्रवेश नहीं मिला तो उन्होंने महाराष्ट्र स्वाभिमान पार्टी का निर्माण किया और उसे एनडीए में स्थान दिलाकर राज्यसभा के सांसद बन गए। लेकिन दिल्ली में राणे का मन नहीं लग रहा है और वे आगामी विधानसभा चुनावी जंग में उतरना चाहते हैं। जिस सीट से राणे चुनावी जंग में उतरना चाहते हैं, वह सीट शिवसेना नहीं छोड़ना चाहती, ऐसे में यह कहा जा रहा है कि विधानसभा चुनावी जंग में राणे को लेकर एक बार फिर हंगामा मच सकता है। कहा तो यह भी जा रहा है कि नारायण राणे ने भाजपा की संसद सदस्यता छोड़ने का मन भी बना लिया है। राज्य की राजनीति में कभी अच्छा खासा वर्चस्व रखने वाली राकांपा के नेता एक बाद एक करके भाजपा का दामन क्यों थाम रहे हैं, यह सबसे बड़ा प्रश्न है। सचिन अहिर जिन्हें राकांपा सुप्रिमो शरद पवार ने मुंबई अध्यक्ष की कमान सौंपी थी, जब उन्होंने ही राकांपा छोड़ दी तो फिर अन्य नेताओं का शामिल होना बड़ी बात नहीं। राकांपा प्रमुख शरद पवार से बहुत निकट का संबंध रखने वाले तथा राकांपा के प्रदेशाध्यक्ष् मधुकर राव पिचड़, उनके पुत्र वैभव पिचड़ के साथ साथ नवी मुंबई की राजनीति के शिखर पुरुष कहे जाने वाले गणेश नाईक तथा उनके पुत्र संदीप नाईक तथा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कालिदास कोलंबकर में भाजपा में आ गए हैं। राकांपा की महिला प्रदेशाध्यक्ष चित्रा वाघ, शिवेंद्रराजे भोसले, राकांपा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष तथा वरिष्ठ नेता मधुकर राव पिचड़, मनोहर नाईक जैसे नेताओं का पार्टी छोड़कर जाना यह बता रहा है कि कुनबा नहीं राजनीति की मुख्य धारा में रहना ज्यादा जरूरी है। पश्चिम महाराष्ट्र के कद्दावर कांग्रेसी नेता हर्षवर्धन पाटिल के बारे में यह कहा जा रहा है कि वे किसी भी क्षण भाजपा में आ सकते हैं। भाजपा शिवसेना के बीच भले ही मुख्यमंत्री पद को लेकर घमासान मचा हो फिर भी भाजपा तथा शिवसेना में आने के लिए कांग्रेस तथा राकांपा के नेताओं के बीच मची होड़ यही बता रही है कि सभी उगते सूर्य को सलाम करते हैं। गणेश नाईक, संदीप नाईक, वैभव पिचड़, शिवेंद्र राजे भोसले ऐसे नाम हैं, जिनकी अपने निर्वाचन क्षेत्र में अच्छी खासी पैठ है। मुंबई, नागपुर में तो भाजपा के विरोध में इस तरह के पोस्टर लगाए गए हैं कि भाजपा में प्रवेश जारी है, अब देखना यह है कि कुनबा बदलने वाले नेताओं का राजनीतिक भविष्य कब तक सुरक्षित रह पाता है।


 
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