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(स्मृति शेष) याद रहेंगी सुषमा स्वराज

08/08/2019

विक्रम बृजेन्द्र सिंह

त्तर का दशक। देशभर में इंदिरा का दबदबा। ऐसे माहौल में अंबाला शहर की मध्यमवर्गीय परिवार की एक हरियाणवी लड़की गैरकांग्रेसवाद की राजनीति करने सड़क पर उतरी। ..और, देखते ही देखते छा गई। ये थीं सुषमा स्वराज। बरास्ते अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद राजनीति वे जेपी के सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन की सूत्रधार बनीं। जब 75 में इमरजेंसी आई तो संघर्ष के उस दौर के दिग्गज नेताओं के साथ पूरी हिम्मत व बहादुरी से तानाशाही शासन का मुकाबला किया। नतीजा 77 में जब जनता पार्टी सत्ता में आई तो हरियाणा की देवीलाल सरकार में न सिर्फ सबसे कम उम्र की मंत्री बनीं बल्कि 1979 में पार्टी की प्रदेश अध्यक्ष भी चुनी गईं। 80 में जनता पार्टी में टूटन हुई तो विद्यार्थी जीवन में संघ के आनुषांगिक संगठन अभाविप में सक्रिय रही सुषमा ने बीजेपी को चुना। उन्होंने चुनौतियों को हमेशा स्वीकार किया। अटल-आडवाणी-मुरली मनोहर के आभामंडल से घिरी भाजपा में यूं तो दर्जनों क्षमतावान व प्रबुद्ध नेताओं की लंबी पांत हमेशा रही। लेकिन सुषमा ने अपनी अलग जगह कायम की। संसद में रहते हुए अपने सारगर्भित ओजस्वी भाषणों के जरिये शोहरत की बुलंदी हासिल की। 1996 में तेरह दिन की अटल सरकार के खिलाफ विश्वास मत पर बहस के दौरान टीवी पर उन्हें प्रतिपक्षी नेताओं से जिसने भी भिड़ते देखा वो उनकी वाकशैली का कायल हो गया। अटल बिहारी वाजपेयी के बाद संसद में वे भारतीय जनता पार्टी की सबसे बड़ी क्राउड पुलर वक़्ता थीं। साम्प्रदायिकता, कश्मीर, अनुच्छेद 370 व हिंदुत्व पर उनके भाषणों की लंबी फेहरिस्त है। निष्ठा ऐसी कि पार्टी ने जो जिम्मेदारी दी उसे उन्होंने बखूबी निभाई। बेल्लारी से सोनिया गांधी के खिलाफ चुनावी समर में उतरीं तो दिल्ली में भी प्रतिकूल परिस्थिति में पार्टी की ओर से सौंपे मुख्यमंत्री पद का दायित्व निभाया। अटलजी की सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्री, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण तथा संसदीय कार्य और फिर मोदी -1 में विदेश मंत्री रहते हुए तमाम उल्लेखनीय कार्य किये। संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर व आतंकवाद मुद्दे पर पाकिस्तान को ललकारा तो हिंदी को विश्वस्तर पर प्रतिष्ठापित करने में भी पीछे नहीं रहीं। सोशल मीडिया खासकर ट्विटर का भी उन्होंने आम जनों की समस्याएं निपटाने में बेहतर उपयोग किया। चाहे पाकिस्तानी बच्ची के इलाज के लिए वीजा दिलाने का काम हो अथवा विदेशों में फंसे भारतीयों को स्वदेश लाने का, शिकायत मिलते ही सुषमा ने उस पर फौरन संज्ञान लिया। पाकिस्तान की जेल में कैद कुलभूषण जाधव अगर जिंदा है तो इसका श्रेय सुषमा स्वराज को जाता है। वह न केवल जाधव के मामले को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में ले गईं, बल्कि मशहूर वकील हरीश साल्वे को जाधव का केस लड़ने को राजी किया। वह भी मात्र एक रुपये की फीस में। सुषमा के निधन के बाद हरीश साल्वे ने भरे गले से बताया कि मौत से करीब दो घंटे पहले सुषमा ने उन्हें फोन करके कहा था कि 'बहुत दिन हो गए तुम मिले नहीं। ऐसा करो, किसी दिन चाय पीने आ जाओ और अपनी एक रुपये फीस के पैसे भी लेते जाना।' पाकिस्तान की जेल से छूटी मूक-बधिर युवती गीता (गीता नाम सुषमा ने ही दिया था) जो अब इंदौर के मूक-बधिर विद्यालय में रहती है, को जब बताया गया कि सुषमा जी का निधन हो गया है तो वह फूट-फूटकर रोने लगी। सच है, अगर सुषमा स्वराज ने प्रयास नहीं किये होते तो गीता की रिहाई न हुई होती। पाकिस्तान के कुछ लोग तो सुषमा को अपनी दूसरी मां मानते रहे हैं। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था। जो एक बार उनसे मिला, उन्हीं का होकर रह गया। दुनियाभर की महिलाएं उन्हें अपना आदर्श मानती थीं। उनके निधन पर दुनियाभर से शोक संदेश आए। सभी ने उन्हें अपना बताया। प्रवासी भारतीयों व इस्लामी देशों में रह रहे भारतीय मुस्लिमों के लिए बगैर भेदभाव कार्य करके उन्होंने लोकप्रियता हासिल की। अटल-आडवाणी की प्रिय रहीं सुषमा स्वराज ने पार्टी की पुरानी व नई पांत के बीच संतुलन बनाने का कार्य किया। आडवाणी के जन्मदिन पर वे उनका मनपसन्द केक लेकर जरूर पहुंचती रहीं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ,नितिन गडकरी व राजनाथ सिंह से भी उनके बेहतर रिश्ते रहे। इधर कुछ समय से गंभीर बीमारी के चलते उन्होंने खुद को राजनीति से दूर कर लिया था। बीता चुनाव उन्होंने नहीं लड़ा पर प्रचार किया। 67 साल की हो चुकी सुषमा बीमार होने के बाद भी सोशल मीडिया पर सदैव सक्रिय रहीं। उन्हें समझने के लिए उनका प्रधानमंत्री को किया गया आखिरी ट्वीट काफी है। ऐसा लगता है कि उन्हें अपनी मृत्यु का आभास हो चला था। जब विदा की बेला आई और वे अंतिम यात्रा पर निकलीं तो भी वे उसी तरह दिखाई दीं, जैसे हमेशा नजर आती थीं। एक सुहागिन की वेशभूषा में वे विदा हो गईं। वे भारतीय राजनीति की विभूति थीं। सदैव अनुकरणीय रहेंगी। 
(लेखक पत्रकार हैं।)


 
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