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आफत की बारिश

03/10/2019

प्रमोद भार्गव
मौसम के अनुमानों को गलत साबित करते हुए मूसलाधार बारिश ने 11 राज्यों में तबाही मचा दी। इसबार तबाही का संकट महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान से शुरू हुआ और सितंबर माह के अंत में बिहार और उत्तर-प्रदेश में तांडव बनकर टूट पड़ा। इससे राजधानी पटना के 80 प्रतिशत घरों में पानी भर गया और बिहार के 14 जिले प्रभावित हैं। पटना की सड़कों पर नावें चल रही हैं और एनडीआरएफ दो हैलिकाॅप्टर से बाढ़ में फंसे लोगों को बचाने में लगे हैं। बिहार में 23 और उत्तर-प्रदेश में 107 लोग अपने प्राण गंवा चुके हैं। देश में डेढ़ करोड़ से भी ज्यादा लोग प्रभावित हुए और कुल 1275 लोगों को पानी ने लील लिया। सितंबर में 247.1 मिमी बारिश हुई। जो औसत से 48 प्रतिशत अधिक है। सितंबर में बारिश ने 102 साल का रिकाॅर्ड तोड़ दिया है। इससे पहले 1901 में इतनी बारिश हुई थी। पिछले 125 साल में मानसून की बारिश 107 प्रतिशत हो चुकी है और अभी भी मानसून की वापसी के संकेत नहीं मिले हैं, लिहाजा यह आंकड़ा बढ़कर 110 प्रतिशत हो सकता है। देश में कुल 910 मिमी बारिश हो चुकी है, जबकि सामान्य बारिश का औसत 860 मिमी है। इस बार मौसम विज्ञान विभाग और मौसम की जानकारी देने वाली निजी एजेंसी स्काईमेट सटीक भविष्यवाणी करने में पूरी तरह असफल रही है। शुरू में मौसम विभाग ने 98 प्रतिशत बारिश होने की संभवना जताई थी, जो बाद में घटाकर 96 फीसदी कर दी थी। इसी तरह स्काईमेट ने 96 प्रतिशत बारिश की भविष्यवाणी की थी, जो गलत साबित हुई।
बारिश के अनुमान गलत क्यों साबित हुए, इसका तार्किक जवाब मौसम विभाग के पास नहीं है। फिर भी उसका कहना है कि प्रशांत महासागर में अलनीनो के प्रकट हो जाने से शुरू में इसने मानसून को बरसने नहीं दिया। इसलिए जुलाई में कम बारिश हुई। इसी समय हिंद महासागर में मानसून के अनुकूल वातावरण तैयार हुआ। नतीजतन बंगाल की खाड़ी में कम दबाव का क्षेत्र बना, जिससे अगस्त और सितंबर में कई राज्यों में भारी बारिश हुई। इस असंतुलित बारिश ने कई राज्यों में जहां बाढ़ के कठिन हालात उत्पन्न कर दिए, वहीं इन्हीं राज्यों के कई क्षेत्रों में सूखे के हालात आज भी बने हुए हैं।
उत्तराखंड व हिमाचल में भू-स्खलन अभी भी जारी है। नदी-नाले उफान पर हैं। कई बड़े बांधों के भर जाने के बाद दरवाजे खोल देने से त्रासदी और भयावह हो गई है। घरों, सड़कों, बाजारों, खेतों और रेल पटरियों के डूब जाने से अरबों रुपए की संपत्ति नष्ट हो गई। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कहना है कि प्राकृतिक आपदा पर किसी का नियंत्रण नहीं है। परंतु हकीकत इससे जुदा है। इस आपदा को आमंत्रित हम और हमारी नीतियां, अनियोजित शहरीकरण व पर्यावरण के विनाश की पीठ पर आधुनिक विकास करके बढ़ा रहे हैं। इसलिए बाढ़ की त्रासदी देश में नियमित हो गई है। जो जल जीवन के लिए जीवनदायी वरदान है, वही अभिशाप साबित हो रहा है। इन आपदाओं के बाद केंद्र और राज्य सरकारें आपदा प्रबंधन पर अरबों रुपए खर्च करती हैं। करोड़ों रुपए बतौर मुआवजा देती हैं, बावजूद आदमी है कि आपदा का संकट झेलते रहने को मजबूर बना हुआ है। जबकि जल निकसी और उसके संग्रह के उपाय ठीक से कर दिए जाएं तो नगर बाढ़ की त्रासदी से बच सकते हैं।
बारिश का 90 प्रतिशत पानी तबाही मचाता हुआ समुद्र में समा जाता है। यह संपत्ति की बरबादी तो करता ही है, खेतों की उपजाऊ मिट्टी भी बहाकर समुद्र में ले जाता है। देश हर तरह की तकनीक में पारंगत होने का दावा करता है, लेकिन जब हम बाढ़ की त्रासदी झेलते हैं तो ज्यादातर लोग अपने बूते ही पानी में जान व सामान बचाते नजर आते हैं। आफत की बारिश के चलते डूब में आने वाले महानगर कुदरत के कठोर संकेत दे रहे हैं, लेकिन हमारे नीति-नियंता हकीकत से आंखें चुराए हुए हैं। बाढ़ दशकों से आफत का पानी लाकर हजारों ग्रामों को डूबो देती है। इस लिहाज से शहरों और ग्रामों को कथित रूप से स्मार्ट व आदर्श बनाने से पहले इनमें ढांचागत सुधार के साथ ऐसे उपायों को मूर्त रूप देने की जरूरत है, जिससे ग्रामों से पलायन रुके और शहरों पर आबादी का दबाव न बढ़े।
सूखे के देखते-देखते अतिवृष्टि हो जाना इस बात का प्रतीक है कि प्रकृति जलवायु परिवर्तन का संकेत दे रही है। यह इस बात की भी चेतावनी है कि हमारे नीति-नियंता, देश और समाज के जागरूक प्रतिनिधि के रूप में दूरदृष्टि से काम नहीं ले रहे हैं। पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के मसलों के परिप्रेक्ष्य में चिंतित नहीं हैं। कृषि एवं आपदा प्रबंधन से जुड़ी संसदीय समिति ने हाल ही में एक रिपोर्ट दी है। इसके मुताबिक जलवायु परिवर्तन से कई फसलों की पैदावार में कमी आ सकती है, लेकिन सोयाबीन, चना, मूंगफली, नारियल और आलू की पैदावार में बढ़त हो सकती है। हालांकि कृषि मंत्रालय का मानना है कि जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए खेती की पद्धतियों को बदल दिया जाए तो 2021 के बाद अनेक फसलों की पैदावार में 10 से 40 फीसदी तक की बढ़ोतरी संभव है। बढ़ते तापमान के चलते भारत ही नहीं दुनिया में वर्षाचक्र में बदलाव के संकेत 2008 में ही मिल गए थे, बावजूद इस चेतावनी को भारत सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया। ध्यान रहे, 2031 तक भारत की शहरी आबादी 20 करोड़ से बढ़कर 60 करोड़ हो जाएगी। जो देश की कुल आबादी की 40 प्रतिशत होगी। ऐसे में शहरों की क्या नारकीय स्थिति बनेगी, इसकी कल्पना भी असंभव है?
वैसे, धरती के गर्म और ठंडी होते रहने का क्रम उसकी प्रकृति का हिस्सा है। इसका प्रभाव पूरे जैवमंडल पर पड़ता है, जिससे जैविक विविधता का अस्तित्व बना रहता है। लेकिन कुछ वर्षों से पृथ्वी के तापमान में वृद्धि की रफ्तार बहुत तेज हुई है। इससे वायुमंडल का संतुलन बिगड़ रहा है। यह स्थिति प्रकृति में अतिरिक्त मानवीय दखल से पैदा हो रही है। इसलिए इसपर नियंत्रण संभव है। संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन समिति के वैज्ञानिकों ने तो यहां तक कहा था कि ‘तापमान में वृद्धि न केवल मौसम का मिजाज बदल रही है, बल्कि कीटनाशक दवाओं से निष्प्रभावी रहने वाले विषाणुओं -जीवाणुओं, गंभीर बीमारियों, सामाजिक संघर्षों और व्यक्तियों में मानसिक तनाव बढ़ाने का काम भी कर रही है।‘ साफ है, जो लोग बाढ़ और सूखे का संकट झेलने को अभिशप्त होते हैं, वह लंबे समय तक तनाव की भीषण त्रासदी भोगने को अभिशप्त हो जाते हैं।
दरअसल, पर्यावरण के असंतुलन के कारण गर्मी, बारिश और ठंड का संतुलन भी बिगड़ता है। इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य और कृषि की पैदावर व फसल की पौष्टिकता पर पड़ता है। यदि मौसम में आ रहे बदलाव से पांच साल के भीतर घटी प्राकृतिक आपदाओं और संक्रामक रोगों की पड़ताल की जाए तो वे हैरानी में डालने वाले हैं। तापमान में उतार-चढ़ाव से ‘हिट स्ट्रेस हाइपरथर्मिया‘ जैसी समस्याएं दिल व सांस संबंधी रोगों से मृत्युदर में इजाफा हो सकता है। पश्चिमी यूरोप में 2003 में दर्ज रिकाॅर्ड उच्च तापमान से 70 हजार से अधिक मौतों का संबंध था। बढ़ते तापमान के कारण प्रदूषण में वृद्धि दमा का कारण है। दुनिया में करीब 30 करोड़ लोग इसी वजह से दमा के शिकार हैं। पूरे भारत में 5 करोड़ और अकेली दिल्ली में 9 लाख लोग दमा के मरीज हैं। बाढ़ के दूषित जल से डायरिया व आंख के संक्रमण का खतरा बढ़ता है। भारत में डायरिया से हर साल करीब 18 लाख लोगों की मौत हो रही है। बाढ़ के समय रुके दूषित जल से डेंगू और मलेरिया के मच्छर पनपकर कहर ढाते हैं। तय है, बाढ़ थमने के बाद, बाढ़ प्रभावित शहरों को बहुआयामी संकटों का सामना करना होगा। बहरहाल जलवायु में आ रहे बदलाव के चलते यह तो तय है कि प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति बढ़ रही है। इस लिहाज से जरूरी है कि शहरों के पानी का ऐसा प्रबंध किया जाए कि उसका जलभराव नदियों और बांधों में हो, जिससे आफत की बरसात के पानी का उपयोग जल की कमी से जूझ रहे क्षेत्रों में किया जा सके। साथ ही शहरों की बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने के लिए कृषि आधारित देशज ग्रामीण विकास पर ध्यान दिया जाए। क्योंकि ये आपदाएं स्पष्ट संकेत दे रही हैं कि अनियंत्रित शहरीकरण और कामचलाऊ तौर-तरीकों से समस्याएं घटने की बजाय बढ़ेंगी ही।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)


 
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