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लाहिड़ी महाशय के बहाने योग का सफर

02/07/2019

लाहिड़ी महाशय के बहाने योग का सफर



रामबहादुर राय



एक छोटी भूमिका से बातचीत शुरू हुई। उसमें
चार-पांच व्यक्ति थे। इनमें योग और विशेषकर क्रिया योग के बारे में जिज्ञासा थी। अपने
अनुभव
, वंशानुगत ज्ञान और स्वयं की
साधना के आधार पर उसे बताने-समझाने के लिए योगी शिवेंदु लाहिड़ी उपस्थित थे। वे ही
ज्यादा बोले। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के मीडिया सेंटर में यह आयोजन था।
उससे पहले छोटी सी भूमिका जरूरी थी
, जिससे बातचीत शुरू हो
सके। भूमिका में चार-पांच बातें रखी गईं। शिवेंदु लाहिड़ी बीते 21 साल से क्रिया
योग से लोगों को परिचित करा रहे हैं। इसका चलन 19वीं सदी के मध्यांतर में योगी
श्यामा चरण लाहिड़ी से शुरू हुआ। उसी परंपरा और वंश की उपस्थित पीढ़ी में वे हैं
,
जो आज योग की विश्वव्यापी एक मुख्य धारा है। योग सनातन है। वह जीवन
का परममंगल है
, अगर किसी के जीवन में घटित हो जाए। ऐसे
व्यक्ति को साक्षात्कारी कहते हैं। इस परम लक्ष्य के लिए जो-जो उपाय किए जाते हैं
,
वे सब अपने ढंग से योग हैं।



सबसे पहले शिवेंदु लाहिड़ी ने यह बताया कि
महावतार बाबा का जो चित्र हम पाते हैं
, वह रेखाचित्र है। जो कल्पना के आधार पर बनाया गया है। उसे किसी तस्वीर से
नहीं बनाया गया। उनकी कोई तस्वीर नहीं है। उस रेखाचित्र को स्वामी योगानंद ने
बनवाया। महावतार बाबा भी कोई वास्तविक नाम नहीं है। इसी रूप में उन्हें जाना जाता
है। प्रश्न था कि क्या लाहिड़ी महाशय ने महावतार बाबा के बारे में कुछ बताया है
?
इस पर शिवेंदु लाहिड़ी जी का कहना था कि जब कभी प्रसंग आया, तो महावतार बाबा को सिर्फ बाबाजी कहा करते थे। हम जानते हैं कि आदर का यह
संबोधन किसी भी संन्यासी के लिए परंपरा में प्रचलित है।



श्यामा चरण लाहिड़ी के जीवन में एक चमत्कार घटित
हुआ। वे पहाड़ पर घूमने जाते थे। एक संन्यासी के आकर्षण ने उन्हें अपनी ओर खींचा।
उस स्थान पर पहुंचे। वहां दस दिन रहे। वह स्थान आज वैश्विक महत्व का हो गया है।
नामी और अनामी सभी वहां जाकर स्वयं को धन्य अनुभव करते हैं। उनके साथी और अफसरों
ने समझ लिया कि वे जंगली जानवर के शिकार हो गए। पर ऐसा था नहीं। वे तो उस अवधि में
संन्यासी की संगति और दीक्षा में थे। दस दिन बाद जब वे वापस आए तो पुराने श्यामा
चरण लाहिड़ी वे नहीं थे। पूरी तरह रूपांतरित क्रिया योगी थे। उनसे ही क्रिया योग
जो लुप्त और गुप्त हो गया था
, वह प्रारंभ
हुआ।



महर्षि ने भी क्रिया योग की चर्चा की है। योग है
व्यापक। भगवान कृष्ण जिस योग की बात गीता में करते हैं
, वह राजयोग है। आज योग के अनगिनत नाम हैं। योग वास्तव में
अध्यात्म का सोपान है। आज योग के विविध रूप हैं। स्वस्थ जीवन और फिटनेस के लिए योग
ने पूरी दुनिया में पांव पसार लिया है। अमेरिका में योग के स्टुडियो हैं। वहां
लोगों को फिटनेस की कला योगी या उनके सिखाए शिक्षक बताते हैं। उसका अभ्यास कराते
हैं। उसकी फीस लेते हैं। इस प्रकार योग एक फलता-फूलता व्यवसाय भी है। सच्चा योग उसके
पार है। योग क्षेत्र के जो भी बड़े नाम हैं और जो विख्यात हुए
, वे अमेरिका में प्रसिद्धि पाने के बाद हुए। वहां वे अपना स्थान बना सके।
योग के केंद्र खोले। वह क्रम अनवरत चल रहा है। स्वामी योगानंद और स्वामी राम से यह
क्रम प्रारम्भ हुआ।



स्वामी योगानंद ने 'योगदा सत्संग' बनाया। अपनी आत्मकथा
लिखी-
'योगी कथामृत'। उसमें चमत्कारों
की ढेर सारी कहानियां पिरोई हुई हैं। उन्होंने अपनी आत्मकथा में गांधीजी से
मुलाकात का विस्तृत वर्णन किया है और बताया है कि उन्होंने गांधीजी को क्रिया योग
सिखाया। इसी तरह स्वामी राम ने भी आत्मकथा लिखी-
'योग की
हिमालय परंपरा।
' इन दोनों आत्मकथाओं में चमत्कारिक घटनाओं के
ऐसे-ऐसे वर्णन हैं
, जो असम्भव लगते हैं। उन घटनाओं के बारे
में तो प्रामाणिक रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता, लेकिन एक धारणा यह है कि
अमेरिका में उनका मुकाबला ईसाइयत के प्रचारकों से था। ईसाइयत के प्रचारक भी
चमत्कारों के बल पर धर्म के प्रचार के लिए जाने जाते हैं। इसलिए इन्हें भी अपनी
आत्मकथाओं में चमत्कार की घटनाओं को जोड़ना पड़ा होगा। बहरहाल
, पिछली सदी में पाल ब्रंटन ने भारत के योगियों को यहां आकर और रहकर खोजा।
एक पुस्तक लिखी। जिसे एक संदर्भ पुस्तक माना जाता है। वह थी-
'ए सर्च इन सेक्रेड इंडिया'। अब आदान-प्रदान भी हो
रहा है। आठवें दशक में ओशो ने अपनी पद्धति से धूम मचा दी थी। वे तूफानी दिन थे। आज
योग अपनी लोकप्रियता के शिखर पर है। जिसमें साधगुरु जग्गीवासुदेव
, स्वामी रामदेव और श्रीश्रीरविशंकर की त्रिमूर्ति बन गई है। ये जो घेरा बना
रहे हैं
, वह केंद्र हो गया है। उस केंद्र के अनंत घेरे बनते
जा रहे हैं। लेकिन एक समानांतर घेरा स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी बना रहे
हैं। यह 21वीं सदी का अदभुत संयोग है।



योग के इस सफर की शुरुआत जिससे हुई और जो आज
विश्वव्यापी पहचान प्राप्त कर चुके हैं
, वे श्यामा चरण लाहिड़ी थे। जिन्हें लाहिड़ी महाशय के आदर की संज्ञा मिली।
वे काशी में कहां रहते थे
? कैसे रहते थे? उनकी दिनचर्या कैसी थी? क्या दिखने में वे असामान्य
थे
? ऐसे बहुत सारे प्रश्न हैं। उन्हें उस दिन बातचीत में
शिवेंदु लाहिड़ी ने सुलझाया। वे बातें बताईं जो पुस्तकों में नहीं हैं। लेकिन
उन्होंने जो बताया वह प्रामाणिक है। वंश परंपरा से जो सुन रखा था और जो देखते चले
आ रहे हैं
, उसे ही उन्होंने एक प्रसंग छिड़ने पर बताया।
आमतौर पर यह माना जाता है कि बनारस में चौसट्टी घाट के पास जो बड़ा मकान है
,
जिसमें एक मंदिर है, उसमें योगी श्यामा चरण
लाहिड़ी और उनकी परंपरा के वंशानुगत योगियों की मूर्तियां हैं
, जो 'सत्य लोक' के नाम से जाना
जाता है
, वहां श्यामा चरण लाहिड़ी महाशय रहते थे। सच दूसरा
है। वे मदनपुरा के एक मकान में रहते थे
, जिसे उन्होंने खरीदा
था। वहीं उनका शरीर छूटा।
'सत्य लोक' का
मकान एक राजा के दान से प्राप्त हुआ। जिसमें रहने के लिए सत्य चरण लाहिड़ी आए। वे
शिवेंदु लाहिड़ी के पिता थे। अंतरमुखी योगी थे। उनकी अंतरमुखता परंपराबद्ध थी।
काशी का दूसरा नाम प्रकाश है। जिससे पूरी दुनिया प्रकाशमान हो जाती है। वह अनुभव
स्वयं हो सके, इसलिए लोग काशी पहुंचते हैं। देखिए क्या संयोग है! आज प्रधानमंत्री
नरेन्द्र मोदी उस काशी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।



शिवेंदु लाहिड़ी बताते हैं कि वियोग की समाप्ति
योग है। मुक्ति पानी है चित्तवृतियों से। अगर उससे जो मुक्त हो जाता है
, तो उसके जीवन में योग का आविर्भाव होता है। योग का जन्म होता
है। उसका पहला सोपान प्रारंभ होता है। आज की आध्यात्मिक मंडी में जो योग बिकने के
लिए उपलब्ध है और अनेक रूपों में उपलब्ध है
, वह योग की
वैश्विक माया है। वे कहते हैं कि संस्कृत के दो शब्द हैं- क्रिया और प्रतिक्रिया।
हमारा मन प्रतिक्रिया में जीता है। थोड़ा सा सजग हो जाएं। इसे अपने आस-पास देखें
तो प्रतिक्रिया के दंश और दर्शन से सामना अत्यंत सुलभ है। लेकिन है वह कष्टदायक।
प्रतिक्रिया पैदा होती है आत्मछवि से। हर किसी ने अपनी एक छवि गढ़ ली है। उसी में
जीता है। जैसे ही उसे अपनी छवि को खतरा पैदा होता है
, वह
प्रतिक्रिया में आ जाता है। योग में यही विभेदकारी चित्तवृति है।



उनका सूत्र है कि इस विभेदकारी चित्तवृति से
बिना मुक्त हुए योग और विशेषकर क्रिया योग की यात्रा शुरू नहीं होती। इसलिए स्वाध्याय
को उस यात्रा का पहला कदम कह सकते हैं। यह कदम होता छोटा है, पर बड़ी यात्रा उसी
से शुरू होती है। शिवेंदु लाहिड़ी ने स्वाध्याय का एक पाठ बनाया है। यह भी कह सकते
हैं कि उन्हें अपनी परंपरा में वह प्राप्त है। जिसका वे पाठ्यालोचन कर जिज्ञासुओं
को उस मार्ग का निर्देशन करते हैं। चलना तो उसे ही होगा
, जिसे यात्रा करनी है। लेकिन हर यात्री को जैसे एक नक्शा चाहिए,
वैसा ही है यह स्वाध्याय का पाठ जो क्रिया योग का नक्शा देता है।



 



जितनी बातें सार्वजनिक रूप से बताई जा सकती हैं, उन्हें उस दिन की बातचीत में शिवेंदु लाहिड़ी ने सूत्र रूप
में रखी। जैसे यह कि क्रिया योग के आठ आयाम हैं। इसे हम आठ सोपान भी कह सकते हैं।
योग के भी आठ ही सोपान हैं। योग आज घर-घर पहुंच गया है। उसी तरह जैसे तरह-तरह के
मोबाइल फोन हर व्यक्ति को उपलब्ध हो सकता है। मोबाइल फोन की उपलब्धता एक बात है और
उसका अपने काम के लिए उपयोग बिल्कुल भिन्न बात है। जैसे गुगल बाबा की दुनिया में
अपने काम की बातें खोजने के लिए पासवर्ड चाहिए
, वैसे ही
क्रिया योग का पासवर्ड है- स्वाध्याय। कोई पुस्तक पढ़ना स्वाध्याय नहीं है। तो
स्वाध्याय है क्या
? ध्यान में प्रवेश का प्रारंभ स्वाध्याय
से होता है। उसकी एक विधि है। उसे सीखने के लिए कभी योगियों के पास जाने की जरूरत
होती है। जो जाता था
, उसकी पात्रता का निर्णय कर उसे एक विधि
योगी देते रहे हैं। वही उस व्यक्ति के लिए उसके गुरु का बताया पासवर्ड होता है। यह
काम गुरु ही कर सकता है। उसकी खोज किसी के लिए भी आसान नहीं होती। यह भी कहा जाता
है कि गुरु स्वयं शिष्य को खोजता है। योग में यही प्रथा है। लेकिन योग की कुछ
क्रियाएं जो व्यायाम की श्रेणी में आती हैं
, उसे तो हर योग
शिक्षक सिखा सकता है। इसलिए अनेक योगी आज भी यह कहते हुए पाए जाते हैं कि आसन योग
का एक प्रकार है। वही योग नहीं है। उसी तरह जैसे मनुष्य मात्र शरीर नहीं है। शरीर
भी है
, शरीर ही नहीं है। इसी से आत्मा की अवधारणा पैदा होती
है। शरीर से आत्मा की यात्रा वास्तव में योग की यात्रा है।



शरीर से ही कोई व्यक्ति उस संसार में प्रवेश
करता है, जिसे योग कहते हैं। यानी ईश्वर से जुड़ने की शुरुआत। अपनी खोज। मैं कौन
हूं
? इसकी जिज्ञासा। हालांकि शिवेंदु
लाहिड़ी कहते हैं कि मैं कौन हूं में तो
'मैं' बना ही रहता है, जो अहम का पर्याय है। वह भटकाव है।
वह कैसे टूटेगा
? यही योगियों को पहले स्वयं खोजना होता है। जब
वे समाधान प्राप्त कर लेते हैं
, तब वे दूसरों को बताते हैं।
सच्चे योगी यही करते हैं। ढोंगियों की बात दूसरी है। हर समय का अपना एक स्वभाव
होता है। जिस समय योगी गुफा में रहते थे
, वह समय अंतरमुखता
का था। तब वे सर्वसुलभ नहीं थे। राजधानियों में आना तो कतई उनको पसंद नहीं था। कोई
भी प्रलोभन उनके लिए मिथ्या था। इसलिए एक संत ने कहलवाया कि
संतन को कहा सीकरी सो काम! आवतजात पनहिया टूटी, बिसर
गए हरि नाम।
आज नजारा ही इसके ठीक उलट है। वह योगी ही बड़ा
है
, जो राजधानी में दिखता है। इसमें उसका कोई दोष नहीं है।
समय का यह तकाजा है। आज समय बहिर्मुख स्वभाव का है। जो अभिव्यक्त कर सकता है
,
वही अनुभव से किसी को गुजारने में समर्थ है। इसलिए योग आज सर्वसुलभ
है। लेकिन सर्वसुलभ होने मात्र से बात नहीं बनती। योग की अंतरयात्रा उसे ही करनी
होती है
, जो उस पर चलने के लिए उद्यत हो जाता है।


 
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