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मंदी तेरी ऐसी-तैसी......

22/10/2019

मंदी तेरी ऐसी-तैसी

राकेश कायस्थ

कॉरपोरेट टैक्स कटौती का चारा खाकर सेंसेक्स के बुल ने कुछ इस रμतार से दौड़ लगाई कि यूपी के खेतों में सुपर सोनिक स्पीड से घुसने वाले सांड़ तक शरमा गये। एनएसई और बीएसई के बुल एक झटके में अर्थव्यवस्था की मंदी को चर गये और निवेशकों के चेहरों की मुस्कान फिर से लौट आई। अब फिर से चारों तरफ शहनाइयों की मंगल ध्वनि है और विदेशी निवेशक इंक्रेडिबल इंडिया की बारात में शामिल होने के लिए पगड़ी बांधने में जुट गये हैं। सरकार ने फुंकी हुई अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने के लिए जो कदम उठाया है, उसकी कोई और मिसाल शायद पूरी दुनिया में ना मिले। अर्थव्यवस्था की हालत को लेकर बड़े-बड़े लोग चिंतित थे। चिंतित होनेवाले में आरबीआई के शक्तिशाली गवर्नर शक्तिकांत दास और बीजेपी के धुरंधर अर्थशास्त्री सुब्रह्मण्यम स्वामी भी थे।

बहुत से लोगों का सपना है कि भारत सिंगापुर की तरह बने। नितिन गडकरी ने इस दिशा में कदम बढ़ाया और सिंगापुर की तर्ज पर ही ट्रैफिक हर्जाने की शुरुआत कर दी। लोग हाय-हाय करने लगे।

इनके विपरीत,मुझे कभी अर्थव्यवस्था को लेकर लेशमात्र की चिंता नहीं हुई। कारण यह है कि मैं बहुत पॉजेटिव आदमी हूं। ठीक है कि दस-बीस व्यापारी कुछ खरब रुपये लेकर भाग गये। लेकिन अगर आप ठीक से सोचेंगे तो अंदाजा होगा कि यही भारतीय अर्थव्यस्था के मजबूत होने की सबसे बड़ी निशानी है। क्या गरीबों के यहां कभी डाका पड़ता है? ठीक है कि कुछ बड़े बैंक कंगाल हो गये। लेकिन जिस देश के पास आरबीआई जैसी संस्था हो और एलआईसी जैसा कुबेर का खजाना हो, उसे भला चिंतित होने की क्या जÞरूरत? जल्द ही बैंकों के नाम बदल जाएंगे। उनकी कंगाली भी दूर हो जाएगी, नये लोन फिर से मिलने लगेंगे और अपना भारतवर्ष फाइव ट्रिलियन की ताल पर कदमताल करता नजर आएगा। कई लोग पूछ रहे हैं कि यह सब तो ठीक है लेकिन मंदी कैसे दूर होगी? इस मामले में भी मेरी राय बहुत साफ है। मंदी असल में सर्दी की तरह होती है, जितना सोचेंगे उतनी ही महसूस होगी। लोग जब कहते थे कि रुपये से लेकर सेविंग्स तक हर जगह गिरावट है, मैं रोज सुबह अपनी सगाई वाली सोने की अंगूठी को निहार लिया करता था।

मुझे यकीन हो जाता था कि सोना जिस रμतार से उपर चढ़ रहा है, मुझे दस-बीस रुपये का मुनाफा रोजाना सिर्फ इस अंगूठी से हो जाता होगा। जिस आदमी के पेट में अन्न हो, सिर पर छत हो और हाथ में फोर जीबी वाला एक मोबाइल फोन हो तो उसे जीवन में और क्या चाहिए? वह भला तेजी-मंदी के बहस में क्यों पड़े। अगर आप सोचेंगे तो मंदी महसूस होगी, अगर नहीं सोचेंगे तो नहीं होगी क्योंकि मंदी मूलत: एक धारणा है। डॉलर जब बहत्तर रुपये तक पहुंचा तो लोगों ने हाय-हाय करना शुरू कर दिया। मैने अपने मित्रों को समझाया कि माइंडसेट पॉजेटिव रखो। अगर मौके का फायदा उठाना चाहते हो एक्सपोर्ट का कोई बिजनेस शुरू कर दो। आमदनी डॉलर में होगी और देखते-देखते मालामाल हो जाओगे। दत्तू भइया बोल पड़े- मैं तो पान बेचता हूं, एक्सपोर्ट कहां करूं। मैने कहा कि मोदीजी की सिर्फ एक रैली में पचास हजार भारतीय जुट गये। जरा सोचो अगर तुम वहां होते तो कितनी बिक्री होती? ऐसा लगा कि बात उनकी समझ में आ रहा हो। लेकिन मैने फॉलो अप अब तक पता नहीं किया है। जब प्याज सौ रुपये तक पहुंचा तो रिश्तेदार से लेकर पड़ोसी तक मोटे-मोटे आंसू बहाने लगे। मैंने उन्हें बहुत समझाया कि जब हमारा रुपया डॉलर से कमजोर था, तब तुमलोग रो रहे थे और अब हमारा प्याज डॉलर से मजबूत हो गया तब भी रो रहे हो।

तर्कपूर्ण ढंग से सोचोगे तो तुम्हें अपने प्याज की इस उपलब्धि पर गर्व होगा। लेकिन तर्कपूर्ण ढंग से भला आजकल सोचता कौन है? पहले जो लोग हेलमेट हाथ में पकड़कर बाइक चलाते थे, अब उन्हें सिर में पहनना पड़ रहा है। जाहिर है, कष्ट तो होगा ही। आदतें भला रातों-रात कहां बदलती हैं! सुनने में आया है कि चालान भरने में कई लोगों की गाड़ियां तक बिक गईं। हम भी सिंगापुर बनें और फाइन सिर्फ भारत वाले भरें, भला यह कैसे संभव है? मैं तो यह सोचकर खुश हूं कि भविष्य में हम दावा कर पाएंगे कि पाकिस्तान की जितनी जीडीपी है,उससे कहीं ज्यादा पैसे हम भारतीय ट्रैफिक चालान में ही भर देते हैं। पॉजेटिव सोचिये और खुश रहिये।


 
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