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अंग्रेज कलेक्टर ने दी थी मुंशी प्रेमचंद को हाथ काटने की धमकी

07/10/2019

(पुण्यतिथि, 8 अक्टूबर पर विशेष)

पंकज मिश्रा
पन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द्र ने ब्रिटिश हुकूमत की सेवा में रहते हुए कहानियां और उपन्यास लिखकर अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की थी। साम्राज्यवादी शासकों के खिलाफ उन्होंने लेखनी को तलवार का रूप देकर तीखे कटाक्ष किये थे। हमीरपुर में शिक्षा विभाग में डिप्टी इंस्पेक्टर के पद पर नौकरी करते हुए मुंशी जी ने 'सोजे वतन' नामक कहानी संग्रह प्रकाशित किया था, जिसे तत्कालीन कलेक्टर ने पांच सौ पुस्तकें जब्त कर आम जनता के सामने जलाई थी। इस घटना के बाद मुंशी जी ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने अपने पुस्तक के बारे में लिखा था कि किताब नफा-ए-आम में लिखी गयी है। स्वतंत्रता और देशप्रेम को मुंशी जी ने सदैव अपने साहित्य में सर्वोच्च स्थान दिया था। 'सोजे वतन' में संगृहीत 'दुनिया का सबसे अनमोल रतन' शीर्षक बहुचर्चित कहानी में उन्होंने लिखा है कि 'खून का वह आखिरी कतरा जो वतन की हिफाजत में गिरे, दुनिया की सबसे अनमोल चीज है।' 
मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को बनारस जिले के लमही गांव में मुंशी अजायब लाल के घर हुआ था। उनके पिता ने मुंशी जी का नाम धनपत राय रखा था। लोग उन्हें प्यार से नवाब राय कहते थे। उन्होंने गोरखपुर व बनारस में प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण की थी। वर्ष 1902 में इलाहाबाद ट्रेनिंग कालेज में भर्ती हुए थे। उन्होंने 1904 में प्रथम श्रेणी में जे.टी.सी.की परीक्षा पास की थी। अपनी प्रतिभा के कारण ही वे मॉडल स्कूल में हेडमास्टर के पद पर नियुक्त हुए थे। 1905 में स्थानांतरण पर वे कानपुर आये थे जहां उनका सम्पर्क मुंशी दयानारायण निगम से हुआ था। दयानारायण उन दिनों उर्दू की सुप्रसिद्ध पत्रिका 'जमाना' के सम्पादक थे। उन्हीं के सानिध्य में मुंशी प्रेमचन्द्र की साहित्यिक प्रतिभा में निखार आया था। 
वर्ष 1908 में डिप्टी इंस्पेक्टर के पद पर प्रमोशन के बाद मुंशी प्रेमचन्द्र को हमीरपुर जिले के शिक्षा विभाग में स्थानांतरित कर दिया गया था। वहां उन्होंने सरकारी सेवा में रहते हुए बुन्देलखण्ड क्षेत्र में उपेक्षित और शोषित ग्रामीण जनजीवन को नजदीक से देखा। हमीरपुर में छह साल की नौकरी के दौरान मुंशी प्रेमचन्द्र ने साहित्य और लेखन के क्षेत्र में नये आयाम स्थापित किये थे। मुंशी जी, 'सोजे वतन' पुस्तक लिखकर अंग्रेजी हुकूमत की नजर में आ गये थे। 'सोजे वतन' का अर्थ है देश का दर्द। इस कहानी संग्रह में पांच कहानियां जिसमें 'दुनिया का सबसे अनमोल रतन', 'शेख मखमूर', 'यही मेरा वतन है', 'शोक का पुरस्कार' और 'सांसारिक प्रेम' थी। ये कहानियां उर्दू भाषा में थीं 'रानी सारन्धा', 'राजा हरदौल', 'विक्रमादित्य का तेज' जैसी कहानियां उन्होंने ही लिखी थी। हमीरपुर प्रवास के दौरान मुंशी प्रेमचन्द्र ने देशप्रेम, राष्ट्रीय भावनाओं और दासता के खिलाफ आन्दोलन करने के साथ ही परतंत्र भारत की वेदना को भी साहित्य और कहानियों में प्रमुखता से उजागर किया था। 
कलेक्टर ने दी थी हाथ काटने की धमकी
मुंशी उर्दू में ही बचपन के नवाब राय नाम से ही कहानियां लिखते थे। इसी नाम से वह पत्र लिखा करते थे। 'सोजे वतन' कहानी संग्रह अंग्रेजी हुकूमत के प्रति भड़काने के रूप में मानी गई। कलेक्टर ने उप जिलाधीश और खुफिया पुलिस से नवाब राय की तलाश कर रिपोर्ट मांगी थी। कलेक्टर हमीरपुर जिले के कुलपहाड़ तहसील दौरे पर थे। मुंशी जी कलेक्टर के फरमान पर रातोंरात बैलगाड़ी पर सवार होकर कुलपहाड़ तहसील पर कलेक्टर के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए। कलेक्टर ने मुंशी जी से कहानियों के बारे में पूछताछ की। तब मुंशी ने नवाब राय के नाम से स्वयं को इन कहानियों का लेखक और प्रकाशित कराने की बात स्वीकारी। गुस्से से नाराज अंग्रेज कलेक्टर ने मुंशी जी को चेतावनी दी कि खैर मनाओ कि अंग्रेज अमलदारी में हो, सल्तनत मुगलिया का जमाना नहीं है वर्ना तुम्हारे हाथ काट लिये जाते।
अंग्रेज कलेक्टर ने जलवाई थी 'सोजे वतन' की पांच सौ प्रतियां 
अंग्रेज हुकूमत में डिप्टी इंस्पेक्टर की नौकरी करते हुए मुंशी जी ने 'सोजे वतन' नामक कहानी का संग्रह प्रकाशित कराया था। तत्कालीन अंग्रेज कलेक्टर ने मुंशी जी के यहां से 'सोजे वतन' की 500 पुस्तकें जब्त कराकर उन्हें आम जनता के सामने खुलेआम जलवा दिया था। इसी के साथ उन्हें चेतावनी दी गयी कि भविष्य में अपनी कोई भी रचना छपवाने से पहले उन्हें जरूर दिखवाया जाए। कलेक्टर की कड़ी फटकार के बावजूद मुंशी जी अपने लेखन कार्य से विचलित नहीं हुए। उन्होंने अपनी रचना में लिखा कि 'मेरा रोज का धंधा ठहरा। हर माह एक मजमून कलेक्टर साहब की खिदमत में पहुंचेगा तो वे क्या समझेंगे कि मैं अपनी सरकारी नौकरी के काम में खयानत कर रहा हूं। कलेक्टर मुझ पर काम का और बोझ डालेंगे। इसलिए नवाब राय अब मरहूम हुए उनके जानशीन कोई और साहब होंगे।' उसके बाद उन्होंने प्रेमचंद नाम से लिखना शुरू किया, जो बाद में उनकी पहचान बन गया 
सरकारी नौकरी में रहते मुंशी ने अंग्रेजों के खिलाफ लिखी थीं पुस्तकें 
हमीरपुर के तत्कालीन ए.आर.ओ एवं कवि डा. राकेश ऋषभ व साहित्यकार डा. भवानीदीन प्रजापति ने बताया कि मुंशी प्रेमचंद इस देश के महान कथा शिल्पी थे उन्होंने हमीरपुर के प्राइमरी स्कूल में डिप्टी इंस्पेक्टर के पद पर रहते हुए बेखौफ अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ पुस्तकें लिखी थी। 'सोजे वतन' की भूमिका में नवाब राय के नाम से मुंशी जी ने लिखा था कि 'हरेक कौम का इल्म औ अदब अपने जमाने की सच्ची तस्वीर होता है। जो ख्यालात कौम के दिमागों को सक्रिय करते हैं और जो जज्बात कौम के दिलों में गूंजते हैं, वो नज्म ओ नस्न के सफों में ऐसी सफाई से नजर आते हैं जैसे आईने में सूरत।' साहित्यकार प्रेमपाल द्विवेदी ने बताया कि मुंशी प्रेमचन्द्र ने नमक का दरोगा शीर्षक से पुस्तक लिखी थी जिसमें उन्होंने सरकारी तंत्र में फैले भ्रष्टाचार पर टिप्पणी की थी। 
प्रेमचन्द्र ने देशप्रेम को साहित्य में दिया था सर्वोच्च स्थान
मुंशी ने सरस्वती पत्रिका में 'सोजे वतन' किताब का रिव्यू प्रकाशित करने के लिए 20 सितम्बर 1908 को पत्रिका के सम्पादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा था कि किताब नफाए आम में लिखी गयी है। इस लिहाज से कीमत भी रखी गयी है। मुंशी ने देशप्रेम को अपने साहित्य में सर्वोच्च स्थान रखा था। सोजे वतन की पुस्तकों की होली जलाने की घटना से दुनिया को कहानी सम्राट और विश्व कथा शिल्पी मुंशी के रूप में नई पहचान मिली। उनकी साहित्य में आदर्श यथार्थवादी साहित्यिक यात्रा की शुरूआत भी यहीं से हुई थी। जो जीवन के आखिरी समय तक जारी रही। 
स्थानांतरण से दुखी होकर नौकरी से दिया था इस्तीफा 
हमीरपुर जिले में प्राथमिक विद्यालय में छह सालों की लम्बी सरकारी सेवा के बाद मुंशी जी का स्थानांतरण बस्ती हो गया था। उन्होंने 1921 में नौकरी से इस्तीफा भी दे दिया था। इसके बाद बनारस में सरस्वती प्रेस की स्थापना कर लेखन और प्रकाशन कार्य में ये लग गये थे। इस महान कथा शिल्पी का 8 अक्टूबर 1936 को निधन हो गया था। यहां के साहित्यकार डॉ. भवानीदीन प्रजापति व लखनलाल जोशी ने बताया कि मुंशी जी की 'कफन', 'गबन', 'प्रतिज्ञा', 'कायाकल्प', 'वरदान', 'मानसरोवर', 'प्रेमा', 'बूढ़ी काकी', 'पंच परमेश्वर', 'गुल्ली डंडा', 'बड़े घर की बेटी', 'सद्गति', 'रानी सारंधा', 'ईदगाह', 'रंगभूमि', 'कर्मभूमि' व 'नमक का दरोगा' सहित अन्य कहानियां और उपन्यास साहित्यिक क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी। भले ही मुंशी प्रेमचंद हमारे बीच नहीं रहे लेकिन उनकी रचनाएं युगों-युगों तक हमारा मार्गदर्शन करती रहेंगी। उनकी रचनाओं ने ही उन्हें कालजयी बना दिया।
(लेखक पत्रकार हैं।) 


 
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