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दानवीरता की किताबी कहानियों को जमीन पर उतारने वाले चाहिए

11/06/2019

के.पी. सिंह 
जीम भाई प्रेम जी को कौन नहीं जानता। जिन्होंने विप्रो जैसा औद्योगिक साम्राज्य खड़ा कर दिया है। लेकिन एक बड़े कारपोरेट से ज्यादा विशिष्ट वे इसलिए हैं कि अभी तक 1 लाख 45 करोड़ रुपये का दान सामाजिक कल्याण के कामों के लिए दे चुके हैं। भारतीय संस्कृति में दानवीरों के किस्सों की भरमार है। लेकिन कितनी भी संपन्नता के बावजूद जनकल्याण के लिए दान करने वालों के उदाहरण जमीन पर दुर्लभ हैं। कोई समाज और संस्कृति अपनी महानता का ढिंढोरा भर पीटने से महान नहीं हो जाती, जब तक कि जिन आदर्शों और मूल्यों की दुहाई देने वाला समाज वास्तविक जीवन में उन्हें चरितार्थ करने के लिए तत्पर नहीं होता।
हालांकि दान मांगने की पात्रता किसे है, साथ ही किन-किन वस्तुओं का दान देने का अधिकार किसी व्यक्ति को हो सकता है। इस पर भी विवेक सम्मत चिंतन होना चाहिए। भीख में और दान में अंतर है। मोहताज आदमी भिखारी बनता है। लेकिन दान उस व्यक्तित्व को दिया जाता है जिसका समाज के लिए किसी क्षेत्र में अपरिमित योगदान हो। ऐसे व्यक्तित्व का समाज ऋणी माना जाता है। यह ऋण वैसे तो कभी चुकाया नहीं जा सकता। लेकिन ऐसे व्यक्तित्व के लिए दान करने का अवसर पाकर आम लोग अपने को धन्य अनुभव करते हैं।
त्याग और संयम की इस सीमा तक पराकाष्ठा को जीने वाले मनीषी के जिन्हें अगले समय की भोजन व्यवस्था संचित करके रखना भी स्वीकार न हो, उन्हें दान देने की संस्कृति प्रस्तुत की गई थी। यह मनीषी ब्राह्मण की संज्ञा से परिभाषित किये जाने लगे। ऐसे मनीषी अपने चिंतन को निर्दोष बनाये रखने के लिए लोभ-लालच के अलावा व्यक्ति विशेष के प्रभाव से भी परे रहते थे और इस तरह अर्जित ज्ञान से दर्शन को समृद्ध करते थे। वर्ग स्वार्थ से मुक्त दर्शन का विकास ही संस्कृति को महान बनाता है। भारतीय संस्कृति को ऐसे ही मनीषियों ने सींचा। इसलिए अपनी संस्कृति किसी समय विश्व की सबसे महान संस्कृति के रूप में गण्य थी।
मनीषी यहां तक स्वस्थ्य चिंतन के धनी थे कि उन्हें लगा कि आम गृहस्थों के पास कई बार अपने ही खाने की व्यवस्था नहीं होती। ऐसे में वे उनके यहां पहुंच गये, तो उस गृहस्थ को अपने पर घोर ग्लानि हो सकती है। इसलिए वे केवल पूरी तरह सक्षम राजपुत्रों के यहां भोजन मांगने पहुंचेंगे। अपरिग्रह के इस व्रत के सबसे ज्वलंत उदाहरण दुर्वासा मुनि थे। एक समय उन्हें यह मालूम नहीं था कि पाण्डव अज्ञातवास कर रहे हैं, जहां उनको खुद ही खाने के लाले पड़े हैं। महर्षि दुर्वासा को किसी से मालूम हुआ कि जहां उनका प्रवास है वहीं समीप में पाण्डव विचरण कर रहे हैं। इसलिए वे भोजन व्यवस्था हेतु शिष्यों की टोली लेकर पाण्डवों के डेरे पर जा धमके। वहां उन्हें पाण्डवों की स्थिति का जब पता चला तो उनकी व्यथा का पारावार नहीं रहा। फिर भी पाण्डवों का मान बनाये रखने के लिए दुर्वासा ने उनके पतीले से केवल एक कटोरी भात निकाली और उसमें से एक-एक दाना उन्होंने शिष्यों समेत लेकर जीमने की औपचारिकता पूरी की। पाण्डव उनसे कहते रहे कि आपको पूरा भात अर्पण है। लेकिन उन्होंने कहा कि हम लोग ऋषि हैं। हमें आये दिन व्रत का अभ्यास है। इसलिए उन्हें क्षुधा पर विजय प्राप्त हो चुकी है। गृहस्थों को आयाचित व्रत दूभर होता है। इसलिए हम आपको भूखा रहने के लिए मजबूर करने का अनर्थ नहीं कर सकते। हालांकि बाद में जब दान के बहाने उगाही की जाने लगी तो इस कहानी का स्वरूप बदल दिया गया और परिवर्तित कहानी के प्रस्तुतीकरण ने महर्षि दुर्वासा को निंदा का पात्र बनाने में कसर नहीं उठा रखी। स्वार्थ के लिए महान ऋषि की गरिमा से खिलवाड़ करने में भी संकोच नहीं किया गया।
स्पष्ट है कि दान के नाम पर मनीषी केवल उदर पूर्ति की व्यवस्था मांगने के अधिकार तक अपने को सीमित रखते थे। कालांतर में जब मनीषियों ने गुरूकुल शुरू किये तो बटुकों को भोजन, दूध आदि की व्यवस्था के लिए गायें, अनाज या खेती का दान लिया जाने लगा। लेकिन स्वर्ण या कोई भी ऐसी वस्तु जिससे वैभव जुड़ा है उसे मांगने का अधिकार किसी मनीषी को नहीं था। लेकिन जब मनीषी नियम, संयम से डिगने लगे तो दान को बाध्यकारी घोषित करने के लिए विचित्र कहानियां गढ़ी गईं। इनमें हरिशचन्द्र और बलि की कथायें प्रमुख हैं। न तो राज्य का दान मांगा जा सकता है और न ही राज्य दान किया जा सकता है। राज्य प्रजा की धरोहर होती है राजा सिर्फ न्यासी के रूप में उसका संचालन करता है। कोई न्यासी किसी न्यास का दान कैसे कर सकता है?
इन कहानियों से राजा बतौर संस्था कमजोर होने लगे। वे कातर भावुकता से ग्रसित हो गये। इसके कारण राज्य को लेकर उनमें कटिबद्धता का गुण क्षीण होता चला गया। लम्बे समय तक देश के गुलामी के गर्त में चले जाने की एक बड़ी वजह यह भी रही।
स्वार्थ की चाशनी में सनी इन कहानियों का दानशीलता की प्रवृत्ति पर उल्टा प्रभाव हुआ। समाज की जरूरतों में हाथ बंटाने के लिए अपनी कमाई का एक हिस्सा देने की समझ कुंद होती चली गयी और दान के नाम पर धर्म के कोप से बचने के लिए आडंबरों पर खर्च किया जाने लगा। जबकि यह पुण्य की कोटि में नहीं है।
गाय और गंगा को हिन्दू धर्म से जोड़कर देखा जाता है। आजकल गौरक्षा की चर्चा फिर जोरों पर है। लोगों में दान को लेकर अगर सार्थक भावनाएं रही होती तो हिन्दू इतनी संख्या में हैं कि चाह लें तो एक गाय आबार भटकने को मजबूर नहीं हो सकती। पर लोग इस बहाने सरकार की सदिच्छा का दोहन करने की जुगत बैठा रहे हैं। गौशालाओं का बजट निशाने पर आ गया है। धार्मिक मंसूबा अधर्म को बढ़ावा देने का द्वार बन गया है।
शिक्षा, चिकित्सा आदि कई ऐसे बुनियादी क्षेत्र हैं जिनके उद्देश्यों की पूर्ति केवल सरकार के भरोसे संभव नहीं है। इन क्षेत्रों के लिए लोगों में दानशीलता की भावना जाग्रत होना आवश्यक है। एक बार दिवंगत राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने धार्मिक प्रतिष्ठानों से अपील की थी कि वे अपनी संपदा का एक हिस्सा समाज की सेवा के लिए सौंपने को आगे आएं। तो बरसाने के लाड़ली महाराज मंदिर के महन्त ने उनको पत्र लिखकर कहा कि 'उनके ट्रस्ट में एक हजार करोड़ रुपये की संपदा है। आप जिस कार्य में लगाना चाहें वे यह संपदा आपको सौंपने को तैयार हैं।' यह डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की साख का असर था। ठीक वैसे जैसे कि 1965 के पाकिस्तान से यु़द्ध के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की अपील पर महिलाओं ने अपने मंगलसूत्र तक सेना के कोष में दान कर दिये थे। दूसरी ओर जब चन्द्रशेखर प्रधानमंत्री थे तो लोगों से दान की उनकी अपील पूरी तरह बेअसर रही थी।
बहरहाल, अर्थ को भी हिन्दू अध्यात्म में पुरूषार्थ का दर्जा दिया गया है। व्यापार और मुनाफा बढ़ाने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन दानशीलता का कर्तव्य इसके साथ अनिवार्य रूप से जुड़ा हुआ है। अमेरिका में बिल गेट्स और मार्क जुकरबर्ग ने अजीम प्रेम जी की तरह ही मानवता के कल्याण के कार्यों के लिए भारी फंडिंग की। धर्मप्राण आम इसाई भी कल्याणकारी कार्यों के लिए अपनी कमाई से योगदान करने को तत्पर रहते हैं। भारत में जहां भौतिकता को पाप माना गया है, संपत्ति पर वह चाहे जितनी भी बढ़ जाये, कुंडली मारकर बैठ जाने की बीमारी क्यों है?
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं।)


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