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कितना खतरनाक है पॉलीथिन कचरा

02/06/2019

अमित शंकर श्रीवास्तव
ह कैसी विडंबना है कि हमारे देश में जनहित में जो भी फैसले लिए जाते हैं वह जमीनी हकीकत पर क्यों नहीं खरे उतरते। हम सरकार के कामों पर और समाज की बुराइयों पर लंबे-लंबे भाषण तो दे देते हैं लेकिन जब बात अपने ऊपर लागू करने की होती है तब हम उसे गंभीरता से नहीं लेते। हम सोचते हैं कि हमारे अकेले किसी काम को करने से समाज में क्या परिवर्तन आ जाएगा। सरकार की मजबूरी यह है कि जनहित के कार्य को डंडा मारकर तो नहीं कराया जा सकता। न ही मात्र वैधानिक चेतावनी देकर किसी बुराई को कम किया जा सकता है। फिर भी कुछ सख्त नियम-कायदे हम बना सकते हैं जिससे समाज में फैली हुई तमाम बीमारियों को कुछ हद तक काबू में लाया जा सके।
देश के कई राज्यों में पॉलीथिन व प्लास्टिक के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की जा चुकी है। सरकार द्वारा पॉलिथिन तथा प्लास्टिक आदि के सार्वजनिक प्रयोग पर प्रतिबंध लगाने के प्रयास किए जा रहे हैं। कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में जनता जागरूक भी हुई है। इससे वहां पॉलीथिन के प्रयोग पर नियंत्रण हुआ है।
दिक्कत यह है कि पॉलीथिन व प्लास्टिक के कचरों का समूल नाश नहीं हो पाता है। यह मिट्टी की उर्वरक क्षमता को अत्यधिक प्रभावित करते हैं। जिसका हमारे पर्यावरण पर दुष्प्रभाव पड़ता है। इसके अतिरिक्त शहरों व कस्बों में बहने वाले नालों व नालियों को भी इसका कचरा जाम कर देता है। नतीजतन, बरसात के दिनों में बाढ़ जैसे हालात पैदा हो जाते हैं। कुछ राज्य सरकारों ने पॉलीथिन के प्रयोग को प्रतिबंधित किया है। यह एक सराहनीय कदम है। पॉलीथिन का उत्पादन कैसे होता है, हमें यहां यह भी जानना जरूरी है। लोगों के निष्प्रयोज्य जूते, चप्पल व अन्य प्लास्टिक के सामानों को उच्च तापमान पर गला कर काली पन्नी के थैले का निर्माण होता है। जिसका प्रयोग हम खाद्य पदार्थ को रखने तथा अन्य घरेलू कार्यों में जानकारी के अभाव में करते हैं। हमारे पशुधन भी इससे प्रभावित हैं। कभी-कभी उनकी मौत का कारण भी यही पन्नी बनती है। जिस फैक्ट्री में इस तरह की विषाक्त पन्नी बनती है उस फैक्ट्री को तत्काल बंद कर देना चाहिए। पॉलीथिन बनेगा ही नहीं तो इस्तेमाल कैसे होगा।
देश के जिन-जिन राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में पॉलीथिन पर प्रतिबंध लगाने की बात होती है वहां पहले रेहड़ी-ठेलों तथा रोजमर्रा के प्रयोग में आने वाले सामानों की दुकानों पर आम ग्राहकों को प्राप्त होने वाले पॉलीथिन कैरी बैग पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है लेकिन पॉलीथिन कैरी बैग का उत्पादन करने वाली इकाई पर कोई कठोर एक्शन नहीं लिया जाता। कोई दो राय नहीं कि पॉलीथिन व प्लास्टिक का कचरा हमारी धरती, पर्यावरण स्वास्थ्य आदि सभी के लिए अत्यंत हानिकारक है। हमारे देश में पॉलीथिन व प्लास्टिक पैक में आने वाले सामानों की सूची इतनी लंबी है कि उसे गिन पाना मुश्किल है। खासतौर पर आम लोगों के दैनिक जीवन में प्रयोग होने वाली तमाम वस्तुएं ऐसी हैं जो केवल प्लास्टिक या पॉलीथिन पैक में ही बाजार में उपलब्ध होती हैं। उदाहरण के तौर पर ब्रेड, दूध, दही, पनीर, लस्सी, चिप्स, नमकीन, बिस्किट, गुटखा और शैंपू आदि को प्रकृति पॉलीथिन एवं प्लास्टिक कचरे को भंडार के रूप में ग्रहण करती है। जो अनाशीय कचरे के रुप में हमारे पर्यावरण को अत्यधिक प्रभावित करती है। सवाल यह है कि हम अपने आपको इन सब के प्रति कितना जिम्मेदार मानते हैं। हम अपनी आदतों में सुधार क्यों नहीं लाते? हमें इन समस्याओं से निजात कैसे मिल सकती है? इसके लिए हमें हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे से पहाड़ी राज्य से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। हिमाचल देश के उन राज्यों में शामिल है जिन्होंने पॉलीथिन व प्लास्टिक के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध लगा रखा है। इसके बावजूद वहां पाए जाने वाले प्लास्टिक कचरे जो कि पर्यटकों के कारण पाए जाते हैं उन्हें भी समाप्त करने का माकूल प्रबंध सरकार द्वारा किया गया है।
अच्छी बात यह कि हिमाचल प्रदेश की आम जनता ने यह महसूस कर लिया है कि अनाशीय कचरे उनके पहाड़ी सौंदर्य, पर्यावरण तथा स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक हैं। अपनी इसी जागरुकता के चलते वहां के आम लोग यह कोशिश करते हैं कि पॉलीथिन व प्लास्टिक जैसे अनाशीय कचरे को स्वयं इधर-उधर फेंकने से परहेज करें। उधर प्रदेश सरकार द्वारा 3 रुपये प्रति किलो की दर से ऐसे कचरे को खरीदने की व्यवस्था की गई है। इसके अतिरिक्त वहां कई जगहों पर ऐसे प्लांट लगाए गए हैं जहां इन कचरों को रिसाईकल किया जाता है। इन कचरों का इस्तेमाल हिमाचल की सड़कों के निर्माण में किया जाता है। ऐसे कचरे को गलाकर सड़कों के निर्माण में इस्तेमाल करने से सड़कें मजबूत बनती हैं। इन सबके अतिरिक्त सरकार की ओर से सख्ती भी बरती जाती है कि कोई व्यक्ति ऐसी अनाशीय पैकिंग का प्रयोग न करने पाए। मोदी सरकार का पिछले 5 वर्षों में स्वच्छ भारत अभियान एक मुख्य एजेंडा रहा है। सरकार की तरफ से भी स्वच्छता को लेकर काफी अभियान चलाया गया। इसका लाभ भी हुआ। लोगों में सफाई के प्रति जागरुकता आई। सरकार को रिसाइक्लिंग प्लांट लगाने के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए और पॉलीथिन बैग के उत्पादन पर ही पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा देना चाहिए। पॉलीथिन बैग के इस्तेमाल को हमें अपने दैनिक जीवन से धीरे-धीरे समाप्त कर देना चाहिए। पॉलीथिन की जगह कपड़े के थैलों का इस्तेमाल करें। यूज एंड थ्रो वाले सामानों की जगह उन चीजों का इस्तेमाल करें जिनकी रिफिलिंग हो सके और जिन प्लास्टिक के सामानों का उपयोग किया जा रहा है उनको किसी न किसी तरह पुनः उपयोग कर सकें ताकि वे जल्द ही कूड़े के ढेर में अपनी जगह न बना पाएं। ऐसे अनाशीय कचरे को लेकर हमें स्वयं सचेत व जागरुक होना पड़ेगा। 
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं।)


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