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विश्व प्रसिद्ध मैसूर ‘दशहरा उत्सव’

14/10/2019

विश्व प्रसिद्ध मैसूर ‘दशहरा उत्सव’

नूरुद्दीन रहमान

उत्सव के दसवें दिन नगर भ्रमण के लिए निकलने वाली जम्बू सवारी में शामिल गजराज की पीठ पर लदा सुनहरा हौदा मैसूर के वैभवशाली अतीत की सुंदर कहानी कहता है।

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु से 139 किलोमीटर की दूरी पर स्थित मैसूर विश्व प्रसिद्ध दशहरा महोत्सव और अपनी कला और संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। ‘दशहरा उत्सव’ का आगाज मैसूर की चामुंडी पहाड़ी पर विराजित देवी चामुंडेश्वरी के मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और दीप प्रज्ज्वलन के साथ हो गया है। पारंपरिक उत्साह के साथ दस दिनों तक चलने जाने वाला यह ‘दशहरा उत्सव’ देवी चामुंडेश्वरी द्वारा महिषासुर के वध का प्रतीक है।
इस उत्सव में मैसूर महल, जगनमोहन पैलेस, जयलक्ष्मी विलास, ललिता महल, चामुंडी पहाड़ी, कृष्णराज सागर बांध, वृंदावन गार्डन समेत पूरे शहर को भी रोशनी से सजाया जाता है जो पर्यटकों के लिए अद्भुत नजारा होता है। उल्लेखनीय है कि हरिहर और बुक्का नामक दो भाइयों ने चौदहवीं शताब्दी में यहां नवरात्रि उत्सव की शुरुआत की थी। लगभग छह शताब्दी पुराने इस महोत्सव को ‘वाडेयार राजवंश’ के महाराजा कृष्णराज वाडेयार ने दशहरे का नाम दिया था। इस उत्सव की लोकप्रियता का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कर्नाटक सरकार ने वर्ष 2008 में इसे ‘राज्योत्सव’ (नाड हब्बा) का दर्जा दे दिया था।
इस दौरान अनेक सांस्कृतिक, धार्मिक और अन्य कार्यक्रमों क साथ ही अंतिम दिन बैंड बाजे के साथ जुलूस निकलता है जिसके दीदार के लिए लोग घंटों इंतजार करते हैं। भारत के आजाद होने पर मैसूर को पृथक राज्य बना दिया गया था लेकिन राज्यों के पुनर्गठन के बाद मैसूर कर्नाटक में आ गया। मैसूर के शासक के तौर पर हैदर अली और उनके पुत्र टीपू सुल्तान भी रहे हैं। वाडेयार ने वर्ष 1610 में सोने का वह सिंहासन प्राप्त किया जो विजयनगर साम्राज्य के संस्थापक हरिहर को उनके गुरु विद्यारण्य द्वारा दिया गया था।
वाडेयार 23 मार्च, 1610 को इस सिंहासन पर आसीन हुए थे। उन्होंने विजयनगर के पारंपरिक दशहरा महोत्सव की परंपरा को जीवित रखा। इसके लिए उन्होंने एक निर्देशिका तैयार कर उसमें स्पष्ट लिखा था कि किसी भी स्थिति में दशहरा मनाने की परंपरा कायम रहनी चाहिए। विजयादशमी के पर्व पर स्थानीय राज दरबार आम जनता के लिए खोल दिया जाता है। उत्सव के आखिरी दिन शहर में भव्य जुलूस निकाला जाता है। महोत्सव के आखिरी दसवें दिन मनाए जाने वाले उत्सव को जम्बू सवारी के नाम से जाना जाता है। इस दिन सारी निगाहें उस गजराज पर होती है जिसकी पीठ पर सुनहरा हौदा रखा होता है।
विशेष साज-सज्जा के साथ उस हाथी के साथ 11 अन्य हाथी भी होते हैं। यह जम्बू सवारी नगर भ्रमण के लिए निकलती है। यह सुनहरा हौदा मैसूर के वैभवशाली अतीत की सुंदर कहानी कहता है। 750 किलो वजन के इस हौदे में तकरीबन 80 किलो सोना लगा हुआ है। वैश्विक पहचान बना चुके इस उत्सव में शामिल होने के लिए देश-विदेश के लाखों पर्यटक आते हैं। रोशनी में नहाया मैसूर महल, विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम, जम्बू सवारी आगंतुकों को आकर्षित करता हैं। वर्ष 1970 में यह महोत्सव जरूर फीका दिखा था जब देश के राष्ट्रपति ने छोटी-छोटी रियासतों के शासकों की मान्यता समाप्त कर दी थी।

यदुवीर कृष्णदत्त 27वें राजा मैसूर राजवंश के अंतिम उत्तराधिकारी श्रीकंठदत्त नरसिंहराज वाडेयार की मौत के पश्चात 27 मई 2015 को अमेरिका से पढ़ाई कर लौटे यदुवीर कृष्णदत्त वडियार राजघराने के 27वें राजा बने हैं। श्रीकंठदत्त की पत्नी प्रमोदा देवी वडियार ने यदुवीर को गोद लिया था। हालांकि, जब यदुवीर को मैसूर की राजगद्दी का उत्तराधिकारी घोषित किया गया तो राजपरिवार के एक और सदस्य श्रीकंठदत्त के भतीजे कांतराज उर्स ने इसका विरोध किया था।

इसे दोबारा शुरू करने के लिए वर्ष 1971 में कर्नाटक सरकार ने एक कमेटी गठित की और फिर से इसको मनाया जाने लगा। बेंगलुरु से मैसूर के बीच अनेक ट्रेनें चलती हैं जिसमें शताब्दी एक्सप्रेस भी शामिल है जो मैसूर से वाया बेंगलुरु चेन्नई जाती है। इसके अलावा सड़क मार्ग से कर्नाटक सड़क परिवहन निगम और पड़ोसी राज्यों के परिवहन निगम तथा निजी परिवहन कंपनियों की बसें मैसूर से विभिन्न राज्यों के बीच चलती हैं। दशहरा उत्सव में पहुंचने के लिए कर्नाटक सरकार कई शहरों से बस सेवा को बढ़ा देती है ताकि आगंतुकों को कोई मुश्किल नहीं हो। इसी तरह दक्षिण-पश्चिम रेलवे भी विशेष ट्रेन के साथ वर्तमान ट्रेनों के फेरे बढ़ा देता है।



 
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