नवोत्थान

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झीने पर्दे के पार बनारस

02/07/2019

झीने पर्दे के पार बनारस



ब्रजेश कुमार



बनारस का न्यारापन जितना उसके नाम में है,
उससे अधिक उसकी विभूति में है। जिसका जैसा नजरिया हो, वह वैसा माने।
यह आजादी यही शहर देता है। याद में यह काशी है। सरकारी कागजों में वाराणसी। चुनाव
आयोग ने इसे वाराणसी संसदीय क्षेत्र नाम दिया है। और नंबर- 77।
अपनी एक चुनावी रिपोर्ट में रामबहादुर राय ने पाठकों से वाराणसी का परिचय
इन्हीं शब्दों से कराते हैं। अप्रैल के तीसरे पखवाड़े जब हम वाराणसी की यात्रा पर
थे, तो वहां खूब बमचख मचा था। राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच और दूसरे लोगों में
भी। सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव का सुरूर शहर पर चढ़ चुका था। वैसे तो यहां चुनाव आखिरी
चरण में है। 19 मई को वाराणसी की जनता अपने मताधिकार का प्रयोग करेगी। लेकिन, अभी
से स्पष्ट है कि जीत काशी की होगी। वाराणसी के लोगों ने यह सुनिश्चित कर दिया है। इन
दिनों वाराणसी आने वाला अबोध पत्रकार भी इस भाव को महसूस करेगा।



वैसे वाराणसी को देखते ही एक बात समझ में आई। वो यह कि हर
शहर में कई शहर होते हैं। वाराणसी के साथ भी यह बात ठीक बैठती है। शहर का एक भाग
गंगा के किनारे आबाद है। उसकी आभा विचित्र है। रंग अद्भुत है। यही सोलह महाजनपदीय
युग की प्राचीन नगरी काशी है, जो अपने वैभव के कारण पूरी दुनिया में प्रसिद्ध रही।
इसी काशी के संबंध में प्रेमचंद ने उर्दू भाषा में एक सुंदर टिप्पणी की थी।
प्रेमचंद की टिप्पणी को शब्दश
: पढ़ना ही ठीक रहेगा, दिल्ली ने चोला बदला। लखनऊ की काया पलट हो गई। इलाहाबाद भी तनासुख के दौर
से गुज रहा है। पटना ने भी दास्ताने माजी को फरामोश कर दिया। मगर काशी आज भी अपनी
रिवायते कदीमा को सीने में छुपाए गंगा की गोद से लिपटा हुआ है। काशी दरियाए गंगा
के किनारे एक हिलाल की शक्ल में आबाद है। मुगलसराय से जब रेलगाड़ी दरियाए गंगा के
पुल पर पहुंचती है तो काशी का दिलफरेब मंजर सामने आता है।
फिर
वे कहते हैं कि
अगर हिंदू तहजीब की जीती
-जागती
तस्वीर देखनी हो या उसकी कदामत की
, उसकी बुसअत
की
, उसके अमक की, उसकी फितरत पस्ती की
तस्वीर देखनी हो तो काशी के दरिया किनारे जा के देखो।



बहरहाल, एक सीधी सड़क है, जो अस्सी तीराहे से मारवाड़ी
हिन्दू अस्पताल चौराहे तक पहुंचाती है। वहां से एक रास्ता दायीं ओर मुड़ता है, जो
सीधे दशाश्वमेध घाट तक लेकर जाता है। चौराहे से घाट की दूरी 600 मीटर है, जहां काशी
का आध्यात्म अपने चरम पर होता है। बाबा विश्वनाथ का मंदिर यहीं पास में है। बाबा
विश्वनाथ के बिना काशी की कल्पना करना कुछ अजीब सा लगता है। यह एक किस्म का नैतिक
अपराध भी है। यह मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ का दर्शन उन्हीं भक्तों को प्राप्त
होता है, जिन्हें वे स्वयं बुलाते हैं। इन दिनों
बाबा विश्वनाथ मंदिर के आस-पास गलियारे का निर्माण हो रहा
है। और सांस्कृतिक आयोजनों के लिए भवनों का कायाकल्प हो रहा है। ऐसे लोगों की बड़ी
आबादी है जो काशी से वाराणसी बन चुकी इस प्राचीन नगरी के लिए
काशी विश्वनाथ कोरिडोर योजना की उचित
मानते हैं। वे कहते हैं कि यह नगर की जरूरत है। और इससे काशी की शोहरत भी बनी
रहेगी। उनका तर्क है कि दुनिया में तेजी से बदलाव हो रहे हैं। हमें भी उस समय के
लिए तैयार रहना चाहिए ताकि भारतीय अध्यात्म और संस्कृति से देश-दुनिया को परिचित
करा सकें। इस बात का स्मरण रहे कि इस कोरिडोर तैयार होने के बाद बाबा विश्वनाथ के
दर्शन के लिए लगने वाली लंबी कतारें फिर नहीं लगेंगी। इसके साथ-साथ कॉरिडोर में
चारों वेद
, सभी 18 पुराण, उपनिषद और वेदांग की झलक देखने को मिलेगी।



दूसरा पक्ष यह है कि वे काशी की
सुंदरता उसकी गलियों में देखते हैं। उनका तर्क यह है कि ऐसी महत्वाकांक्षी योजनाओं
से शहर की पहचान मिट सकती है। उसका प्रचीनपन नष्ट हो सकता है। योजना शुरू होते ही
इस तरह की बहस शुरू हो गई थी। बहस का जोर अब भी बना हुआ है। दोनों पक्ष मजबूती से
डटा है। यह बनारस के स्वभाव में है। डटे रहना। लेकिन, सुदूर दक्षिण से आने वाले
श्रद्धालु इससे खुश हैं। वे कहते हैं कि कोरिडोर बनकर तैयार हो जाएगा तो बाबा
विश्वनाथ के दर्शन के लिए लंबी लाईन नहीं लगेगी। यह स्मरण रहे कि प्रत्येक दक्षिण
भारतीयों की जीवन में एक मनोकामना होती है। वो यह कि कम से कम एक बार बाबा
विश्वनाथ का दर्शन करने के लिए काशी की यात्रा करे। दक्षिण भारतीय में काशी यात्रा
का विशेष महत्व रहा है। गंगा तट पर दक्षिण भारतीयों के लिए एक विशेष घाट है। यह
परंपरा कितनी पुरानी है, उसका कोई हिसाब नहीं है। यही कहना ठीक होगा कि शताब्दियों
से चली आ रही है। बहरहाल, सही बात तो यह है कि वाराणसी के लोग भी इस योजना की समय
की जरूरत बता रहे हैं। वे कह रहे हैं कि इससे लोगों के रहन-सहन का स्तर आर्थिक
दृष्टि से ऊंचा उठेगा और भारतीय संस्कृति का भी विस्तार होगा। इसका विरोध करने
वालों को वे दकियानूसी बताते हैं।



खैर, हम सुबह-सबेरे सड़क पर निकले तो
विचित्र नजारा सामने आया। हमारे पांव ठिठक गए। सड़क पर लोगों का जमघट था। लड़कों
की हनुमान टोली भी चली आ रही थी। वे लड़के अपने पसंदीदा राजनेता की तारीफ में
कसीदे पढ़ रहे थे। मालूम हुआ कि अभी-अभी अखबार आया है, उसमें कोई नई खबर नहीं है।
जो है, उसे नगरवासी पहले से जानते हैं। इसलिए वे कभी अखबार पर टिप्पणी करते तो कभी
राजनीतिक विरोधियों पर। यह सच है कि नरेन्द्र मोदी गुजरात के रहने वाले हैं।
सोलहवीं लोकसभा का चुनाव उन्होंने वाराणसी से लड़ा था। बड़े अंतर से उन्होंने
चुनाव जीता था। राजनीति में अक्सर देखने में आता है कि बाहरी उम्मीदवार पर लोग नाक
भौं सिकोड़ने लगते हैं। लेकिन, वाराणसी ने अलग उदाहरण प्रस्तुत किया है। ऐसा तनिक
भी आभास नहीं होता है कि भारतीय जनता पार्टी ने जोर-जबरदस्ती नरेन्द्र मोदी को
उनके माथे पर मढ़ दिया है। ताज्जुब की बात यह है कि जो लोग भाजपा से तीव्र मतभेद
रखते हैं, वे भी नरेन्द्र मोदी से आत्मीयता रखने लगे हैं। इसका कारण एक है-
वाराणसी का विकास। यहां लंबी अनर्गल बहस के बीच लोग एक बात पर सहमत होते दिखते हैं
कि वाराणसी में सकारात्मक बदलाव हुए हैं। इसके साथ बहस पूरी हो जाती है। वाराणसी
एक ऐसा शहर है, जहां राजनीति के भीतर ताक-झांक करने का मौका डेग-डेग पर मिलता है।
दिलचस्प बात यह है कि लोगों के राजनीतिक सिद्धांत एक दूसरे से कितने भी भिन्न
क्यों न हों
! आध्यात्मिक मान्यता के केंद्र में बाबा
विश्वनाथ ही हैं।



वाराणसी की परंपरा का जिन्हें बेहतर ज्ञान है, वे कहते हैं
कि अस्सी-तुलसी-गंगा इस शहर के तीन अनिवार्य तत्व हैं। गंगा तो यहां की जीवन रेखा
है। जब वाराणसी में डीजल रेल इंजन कारखाना लगा था तो उसका कचरा गंगा नदी में गिरता
था। उसका परिणाम यह आया कि गंगा में पहली बार प्रदूषण से मछलियां मरने लगीं।
वाराणसी की गंगा पर आधुनिकीकरण का पहला हमला था। उसका तीव्र विरोध हुआ। निजी पहल
करते हुए लोगों ने गंगा की सफाई का अभियान चलाया। दुर्भाग्य से इस दिशा में होने
वाले शासकीय पहल निराशाजनक रहे। उसका वाराणसी के लोगों पर गहरा असर पड़ा। लंबे समय
बाद नरेन्द्र मोदी के रूप में वाराणसी के लोगों को एक ऐसा व्यक्ति मिला, जिसने
नगरवासियों की आत्मा को स्पर्श किया है। गंगा में वाराणसी की आत्मा है। गंगा और
बाबा विश्वनाथ के बिना इस नगरी की कल्पना अधूरी रहेगी।
काशी विश्वनाथ कोरिडोर के साथ-साथ
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वयं गंगा की साफ-सफाई का अभियान चलाया। वे स्वयं
गंगा घाट की सफाई के लिए आगे बढ़े। लोगों को प्रेरित किया। गंगा नदी में गिरने
वाले गंदे नालों का मुंख मोड़ा दिया गया। अब स्थिति में सुधारा आया है। अच्छी बात
यह है कि मोदी इतने से संतुष्ट नहीं है। वे स्थिति को बेहतर रूप देने के लिए
प्रतिबद्ध दिखाई दे रहे हैं। 25 अप्रैल को नरेन्द्र मोदी वाराणसी आए तो नगरवासियों
ने उनका अभूतपूर्व तरीके से स्वागत किया। दरअसल, नरेन्द्र मोदी ने नगरवासियों के
मन में आशा के असंख्य दीप जला दिए हैं, जिससे चारों तरफ प्रकाश फैल रहा है।



एक समय काशी दुनिया की दौलतमंद नगरी थी। देश के सभी
छोटे-बड़े राजा महाराजाओं की गंगा के घाटों पर हवेलियां थी। वे तीर्थी यात्रा के
लिए काशी आते थे। लेकिन, समय के साथ इसकी संपन्नता कम होती गई। विदेशी शासकों ने
यहां के संसाधनों को खूब लूटा। आजाद भारत की सरकार ने भी उसकी भरपाई की तरफ कोई
ध्यान नहीं दिया। उससे काशी की चमक कम होती गई। धीरे-धीरे गंगा में पानी कम होता
गया और नगर का फैलाव बेढंग तरीके से विपरीत दिशा में होने लगा। यह सिलसिला कई
दशकों तक चला, जिससे अव्यवस्थाएं फैलने लगी थी। लंबी प्रतीक्षा के बाद अब काशी को
उसका पहरेदार मिल गया है, जिसने 21वीं शताब्दी में इसके प्रचीन गौरव को स्थापित
करने की प्रतिज्ञा ली है। इसका पूरा श्रेय काशी की जनता को है, क्योंकि काशी के
लोगों ने जनता की राजनीति करने वाले को अपना प्रतिनिधि चुना है। उसने धंधे की
राजनीति करने वालों को खारिज कर दिया है। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि काशी की
जनता को राजनीतिक समझ विरासत में मिली है। समय आने पर वह राजनीति में उचित और
अनुचित का आकलन ठीक-ठीक करती है।



बहरहाल, काशी में सबसे ज्यादा महत्व का स्थान उसके घाट हैं।
सो, हमलोग एक घाट के बाद दूसरे, तीसरे, फिर चौथे घाट से होते हुए आगे बढ़ रहे थे। जहां
हम ठहरे, वहां हरिश्चंद्र घाट सामने लिखा था। एक प्राचीन मंदिर पर ध्वजाएं लहरा
रही थीं। घाट पर अजीब सी शांति थी। यहां की अपनी कथा है, जो सूर्य वंशी राजा
हरिश्चंद्र से जुड़ी हुई है। इसी घाट पर बैठे-बैठे प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक मार्क
ट्वेन का लिखा ध्यान आता है। उसने लिखा है कि
बनारस इतिहास
से भी पुराना
, परंपराओं से भी पुरातन और अपनी किंवदंतियों से
भी प्राचीन है।
मुंशी प्रेमचंद ने भी काशी के घाटों की
चर्चा बड़े रोचक अंदाज में की है। हालांकि, उन्होंने उर्दू भाषा में लिखा था,
जिसका हिन्दी तर्जुमा इस तरह है-
काशी में सबसे ज्यादा दिल
को पसंद आने वाली चीज यहां के पुख्ता घाट हैं। सबसे खूबसूरत दशाश्वमेध घाट है।
रिवायत है कि यहां किसी जमाने में दस अश्वमेध यज्ञ किए गए थे। मणिकर्णिका घाट
इसलिए बहुत पवित्र समझा जाता है, क्योंकि यहां स्नान करने से खास तौर से फल की
प्राप्ति होती है। सिंधिया घाट
,  गाय घाट,  पंचगंगा
घाट वरैह भी मशहूर हैं। यहां एक-एक घाट नदी तट से इतने ऊंचे हैं कि लबेदरिया से ऊपर
तक जाने में दम फूल जाता है।



अपने अनुभव से मैंने पाया कि यहां हर चीज से आस्था जुड़ी
है। और आस्था और उसकी कथा में पूरा शहर गूंथा हुआ है। यह शहर वरुणा और अस्सी नाम
की दो नदियों के बीच गंगा तट पर बसा है। गंगा तट से देखने पर हम पाते हैं कि इसका
आकार अर्ध-चंद्रकार है। इस शहर के बारे में कुबेरनाथ राय लिखते हैं-
यह शिव का अविमुक्त क्षेत्र है। इसे छोड़कर वे कहीं नहीं जाते। इस भूमि पर
अनायास कुछ ऐसा अनुभव कभी-कभी हो जाता है जो अन्यत्र दुर्लभ है।
काशी भारतवर्ष की अंतदृष्टि
है। भू-मध्ये वाराणसी। यह इस देश की तीसरी आंख है। यह भारतवर्ष का ध्यान नेत्र है।
इसमें कुछ दिन रहकर इसके साथ एकाकार होकर जियें तो इसके माध्यम से बहुत कुछ लब्ध
हो जाता है, जो अन्य स्थलों पर संभव नहीं।
इसी संदर्भ में उन्होंने
आगे लिखा है कि
मैं उस दिन की बात बता रहा हूं, जब मुझे अस्सी घाट पर बैठे-बैठे आकाश में
गायत्री के पांचों मुखों का दर्शन हुआ था।
काशी में हर किसी की
अपनी अनुभूति है। उनके जीवन में काशी के घाट का अपना माहात्मय है। पूरब दिशा की ओर
खुलने वाली गलियां नगरवासियों को गंगा से जोड़ती हैं। नगर के लोग गली-गली पार कर
घाट तक जाते हैं और गंगा को निहार कर निहाल हो जाते हैं। यहां गली से यात्रा
प्रारंभ होती है और गली में समाप्त हो जाती है। गलियां संकरी हैं। उन्हीं गलियों
में सभी अपनी गति से आते-जाते हैं। दोनों तरफ ऊंचे-ऊचे भव्य मकान, कदम-कदम पर
मंदिर, लोगों के साथ तंग गलियों में बड़े इत्मीनान भाव से टहलते हुए साड़। यकीनन
ऐसा दृश्य दुनिया के किसी दूसरे शहर में दिखाई नहीं देगा।



यह सुनता आया हूं कि वाराणसी ने बाहर से आए लोगों का हमेशा
से स्वागत किया है। नगर में घूमते समय इसके प्रमाण मिलते हैं। यहां दक्षिण भारत के
लोगों की संख्या उतनी ही है, जितनी बड़ी आबादी बंगाली समाज की मालूम होती है।
राजस्थानी भी हैं और गुजराती भी। इनके अपने-अपने घाट हैं। मोहल्ले हैं। आश्रम हैं।
मंदिर हैं। ऐसा लगता है कि यह नगर नवागंतुकों के प्रति उदार रहा है। इतिहास में
जितना पीछे लौटें, इसके उदाहरण हमें मिलेंगे। यह अनायास ही नहीं है कि काशी
विश्वनाथ मंदिर के मुहाने पर कचौड़ी-जलेबी के साथ इडली-सांभर पारंपरिक अंदाज में बिकता
दिखाई पड़ता है। रिक्शा या ऑटो चालक बिना पूछे ऐसी जगह छोड़ेगा, जो नवागंतुकों के
लिए सबसे उपयुक्त जगह होगी। आखिर कोई रिक्शा या ऑटो वाला व्यक्ति की पहचान कैसे
करता होगा
? इसके जवाब में हरिहर ने कहा, वेशभूषा बड़ी चीज होती है बाबू साहब। सच बोलें तो यह बनारस है। यहां आदमी
की पहचान उसके रंग और गंध से हो जाती है।
इसका अर्थ यह नहीं
लगाना चाहिए कि यहां के लोग मुंहफट हैं। दरअसल, वे बेलाग-लपेट सीधी बात करते हैं। इसे
ही बनारसी अंदाज कहा जाता है। यहां हर दूसरा आदमी ज्ञानी और राजनीतिक समझ होने का
दावा करता है। इस पंक्ति के लेखक का अनुभव यह रहा कि वह परम ज्ञानी हो या न हो,
अपनी बात हर कीमत पर रखना उसे आता है। रही बात राजनीतिक होने की तो इतना ही कहूंगा
कि वाराणसी का चप्पा-चप्पा आध्यात्मिक और राजनीतिक चेतना से परिपूर्ण है। यहां के
लोगों में राजनीतिक जागरूकता गजब की है। यह पूछने पर कि 19 मई को क्या होने वाला
है
? जवाब में एक बनारसी ने कहा, इसका
जवाब 25 अप्रैल को मिल जाएगा।



बनारस का चुनावी घमासान सचमुच लोकतंत्र के उत्सव सरीखा होता
है। यह बनारस की जनता के बल पर ही संभव होता है। यहां के लोग पारखी है। उनके पास
बनारस का दिल तो है, लेकिन उससे आगे राजनीतिक समझ है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
से पढ़ाई कर चुके सुधीर रंजन कहते हैं,
हमलोग वाराणसी
के चुनावी परिणाम का प्रतीकात्मक असर जानते हैं। इसलिए लोकतंत्र के इस उत्सव में
बनारसी आत्मविवेक का पूरा इस्तेमाल करते हैं। क्या मजाल कि कोई इन्हें पाठ पढ़ा
दे।



यह मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ की यह नगरी भगवान शंकर के
त्रिशूल पर टिकी है, जिसके कोतवाल स्वयं भैरोनाथ हैं, इसलिए भय का कोई कारण नहीं
है। विश्वनाथ मंदिर के ऊपरी भाग पर सोने की परत चढ़ी है, जिसे महाराजा रणजीत सिंह
ने श्रद्धा स्वरूप अर्पित किया था। काशी में बारहों मास श्रद्धालुओं का आना
-जाना लगा रहता है। लेकिन, किसी विशेष अवसर पर लाखों की संख्या में लोग आते
हैं। ऐसे भी हैं जो अपनी जिंदगी के आखिरी दिनों को काटने यहां चले आते हैं और
पूजा-पाठ में जुटे रहते हैं। काशी निवासी व वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा लिखते हैं-
मणिकर्णिका घाट का सच वहां गए बिना नहीं समझा जा सकता। पिंड
और ब्रह्मांड को एक समझने वाली दृष्टि ही इस सच को पहचान सकती है, क्योंकि मृत्यु
यहां जीवन की लीला है। अंत नहीं है। मृत्यु यहां मंगल है। चिता-भस्म आभूषण है और
गंगाजल औषधि। दुनिया भले न माने, पर यह शहर ऐसे ही चल रहा है।
अहलेसुबह से लेकर देर रात तक कभी न खत्म होने वाली चहल-पहल मणिकर्णिका घाट
पर बनी रहती है। यहां जीवन चक्र अपनी गति से घूमता रहता है।



अब आगे बढ़ते हैं। प्राचीनकाल से ही काशी की विद्वत परंपरा
की कोई सानी नहीं है। 20वीं शताब्दी में उसका एक उदाहरण नागरी प्रचारिणी सभा है।
दुखद यह है कि 21वीं शताब्दी में दाखिल होने से बहुत पहले यह अपनी प्रासंगिकता खो
चुकी है। क्या इसके गौरव का वापस लौटाया जा सकेगा
! यदि
ऐसा हुआ तो वह हिन्दी भाषा के क्षेत्र में यह बड़ी उपलब्धि होगी। बनारस को देखकर
भी हम यह दावा नहीं कर सकते कि उसके हर रंग से हमारा गहरा परिचय हो चुका है।
बहरहाल, इस पूरी यात्रा के दौरान हमें यही महसूस होता रहा कि एक झीने पर्दे के पार
से ही बनारस को देखने में सफल रहे हैं।



इस अध्यात्मिक नगरी को दर्शनीय बनाने
का बीड़ा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उठाया है। यहां बड़ी सावधानी के साथ
नवीनीकरण का कम चल रहा है। इस बात का पूरा ध्यान रखा जा रहा है कि नूतनता में
पौराणिकता के साथ तनिक भी छेड़छाड़ न हो। अब से पहले काशी विश्वनाथ मंदिर के विकास
का काम 1853 में हुआ था, जब महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के शिखर पर सोना मंढ़वाया
था। यहां 25,000 वर्ग मीटर क्षेत्र में काशी विश्वनाथ कोरिडोर का काम चल रहा है। प्रधानमंत्री
स्वयं इस कार्य की निगरानी कर रहे हैं। इस बात के स्पष्ट निर्देश हैं कि कॉरीडोर
पाथ-वे निर्माण के दौरान पौराणिक अवशेषों
, मंदिरों, कला, संस्कृति, पेड़-पौधों
आदि से कोई छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए
, बल्कि उन्हें संरक्षित कर श्रद्धालुओं के लिए सुलभ बनाया
जाए। इस बदलाव पर काशी निवासी विष्णु पांडेय कहते हैं,
देखिए, बनारस पहले से बहुत बदल गया है। सड़कों की छोड़िए, यहां घाट और
गलियां भी साफ रहने लगी हैं। लैंप पोस्ट की दूधिया रोशनी से शहर जगमगाता रहता है।
विरोध करने वाले करेंगे, लेकिन वे बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।
अच्छी बात यह है कि
काशी के
विकास में यहां के बुनकरों का विकास भी मोदी की योजना में शामिल रहा है। मोदी के
सामने बनारस के कपड़ा उद्योग को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की चुनौती थी। यहां के
बुनकरों की शिकायत रही है कि कोई सरकार उनकी खोज-खबर नहीं लेती। हारकर उन्हें यह
उद्योग छोड़ना पड़ रहा है। मोदी की पहल पर यहां व्यापार केंद्र खुला है। इससे
बुनकरों में हिम्मत आई है और वे फिर से नए उत्साह के साथ कपड़ा उद्योग से जुड़ रहे
हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने वाराणसी के हस्तकरघा उद्योग को
मेक इन इंडिया के साथ स्किल इंडिया कार्यक्रम से भी जोड़ दिया है।
इसके अंतर्गत कारीगरों को तकनीक एवं कौशलता का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।



हस्तकरघा उद्योग को गति देने और कौशल
संपन्न बनाने के लिए वाराणसी में छह करोड़ रुपए की लागत से नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ
फैशन टेक्नोलॉजी की शाखा खोली गई है। रीजनल सिल्क टेक्नोलॉजिकल रिसर्च स्टेशन की
स्थापना भी की गई है। इन बुनकरों को मुद्रा योजना से जोड़ा गया है ताकि व्यापार
चलाने में इसका उपयोग कर सकें। नरेन्द्र मोदी हस्तकरघा उद्योग को ध्यान में रखकर
बड़े लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रहे हैं। इस समय दुनिया के 35 प्रतिशत कालीन बाजार पर
भारत का कब्जा है। यह लक्ष्य रखा गया है कि शीघ्र ही दुनिया के कालीन बाजार के 50
फीसदी हिस्से पर भारत का अधिकार होगा। एक समय था, जब बनारस के सिल्क की मांग पूरी
दुनिया में थी। यहां के बुनकरों कलाकारी विश्व प्रसिद्ध थी। क्या यहां बुनकर एक
बार फिर उस कीर्ति को प्राप्त कर सकेंगे
! कोई तो यही
हो रही है।
छोटी-छोटी शुरुआत कर बड़े लक्ष्य तक छोटी
शुरूआत कर बड़े लक्ष्य तक पहंचने का प्रयास किया जा रहा है। मोदी ने कहा है कि 2022
में भारत की आजादी के 75 साल पूरे हो रहे हैं। 2022 तक कालीन का निर्यात ढाई गुना
बढ़ाकर 25 हजार करोड़ रुपए करने का लक्ष्य हासिल करेंगे। इस तरह समग्र दृष्टिकोण के
साथ नरेन्द्र मोदी आगे बढ़ रहे हैं और फिर से यह नगरी व्यापर का बड़ा केंद्र बनने
की ओर अग्रसर है। जल, थल और वायू मार्ग से बनारस को जोड़ दिया गया है। नवंबर 2018
में ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नवंबर 2018 में ही घोषणा कर दी थी कि-
काशी नेचर, कल्चर और एडवेंचर का संगम बनने जा रही है।इस बाबत
चर्चा शुरू हुई तो ठेठ बनारसी अंदाज में एक शख्स ने कहा,
ददा, यहां की व्यवस्था
बड़ी चौचक हो गई है।


 
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