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हिंदी प्रेमी हैं पीएम मोदी

24/09/2019

हिंदी प्रेमी हैं पीएम मोदी

बद्रीनाथ वर्मा

महात्मा गांधी की ही तरह पीएम मोदी भी हिंदी के हिमायती हैं। अच्छी अंग्रेजी जानने के बावजूद वह अपनी बात हिंदी में ही रखना पसंद करते हैं। चाहे मंच कोई भी हो। हां अपने गृह राज्य गुजरात में जरूर वह हिंदी के साथ गुजराती भी बोलते नजर आते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हिंदी प्रेम जगजाहिर है। मंच चाहे प्रादेशिक हो, राष्ट्रीय या फिर अंतरराष्ट्रीय ही क्यों न हो। वे हमेशा अपनी बात हिंदी में ही रखते हैं। ऐसा नहीं कि उन्हें दूसरी भाषाएं नहीं आतीं, बल्कि इसलिए कि वह हिंदी की ताकत को समझते हैं। हिंदी की यह ताकत उन्होंने गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए ही समझ ली थी। मुख्यमंत्री के रूप में भी वह अक्सर हिंदी में भाषण देते दिखाई पड़ते थे। इसका उन्हें सीधा लाभ मिला। वह पूरे देश में सर्वस्वीकार्य नेता बन गये और जब भाजपा ने उन्हें प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश किया तो जनता ने उन्हें सहजता से स्वीकार कर लिया। ऐसे में इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उनकी जीत के पीछे हिंदी में किये जाने वाले संप्रेषण का भी एक हद तक योगदान है।
खैर, आज भले ही हिंदी को सियासत का हथियार बनाया जा रहा है लेकिन सच यह है कि खुद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित होता हुआ देखना चाहते थे। महात्मा गांधी की ही तरह प्रधानमंत्री मोदी भी हिंदी के प्रबल पैरोकार हैं। यह भी एक संयोग ही है कि हिंदी के हिमायती महात्मा गांधी और प्रधानमंत्री मोदी, दोनों की ही मातृभाषा गुजराती ही है। बावजूद इसके हिंदी की ताकत से परिचित होने की वजह से प्रधानमंत्री अपनी बात हिंदी में ही रखना पसंद करते हैं। चाहे वह चुनावी मंच हो या लोकतंत्र का मंदिर कहा जाने वाला संसद अथवा विदेशी धरती। अच्छी अंग्रेजी जानने के बावजूद वे हिंदी में ही बोलते हैं।
इसकी तस्दीक खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप यह कहते हुए कर चुके हैं कि पीएम मोदी को अच्छी अंग्रेजी आती है लेकिन वह जान बूझकर हिंदी में बोलना पसंद करते हैं। दरअसल, अंग्रेजी पर हिंदी को वरीयता देने के पीछे की एक वजह तो यह है कि देश की एक बड़ी आबादी की भाषा हिंदी है। दूसरी, पीएम मोदी अपनी बात हिंदी में रखकर इस बड़ी आबादी के साथ सीधे जुड़ जाते हैं। वे जानते हैं कि हिंदी में कही गई उनकी बातें देश की अधिसंख्य आबादी तक सीधी पहुंचने की क्षमता रखती है, जबकि अंग्रेजी कुछ खास लोगों तक। उन्हें पता है कि हिंदी जन की भाषा है। देश की धड़कन है। गैर हिंदीभाषी राज्यों की भी अधिसंख्य आबादी हिंदी समझती है, बोलती है। हां, जब वे अपने गृह राज्य गुजरात में होते हैं तो जरूर हिंदी के साथ गुजराती में भी बोलते नजर आते हैं।
बहरहाल, बीजेपी अध्यक्ष व देश के गृहमंत्री अमित शाह ने ‘हिंदी हमारे देश को एकजुट करती है’ क्या कह दिया कि दक्षिण भारत में मानो हाहाकार मच गया। अभिनेता से नेता बने कमल हासन से लेकर रजनीकांत तक उन पर पिल पड़े। और तो और खुद भाजपा नेता और कर्नाटक के मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा ने भी कह दिया कि कर्नाटक की मुख्य भाषा कन्नड़ है और हम इसके महत्व से कभी समझौता नहीं करेंगे। गौरतलब है कि 14 सितंबर को अमित शाह ने ट्वीट किया था कि आज देश को एकता की डोर में बाँधने का काम अगर कोई एक भाषा कर सकती है तो वह सर्वाधिक बोली जाने वाली हिंदी भाषा ही है। हालांकि शाह ने यह भी कहा था कि भारत विभिन्न भाषाओं का देश है और हर भाषा का अपना महत्व है।
बावजूद इसके सियासतदानों ने अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकनी शुरू कर दी। शुरूआत कमल हासन ने की। एक वीडियो जारी कर उन्होंने कहा कि भारत 1950 में ‘अनेकता में एकता’ के वादे के साथ गणतंत्र बना था और अब कोई ‘शाह, सुल्तान या सम्राट’ इससे इनकार नहीं कर सकता है। उन्होंने यहां तक कह दिया कि जल्लीकट्टू तो सिर्फ़ विरोध-प्रदर्शन था। हमारी भाषा के लिए जंग उससे कई गुना ज्यादा होगी। अगली बारी रजनीकांत की थी। उनका कहना है कि आम भाषा देश की उन्नति के लिए अच्छी होगी लेकिन दुर्भाग्य से भारत में आम भाषा नहीं है। हिंदी को यदि थोपा जाता है तो इसे तमिलनाडु में कोई स्वीकार नहीं करेगा। विडंबना ही है कि हिंदी फिल्मों की बदौलत देशव्यापी पहचान बनाने वाले इन अभिनेताओं का हिंदी को लेकर यह दुराग्रह निश्चय ही दुर्भाग्यजनक है।


 
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