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योग साधकों का तीर्थ महावतार बाबा जी की गुफा

10/07/2019

योग साधकों का तीर्थ महावतार बाबा जी की गुफा


हाड़ी पर चढ़ते वक्त एक सहयात्री ने बताया कि वह द्वारहाट के निकट दूनादेवी मंदिर में दर्शन के लिए सपत्नी आए थे। परिसर में उनको पूजा का सामान बेचने वाले एक दुकानदार ने मुμत में ही महावतार बाबाजी का फोटो देकर कहा कि कुछ किलोमीटर दूर बाबाजी की गुफा है। लगे हाथ उसका भी दर्शन कर लीजिए। महावतार बाबाजी का नाम उनके लिए अनजाना नहीं था, लेकिन इस स्थान पर उनकी गुफा होगी, यह मालूम नहीं था। कारण कि कई दशक पहले अपने छात्र जीवन में उन्होंने स्वामी योगानंद की पुस्तक- एक योगी की आत्मकथा (योगी कथामृत) को पढ़ा था जिसमें महावतार बाबाजी और उनकी गुफा का विधिवत जिक्र था। फिर क्या, वह अपने कदमों को रोक नहीं सके और अपनी पत्नी के साथ बाबाजी की गुफा का दर्शन करने का मन बना लिया। किताब भले ही कई दशक पहले पढ़ी हो पर दर्शन योग अब बना था। यह अलग बात है कि उनकी पत्नी को बाबाजी की गुफा की खड़ी चढ़ाई का अनुमान नही था। उनको दिन में तारे दिखने लगे थे। लेकिन इस गुफा का दर्शन होने के बाद सहज ही इस दंपति के सहर्ष आनंद का अनुमान लगाया जा सकता था।

आध्यात्मिक दुनिया के पटल पर मौजूद इस गुफा तक वही पहुंच सकता है, जिसका कोई न कोई योग बाबाजी के योग से मिलता हो। क्रियायोग को अपनाने वालों की यह इच्छा जरूर होती है कि उनको जीवन में एक बार इस गुफा का दर्शन हो।

दरअसल, महावतार बाबाजी और शेष दुनिया के बीच ‘एक योगी की आत्मकथा’ पुस्तक वह सेतु है, जिसके जरिए दुनिया महावतार बाबाजी को जानती है। माना जाता है कि आध्यात्मिक दुनिया में यह पुस्तक सबसे ज्यादा पढ़ी जाती है। इस पुस्तक के बारे ख़ुद अपना अनुभव यह रहा है कि इसे मेरे एक मित्र ने मुझे 2002 में पढ़ने के लिए दी लेकिन उसे मैंने किसी और को भेंट कर दी। बाद में कभी किसी पुस्तक स्टाल पर जाने पर अगर यह पुस्तक वहां होती तो बराबर ध्यान खींचती। कोई तीन साल बाद 2005 में ऐसे ही एक अन्य मित्र ने जानना चाहा कि क्या मैंने वह पुस्तक पढ़ी है, तब सीधा जवाब न देकर उनको पैसे देकर तुरंत पुस्तक लाने को कहा और पढ़ गया। उसके बाद कई बार पढ़ा और अभी भी जब-तब पढ़ लेता हूं। इस वाक्ये के करीब 12 साल बाद बाबाजी की गुफा का दर्शन हुआ। उसके लिए बाकायदा योजना बनाकर गया और करीब एक हμता गुफा के नीचे कूकूछीना गांव में रहा। यह पुस्तक वह सीढ़ी है जिसके माध्यम से दूनागिरि की पहाड़यिों की गोद में बसे कूकूछीना कस्बा के निकट रतखाल गांव से चढ़ाई करके बाबाजी की गुफा तक पहुंचा जा सकता है।

आध्यात्मिक दुनिया के पटल पर मौजूद इस गुफा तक वही पहुंच सकता है, जिसका कोई न कोई योग बाबाजी के योग से मिलता हो। क्रियायोग को अपनाने वालों की यह इच्छा जरूर होती है कि उनको जीवन में एक बार इस गुफा का दर्शन हो। महावतार बाबा की गुफा के अलावा दूनागिरि की पहाड़यिों की पहचान पांडवों से भी जुड़ी है। गुफा के निकट उनसे जुड़ा स्थान भी है, जिसे पांडव खोली कहा जाता है। माना जाता है कि महाभारत काल में कौरवों की सेना अज्ञातवास में पांडवों को खोजते हुए इन पहाड़यिों में भी आई थी और यहीं एक स्थान पर ठहरी थी। तब कौरव सेना के नाम पर बना ठहराव घिसते-घिसते कूकूछीना हो गया। इस गांव के निकट रतखाल गांव से गुफा जाने वाली पगडंडी की शुरुआत में एक बुजुर्ग महिला मीना देवी का घर पड़ता है। उनके घर में बाबाजी का फोटो है। मशहूर तमिल अभिनेता रजनीकांत का भी चित्र बराबर उनके घर में रहता है। रजनीकांत वहां आते रहे हैं। घर से सटी मीना देवी की छोटी सी चाय की दुकान है। गुफा में जाने वाले औसतन यात्री पहाड़ी पर चढ़ने से पहले कुछ समय यहां बिताते हैं। फिर वहीं से एक छड़ी लेकर आगे बढ़ते हैं और वापस लौटकर छड़ी वापस करते हैं। किसी यात्री का योग अच्छा हो और मीना देवी का कुत्ता शेरू का मूड ठीक हो तो किसी यात्री के आगे चलते हुए गुफा तक पहुंचा देता है और साथ वापस आ जाता है।

अद्भुत है पाताल भुवनेश्वर भी

बहरहाल, देवभूमि उत्तराखंड का गुफाओं से गहरा व रहस्यमयी संबंध है। यहां गुफाओं की अपनी एक अलग ही दुनिया है और बाहरी दुनिया से एकदम अलग, लेकिन ऊर्जा से भरी हुई। इसी कड़ी में महावतार बाबाजी की गुफा की तरह साकार रूप में भगवान शिव को समर्पित एक गुफा है। यह पिथौरागढ़ में है जिसका नाम पाताल भुवनेश्वर है। जमीन से करीब 90 फीट गहरी इस गुफा में लोहे की चेन पकड़कर नीचे की तरफ खिसकना होता है। पत्थर एकदम चिकने हंै और उन पर फिसलकर जाना एक अद्भुत अनुभव देता है। इसके अंदर जाने का अपना एक अलग ही रोमांच है। इसमें प्रवेश के लिए बाकायदा अपना नाम व फोन नंबर दर्ज करना होता है। इस गुफा के बारे में काशी में अपने एक मित्र से सुना था जिन्होंने कुछ साल पहले गुफा से इसका रोमांचकारी वर्णन किया था, तभी से इसे देखने की उत्कट इच्छा थी। एक साथ करीब दो दर्जन लोगों को प्रवेश कराया जाता है। कोई यात्री अगर अकेला और उम्रदराज है, तो उसकी कुछ ज्यादा ही चिंता की जाती है। गाइड की देखरेख में जाना होता है, लेकिन उसकी कोई मुकम्मल फीस नहीं। इच्छा से जो उसे मिल जाए, वही उसके लिए हरि इच्छा। खैर, इस रोमांचकारी गुफा में बाकी लोगों की तरह प्रवेश कर गया। करीब डेढ़ हजÞार वर्ग फीट में फैली गुफा में कुछ स्थान ही ऐसे थे, जहां खड़ा हुआ जा सकता है। नहीं तो, झुककर ही इस गुफा में घूमा जा सकता है। प्राकृतिक तरीके से बनी इस गुफा में पत्थरों पर चारों युग यानी सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग का इतिहास उकरा है। शेषनाग हैं, जिनमें पूरी पृथ्वी ही समाहित है। सागर मंथन है। तैंतीस करोड़ देवी-देवता हैं। शिव की जटाओं से मां गंगाजी का अवतरण है। ऐरावत है। नाग वासुकी हैं। कामधेनु है। ब्रह्मा, विष्णु व महेश तीनों हंै। माना जाता है कि गुफा के भीतर चार गुफाओं के रास्तों में तीन अपने युग के पूरा होने के साथ बंद हो गए जो सतयुग, त्रेता और द्वापर के प्रतीक हैं। चौथा द्वार जिससे आना-जाना होता है, वह कलियुग का प्रतीक है। कलियुग के अंत का संकेत भी दर्ज है। इस गुफा की खोज आदि शंकराचार्य ने 822 ईस्वी में करके यहां साधना की थी। मर्हिष अरविंद ने कहा था कि ईश्वर की प्रयोगभूमि है भारतवर्ष। इसमें आगे जोड़ा जा सकता है कि उस प्रयोगभूमि की प्रयोगशाला हैं यह गुफाएं, जिनका रहस्य पूरी की पूरी देवभूमि में यत्र-तत्र बिखरा पड़ा है।

गुफा उत्तराखंड के कुमायूं मंडल में है और यहां गढ़वाल मंडल की तरह धर्म का शोर कम और आध्यात्मिक वातावरण ज्यादा शांतिपूर्ण है। मीना देवी के पास थोड़ी सी खेती है। उनके पति लल्लाराम का हाल में स्वर्गवास हो गया था। दो साल पहले इस सुनसान इलाके में जंगली जानवरों से डर के सवाल पर उनका कहा याद है कि पहाड़ों पर दिन मनुष्यों का होता है और रात जंगली जानवरों की। दोनों अपने समय के प्रति चौकन्ने रहते है। रात में हम चौकन्ना और दिन में जंगली जानवर। कई दफा कोई न कोई अनजान अकेला ऊपर जाता है, लेकिन किसी के साथ कोई ऐसा ऐसा-वैसा वाक्या आजतक नहीं घटा। लेकिन यह बताने वाले जरूर मिल जाते है कि पहाड़ी पर फिसलने पर किसी अदृश्य शक्ति ने उनको बचा लिया। मान्यता है कि बाबाजी अदृश्य रूप में यह चमत्कार करते हैं और यह अनुभव लेखक को भी है। बाबाजी यहां कण-कण में व्याप्त हंै। स्वामी योगानंद ने क्रियायोग के जरिए उनका परिचय दुनिया से कराया। स्वामी विवेकानंद ने दुनिया को हिंदू धर्म तो स्वामी योगानंद ने भारतीय अध्यात्म व योग से परिचय कराया।

वह पहले भारतीय गुरु थे जिन्होंने पश्चिम को विधिवत तरीके से अध्यात्म व योग से परिचय कराकर दावा किया कि क्रिया योग से ईश्वर का साक्षात्कार किया जा सकता है। उन्होंने 1920 में अमेरिका की तरफ रुख किया। अनेक यात्राएं की। उनकी मशहूर आध्यात्मिक पुस्तक ‘एक योगी की आत्मकथा’ को सदा ही सबसे ज्यादा बिकने वाली पुस्तकों में शुमार किया जाता है। बाबाजी की गुफा का सरंक्षण भी योगदा सत्संग सोसायटी करती है, जिसकी स्थापना स्वामी योगानंद ने की थी। इस संस्था ने बाबाजी की गुफा के नीचे एक ध्यान केंद्र बनाया है। स्वामी योगानंद का बाबाजी से रिश्ता यह है कि स्वामी योगानंद के गुरु स्वामी युक्तेश्वर गिरि के गुरु योगिराज श्यामाचरण लाहिड़ी रहे। वे लाहिड़ी महाशय के नाम से जाने जाते हैं। महावतार बाबा ने 1861 में इसी स्थान पर लाहिड़ी महाशय को दर्शन देकर बताया कि अतीत में वह उनके गुरु थे। उनको क्रियायोग की दीक्षा दी और उसका प्रसार करने का निर्देश दिया।

आदिकाल से जितने भी योगी हुए हैं, उन्होंने अपनी आध्यात्मिक यात्रा का कुछ न कुछ समय काशी में जरूर बिताया है। संकेत में कहा जा सकता है कि मंत्र, तंत्र और यंत्र साधना का संगम है काशी।

लाहिड़ी महाशय ने ऐसा किया और दुनिया को इससे रूबरू कराया। बाबाजी के चमत्कार से ही काशी से लाहिड़ी महाशय रानीखेत पहुंचे थे। काशी आकर उन्होंने क्रियायोग का आसन जमा लिया। उन्होंने क्रियायोग से भक्तों को दीक्षित किया। बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी सतत क्रियाशील है और वहां से प्रकाशित क्रियायोग आध्यात्मिक साधना का एक प्रबल मार्ग है। साधना का कोई भी पक्ष हो, वह सधता काशी में ही है। आदिकाल से जितने भी योगी हुए हैं, उन्होंने अपनी आध्यात्मिक यात्रा का कुछ न कुछ समय काशी में जरूर बिताया है। संकेत में कहा जा सकता है कि मंत्र, तंत्र और यंत्र साधना का संगम है काशी। लाहिड़ी महाशय ने युक्तेश्वर गिरि को दीक्षा दी और गिरि ने स्वामी योगानंद को दीक्षित किया। यह भी अजीब योग है कि स्वामी योगानंद बार-बार हिमालय की तरफ भागते थे, जबकि उनके गुरु कोलकाता से करीब तीस किलोमीटर श्रीरामपुर में थे। अपने गुरु के आशीर्वाद से स्वामी योगानंद पश्चिमी देश गए और भारतीयता और अध्यात्म का परचम फहराया। पश्चिमी देशों के दूरदराज क्षेत्रों से महावतार बाबाजी की गुफा में साधक आते हैं। यह स्थानीय लोगों के लिए बराबर कौतूहल का विषय रहता है कि उनके बाबाजी का प्रताप कहां से कहां तक फैला है। 


 
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