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सवालों की धुंध में निकाय चुनाव

22/10/2019

सवालों की धुंध में निकाय चुनाव

विजय माथुर

राज्य में नगर निकाय चुनाव होने वाले हैं। चुनाव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, किस पद्धति से हो, इसके बरक्स सवाल ज्यादा जरूरी यह है कि वर्तमान पार्षद किस मुंह से जनता के सामने जाएंगे।

निकायों के आसन्न चुनावों को लेकर नेताओं ने अपनी महत्वाकांक्षाओं को धार देना शुरू कर दिया है। लेकिन अहम सवाल यह बना हुआ है कि चुनाव प्रत्यक्ष पद्धति से होगा या अप्रत्यक्ष। इस सवाल का जवाब भी अहम है क्योंकि इसी से अंदाजा लग सकेगा कि सरकार की जनता पर कितनी पकड़ है। क्या विपक्ष भारी पड़ सकता है और क्या कांग्रेस सरकार अपनी पिछली सफलता दोहरा पाएगी? प्रत्यक्ष चुनाव में कांग्रेस भारी मुनाफे में रही थी। तब कोटा और जयपुर समेत 5 नगर निगमों में कांग्रेस के मेयर चुने गए थे।
राज्य सरकार निकाय चुनावों को लेकर अधर में क्यों है? इस कहानी को समझें तो सूबे में कांग्रेस सरकार बनने के बाद नगर निकाय अध्यक्षों के चुनाव सीधे कराने को लेकर नगर पालिका अधिनियम में संशोधन किया गया था। इस नुक्ता निगाह से अप्रत्यक्ष चुनाव की परिपाटी बदल कर अध्यक्षों का प्रत्यक्ष प्रणाली से चुनाव कराने का निर्णय लिया गया। इस दौरान पार्षदों के आरक्षण की लाटरी भी निकाल दी गई। सूत्रों का कहना है कि इस दौरान सरकार और संगठन के बीच कुछ ऐसी स्थितियां बनी कि इस पर पुर्नविचार की नौबत आ गई। नतीजतन सरकार ने जनप्रतिनिधियों की राय शुमारी के लिए समिति का गठन कर दिया। रिपोर्ट तैयार कर मुख्यमंत्री को दी जाएगी।
अंतिम फैसला मुख्यमंत्री ही करेंगे। निकाय चुनावों को लेकर भ्रम की वजह चुनाव आयोग का पत्र वायरल हो जाना है। दरअसल पिछले दिनों राज्य चुनाव आयोग ने जिला कलेक्टरों को पत्र लिखकर निकाय अध्यक्ष के सीधे चुनाव की अधिसूचना हिन्दी में भेज दी थी। मौकापरस्त लोगों ने इस पत्र को सोशल मीडिया पर वायरल कर इसे सरकार का निर्णय बता दिया। जबकि हकीकत में यह आयोग की सामान्य प्रक्रिया है।
यहां वरिष्ठ पत्रकार अनुराग त्रिवेदी यह कहने से नहीं चूकते कि पिछली भाजपा सरकार ने जब प्रत्यक्ष चुनाव के प्रावधान में फेरबदल किया था, तो उसका सबसे ज्यादा विरोध कांग्रेस ने ही किया था। बहरहाल यह सवाल अपनी जगह कायम है कि चुनाव चाहे जिस पैटर्न पर हो, पार्षदों को अपने कामों की जवाबदेही से तो दो चार होना ही पड़ेगा। खबर है कि कोटा नगर निगम में आधे से अधिक पार्षद चुनाव लड़ने के लिए वार्ड बदलने की तैयारी में है। सूत्रों का कहना है कि ऐसे पार्षदों की संख्या कम नहीं जिन्होंने पूरे पांच साल तक जनता से दूरी बनाए रखी।
अब जनता को मुंह कैसे दिखाएंगे? ऐसे पार्षदों की भी कमी नहीं कि जिन्होंने अपने वार्ड के लोगों का फोन तक उठाने की जहमत नहीं उठाई। गिनती के ही पार्षदों ने वार्ड के लोगों की समस्या समाधान के लिए दμतर खोल रखे हैं। इनमें अनिल सुवालका, राम मोहन मित्रा, राखी गौतम, रमेश आहूजा, नरेन्द्र हाड़ा, विनोद नायक और डिप्टी मेयर सुनीता व्यास का ही नाम शुमार होता है। पार्षदों के बीच स्टेपनी शब्द खासा चर्चित है। सूत्रों का कहना है कि कई पार्षद वार्ड के लोगों से कभी सीधे मुखातिब नहीं हुए।
उन्होंने अपनी व्यस्तता का हवाला देकर स्टेपनी के रूप में एक कार्यकर्ता को अपने साथ लगाए रखा। ऐसा कार्यकर्ता पार्षदों के कितने काम अंजाम दे पाया होगा, कहने की जरूरत नहीं। नगर निगम के काम-काज को गति देने के लिए राज्य सरकार ने एक दर्जन समितियां बनाई थी। नतीजा क्या रहा? सूत्रों का कहना है कि विकास के नाम पर प्रस्ताव पारित कराने में कमी नहीं छोड़ी गई। लेकिन 90 फीसदी प्रस्ताव धरातल पर ही नहीं उतर पाए। भले ही समिति के मुखिया इसके लिए मेयर को जिम्मेदार ठहरा रहे हों, लेकिन सवाल है कि उन्होंने प्रयास के नाम पर क्या किया। आधा दर्जन समितियों का काम-काज कागजों में ही सिमट कर रह गया।
विकास की अलख जगाने वाली इन समितियों में से दो के मुखिया तो अकेले मेयर ही थे। लेकिन उनकी समिति के 75 फीसदी फैसलों का पालना तक नहीं हुआ। विश्लेषकों का कहना है कि अब इस कोताही और नाफरमानी का जवाब प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पूनिया को नहीं मेयर और पार्षदों को देना पड़ेगा।राज्य में नगर निकाय चुनाव होने वाले हैं। चुनाव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, किस पद्धति से हो, इसके बरक्स सवाल ज्यादा जरूरी यह है कि वर्तमान पार्षद किस मुंह से जनता के सामने जाएंगे।

निकायों के आसन्न चुनावों को लेकर नेताओं ने अपनी महत्वाकांक्षाओं को धार देना शुरू कर दिया है। लेकिन अहम सवाल यह बना हुआ है कि चुनाव प्रत्यक्ष पद्धति से होगा या अप्रत्यक्ष। इस सवाल का जवाब भी अहम है क्योंकि इसी से अंदाजा लग सकेगा कि सरकार की जनता पर कितनी पकड़ है। क्या विपक्ष भारी पड़ सकता है और क्या कांग्रेस सरकार अपनी पिछली सफलता दोहरा पाएगी? प्रत्यक्ष चुनाव में कांग्रेस भारी मुनाफे में रही थी। तब कोटा और जयपुर समेत 5 नगर निगमों में कांग्रेस के मेयर चुने गए थे।
राज्य सरकार निकाय चुनावों को लेकर अधर में क्यों है? इस कहानी को समझें तो सूबे में कांग्रेस सरकार बनने के बाद नगर निकाय अध्यक्षों के चुनाव सीधे कराने को लेकर नगर पालिका अधिनियम में संशोधन किया गया था। इस नुक्ता निगाह से अप्रत्यक्ष चुनाव की परिपाटी बदल कर अध्यक्षों का प्रत्यक्ष प्रणाली से चुनाव कराने का निर्णय लिया गया। इस दौरान पार्षदों के आरक्षण की लाटरी भी निकाल दी गई। सूत्रों का कहना है कि इस दौरान सरकार और संगठन के बीच कुछ ऐसी स्थितियां बनी कि इस पर पुर्नविचार की नौबत आ गई। नतीजतन सरकार ने जनप्रतिनिधियों की राय शुमारी के लिए समिति का गठन कर दिया। रिपोर्ट तैयार कर मुख्यमंत्री को दी जाएगी।
अंतिम फैसला मुख्यमंत्री ही करेंगे। निकाय चुनावों को लेकर भ्रम की वजह चुनाव आयोग का पत्र वायरल हो जाना है। दरअसल पिछले दिनों राज्य चुनाव आयोग ने जिला कलेक्टरों को पत्र लिखकर निकाय अध्यक्ष के सीधे चुनाव की अधिसूचना हिन्दी में भेज दी थी। मौकापरस्त लोगों ने इस पत्र को सोशल मीडिया पर वायरल कर इसे सरकार का निर्णय बता दिया। जबकि हकीकत में यह आयोग की सामान्य प्रक्रिया है।
यहां वरिष्ठ पत्रकार अनुराग त्रिवेदी यह कहने से नहीं चूकते कि पिछली भाजपा सरकार ने जब प्रत्यक्ष चुनाव के प्रावधान में फेरबदल किया था, तो उसका सबसे ज्यादा विरोध कांग्रेस ने ही किया था। बहरहाल यह सवाल अपनी जगह कायम है कि चुनाव चाहे जिस पैटर्न पर हो, पार्षदों को अपने कामों की जवाबदेही से तो दो चार होना ही पड़ेगा। खबर है कि कोटा नगर निगम में आधे से अधिक पार्षद चुनाव लड़ने के लिए वार्ड बदलने की तैयारी में है। सूत्रों का कहना है कि ऐसे पार्षदों की संख्या कम नहीं जिन्होंने पूरे पांच साल तक जनता से दूरी बनाए रखी।
अब जनता को मुंह कैसे दिखाएंगे? ऐसे पार्षदों की भी कमी नहीं कि जिन्होंने अपने वार्ड के लोगों का फोन तक उठाने की जहमत नहीं उठाई। गिनती के ही पार्षदों ने वार्ड के लोगों की समस्या समाधान के लिए दμतर खोल रखे हैं। इनमें अनिल सुवालका, राम मोहन मित्रा, राखी गौतम, रमेश आहूजा, नरेन्द्र हाड़ा, विनोद नायक और डिप्टी मेयर सुनीता व्यास का ही नाम शुमार होता है। पार्षदों के बीच स्टेपनी शब्द खासा चर्चित है। सूत्रों का कहना है कि कई पार्षद वार्ड के लोगों से कभी सीधे मुखातिब नहीं हुए।
उन्होंने अपनी व्यस्तता का हवाला देकर स्टेपनी के रूप में एक कार्यकर्ता को अपने साथ लगाए रखा। ऐसा कार्यकर्ता पार्षदों के कितने काम अंजाम दे पाया होगा, कहने की जरूरत नहीं। नगर निगम के काम-काज को गति देने के लिए राज्य सरकार ने एक दर्जन समितियां बनाई थी। नतीजा क्या रहा? सूत्रों का कहना है कि विकास के नाम पर प्रस्ताव पारित कराने में कमी नहीं छोड़ी गई। लेकिन 90 फीसदी प्रस्ताव धरातल पर ही नहीं उतर पाए। भले ही समिति के मुखिया इसके लिए मेयर को जिम्मेदार ठहरा रहे हों, लेकिन सवाल है कि उन्होंने प्रयास के नाम पर क्या किया। आधा दर्जन समितियों का काम-काज कागजों में ही सिमट कर रह गया।
विकास की अलख जगाने वाली इन समितियों में से दो के मुखिया तो अकेले मेयर ही थे। लेकिन उनकी समिति के 75 फीसदी फैसलों का पालना तक नहीं हुआ। विश्लेषकों का कहना है कि अब इस कोताही और नाफरमानी का जवाब प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पूनिया को नहीं मेयर और पार्षदों को देना पड़ेगा।


 
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