युगवार्ता

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हरियाणा के नतीजों ने चौंकाया

13/11/2019

हरियाणा के नतीजों ने चौंकाया

संजय वर्मा

हरियाणा के चुनाव परिणाम ने भाजपा-कांग्रेस के साथ-साथ राजनीतिक पंडितों को भी चौंकाया है। वैसे सूबे में पांच साल तक शासन करने के बाद भी सबसे बड़े दल के तौर पर उभरना भाजपा और मनोहर लाल खट्टर की उपलब्धि ही कही जाएगी।

हरियाणा के चुनाव परिणाम ने भाजपा, राजनीतिक विश्लेषकों तथा एग्जिट पोल के कथित विशेषज्ञों को तो हैरान किया ही लेकिन निश्चित तौर पर इन नतीजों से सबसे अधिक हैरानी कांग्रेस पार्टी को हुई है। लोकसभा चुनाव के बाद से ही कांग्रेस नेतृत्व यह मान चुका था कि हरियाणा विधान सभा चुनावों में उसके सामने कोई अवसर नहीं है। तभी तो कभी सख्त फैसले लेने के लिए कुख्यात रहा कांग्रेस आलाकमान, हरियाणा के अपने नेताओं के बीच चल रही जुबानी जंग से महीनों तक बेखबर रहा। उसने फैसला तब लिया जब उसके समक्ष पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर में से एक को चुनने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं रह गया था। प्रदेश अध्यक्ष और विधायक दल के नेता के नामों की घोषणा चुनाव से तीन सप्ताह पहले हुई।
यह शायद पहला अवसर था जब किसी राज्य में विधान सभा चुनाव हो रहे हों और कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने एक भी रैली को संबोधित नहीं किया। पार्टी के सबसे प्रमुख प्रचारक राहुल गांधी ने भी हरियाणा में बस दो चुनाव सभाएं कीं। ऐसे में कांग्रेस को प्रदेश की एक तिहाई से अधिक सीटें हासिल होना स्वाभाविक तौर पर उसे हैरान करने वाला तो रहा ही होगा। ऐसा लगता है जैसे हरियाणा की जनता ने कांग्रेस को नींद से जगाकर कहा कि चलो हम तुम्हें वोट देते हैं क्योंकि हमें अपने लोकतंत्र में विपक्ष की भी जरूरत है। किसी को भी यह नजर आ सकता है कि अगर राज्य में पार्टी के नेताओं के बीच खींचा-तानी नहीं होती और कांग्रेस आलाकमान ने जरा भी सक्रियता दिखाई होती तो पार्टी का प्रदर्शन और भी बेहतर हो सकता था।
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा का यह कहना कुछ हद तक ठीक ही है कि थोड़ा और समय मिलता तो पूर्ण बहुमत मिल जाता। हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के साथ-साथ हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को भी जीत की बधाई दी। प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘‘महाराष्ट्र में हमें पिछले चुनाव में पूर्ण बहुमत नहीं मिला था और हरियाणा में सिर्फ दो सीटों का बहुमत था, इसके बावजूद दोनों मुख्यमंत्रियों ने सबको साथ लेकर दोनों राज्यों की जो सेवा की और अविरत कार्य करते रहे, ये उसी का परिणाम है कि उनपर जनता ने दोबारा अपना विश्वास जताया है।’’ फिर भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि हरियाणा में भाजपा अपनी खुद की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई। हरियाणा में 75 सीटों से ज्यादा जीतने का लक्ष्य रखने वाली भाजपा का रथ 40 सीटों पर ही ठहर गया।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा हरियाणा में अति आत्मविश्वास में डूबी हुई थी। उसे लग रहा था कि वह कमजोर और बंटे हुए विपक्ष का फायदा उठाकर आसानी से चुनाव जीत जाएगी। पार्टी के रणनीतिकारों को लगता था कि वह हरियाणा जैसे राज्य, जहां बड़ी संख्या में लोग सेना और सुरक्षाबलों में हैं, अनुच्छेद 370 और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर एकतरफा लड़ाई जीत जाएगी लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही थी। जाहिर तौर पर भाजपा की सुनिश्चित लग रही जीत की राह को विपक्षी दलों से अधिक आम मतदाताओं ने बाधित किया है जिनकी नाराजगी आर्थिक मंदी, बढ़ती बेरोजगारी के साथ-साथ कुछ स्थानीय मुद्दों को लेकर भी थी। नतीजतन भाजपा अपने बूते बहुमत हासिल नहीं कर पाई। राजनीतिक तौर पर भाजपा को अगर किसी से वास्तविक चुनौती मिली तो निश्चित तौर पर वह थे प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, जिन्होंने अपनी तरफ से पूरा जोर लगाया और लोकसभा चुनावों के दौरान, कांग्रेस से दूर चले गए जाट मतदाताओं को वापस अपनी तरफ लेकर आए।
कुमारी शैलजा के प्रदेश अध्यक्ष बनने से दलित मत भी कांग्रेस की ओर आकर्षित हुए, जिसके परिणामस्वरूप मनोहर लाल खट्टर मंत्रिमंडल के कई प्रमुख मंत्रियों को हार का मुंह देखना पड़ा। इसके अलावा, इंडियन नेशनल लोकदल से निकाले जाने के बाद जननायक जनता पार्टी बनाकर सियासी अखाड़े में उतरे चौटाला परिवार के दुष्यंत चौटाला की नई नवेली पार्टी ने जो कामयाबी हासिल की, भाजपा को उसका नुकसान भी उठाना पड़ा। इस चुनाव परिणाम के साथ ही दुष्यंत ने दादा और चाचा के फैसले को गलत ठहराते हुए यह साबित कर दिया कि चौटाला परिवार की राजनीतिक विरासत के वही असली वारिस हैं।

‘‘महाराष्ट्र में हमें पिछले चुनाव
में पूर्ण बहुमत नहीं मिला था और
हरियाणा में सिर्फ दो सीटों का बहुमत था, इसके
बावजूद दोनों मुख्यमंत्रियों ने सबको साथ लेकर
दोनों राज्यों की जो सेवा की और अविरल कार्य
करते रहे, ये उसी का परिणाम है कि उनपर
जनता ने दोबारा अपना विश्वास जताया है।’’
-नरेन्द्र मोदी, प्रधानमंत्री

दुष्यंत चौटाला ने प्रदेश की सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। दुष्यंत ने ओमप्रकाश चौटाला और अभय चौटाला से बगावत कर चुनावी जंग में अपनी अलग सेना उतारी लेकिन पूरे प्रचार अभियान के दौरान उनका नाम तक नहीं लिया और अपने परदादा चौधरी देवीलाल के नाम के सहारे चुनावी सफर सफलतापूर्वक पूरा किया और खुद को चुनाव बाद किंग मेकर की भूमिका ें स्थापित किया। जाहिर तौर पर आने वाले समय में वे प्रदेश में जाटों के सबसे बड़े वर्तमान नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा के लिए बहुत बड़ी चुनौती साबित होने जा रहे हैं। ऐसी चर्चा थी कि कांग्रेस भाजपा को सत्ता में वापस आने से रोकने के लिए कर्नाटक फॉर्मूले को हरियाणा में भी आजमाते हुए दुष्यंत चौटाला को मुख्यमंत्री पद दे सकती है लेकिन भूपेंद्र सिंह हुड्डा के लिए किसी और जाट नेता को मुख्यमंत्री के तौर पर स्वीकार करना बहुत कठिन है। दुष्यंत की पार्टी के इस प्रदर्शन से हरियाणा की राजनीति का चौधरी होने का दंभ भरते रहे ओमप्रकाश चौटाला, अभय सिंह चौटाला के साथ ही इनेलो भी संकट में आ गई है।

‘‘हम जनादेश को सम्मान के
साथ स्वीकार करते हैं और कहना
चाहते हैं कि इन चुनावों में भाजपा की नैतिक
हार हुई है।’’
-आनंद शर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री

पहले ही पार्टी के कई नेताओं ने भाजपा का रुख कर लिया था तो वहीं कइयों ने दुष्यंत का दामन थाम लिया था। इस बार इनेलो अकाली दल के साथ चुनाव में उतरा था लेकिन कभी प्रदेश का शासन चलाने वाले इनेलो को केवल एक सीट से संतोष करना पड़ा। हरियाणा के इन चुनावों की एक और खास बात यह रही कि ‘‘सेलिब्रिटी पॉलीटिक्स’’ नहीं चल पाई। भाजपा ने जिन अंतरराष्ट्रीय पहलवानों- बबीता फोगाट और योगेश्वर दत्त को चुनाव मैंदान में उतारा था, उन्हें हार का सामना करना पड़ा। टिक टॉक स्टार सोनाली फोगाट भी पराजित हो गईं। हालांकि, भाजपा उम्मीदवार एवं भारतीय हॉकी टीम के पूर्व कप्तान संदीप सिंह जीत हासिल करने में सफल रहे। चरखी दादरी की दादरी सीट से चुनाव मैदान में उतरीं बबीता फोगाट चुनावी कुश्ती में दूसरे नंबर पर भी नहीं आ पाईं। निर्दलीय उम्मीदवार सोमबीर ने इस सीट पर जननायक जनता पार्टी (जजपा) के सतपाल सांगवान को हराया।
बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी राजद के मुखिया लालू यादव के परिवार को हरियाणा से अच्छी खबर मिली है। लालू यादव के दामाद चिरंजीवी राव को चुनाव में जीत हासिल हुई है। चिरंजीवी हरियाणा के रेवाडी से कांग्रेस की टिकट पर चुनाव मैंदान में उतरे थे। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने भी हरियाणा चुनाव में उम्मीदवार उतारे थे लेकिन किसी को भी सफलता नहीं मिल पाई। चुनाव परिणामों पर कांग्रेस की तरफ से बोलते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा ने कहा कि ‘‘हम जनादेश को सम्मान के साथ स्वीकार करते हैं और कहना चाहते हैं कि इन चुनावों में भाजपा की नैतिक हार हुई है।’’ वैसे खैरियत यह रही कि इस बार हमेशा की तरह किसी ने हार का ठीकरा ईवीएम पर नहीं फोड़ा। वैसे पांच साल तक शासन चलाने के बाद भी सबसे बड़े दल के तौर पर उभरना भाजपा और मनोहर लाल खट्टर की उपलब्धि ही कही जाएगी।


 
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