युगवार्ता

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वहां कौन है तेरा!

24/05/2020

वहां कौन है तेरा!

ऐसे गुमनाम लोग आजीवन महानगर और अपनी मूल भूमि देहात दोनों जगह तो बाहरी बन कर ही रह गए। कोरोना ने संवेदनाओं की सारी सीमाएं दिखा दी है। ऐसे में, कोरोना ने पुनर्विचार का मौका दिया है कि आगे से कैसे इस तरह की आपदा के दुष्प्रभाव को कम किया जाए!

अमित लोकप्रिय

एलियन का आक्रमण फिल्मों में विफल कर अपनी क्षमता बघारने वाला अमेरिका मूढ़ बन कर कोविड-19 बीमारी के कारण अभी मौतों की गिनती गिन रहा है। अमेरिका के सुपर मानवों का सामर्थ्य कटघरे में है। विकास के पूंजीवादी मॉडल ने कोरोना काल में अपनी लज्जा खो दी है। भूमंडलीकरण केवल रोजगार, पैसा ही नहीं देता प्रदूषण और बीमारी भी देता है, कोरोना ने इसे उजागर कर दिया है कि पीढ़ियां याद रखेंगी। मजदूरों की पीड़ा, परेशानी ने भारत की उस विकास नीति को नंगा कर दिया है जो विकसित को और विकसित बनाती आयी है। इसका जन्म अंग्रेजी हुकूमत के दौरान हुआ था जिस पर ग्लोबल रंग से अब पालिश हो चुका है। आजादी के पहले से ही जो क्षेत्रीय असंतुलन एक प्रभावी मुद्दा रहा उसे आज तक दूर नहीं किया जा सका। भले ही बड़े प्रांतों को काट-काट कर छोटा कर दिया गया।

इस क्षेत्रीय असंतुलन के गर्भ से जन्मे हैं प्रवासी मजदूर। कोरोना काल में कामबंदी, धनाभाव, डर, भूख, अस्वास्थ्यकर आवास में घुटन से हो रहे मजदूरों के पलायन में दिख रही व्यथा भारत विभाजन जनित पलायन की याद दिला रही हैं। रेलवे लाइन, नहरी रास्ता, जंगल की पगडंडी, सीमेंट के खाली टैंकर में बैठकर सड़क के रास्ते सभी से होते हुए मजदूर दिल्ली, मुंबई से पैदल दूसरे प्रांतों में स्थित अपने गांव आ रहे हैं। कई साइकिल, रिक्शा से भी आ रहे हैं। किसी-किसी ने तो अपने बच्चे, असमर्थ पत्नी तक को मोटरी के साथ टांग रखा है, बैलगाड़ी के बैल तक बन जा रहे हैं। वायरस का छूतका, धूप, भूख, पुलिस की लाठी और रास्ता में वाहनों से कुचलने वाली मौत पीछा कर रही है। कई ने रास्ते में दम तोड़ दिया। अनजान लाश को विधिवत संस्कार के साथ विदाई में छूत के डर से कोई आगे नहीं आता। ऐसे गुमनाम लोग आजीवन महानगर और अपनी मूल भूमि देहात दोनों जगह तो बाहरी बन कर ही रह गए। कोरोना ने संवेदनाओं की सारी सीमाएं दिखा दी है। ऐसे में, कोरोना ने पुनर्विचार का मौका दिया है कि आगे से कैसे इस तरह की आपदा के दुष्प्रभाव को कम किया जाए! महानगरों को अब अपनी जरूरतें घटानी चाहिए वर्ना न आदमी बचेगा और न नगर। यदि आजादी के बाद से ही कमिश्नरी स्तर के शहरों को विकास का हब बनाया जाता तो कोरोना कम से कम भारत में तांडव नहीं दिखा पाता। भूटान के विकास माडल से तो पूरी दुनिया को कुछ सीखना चाहिए। बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं भले ही वहां न हों लेकिन खुशहाली तो है।

यह कटु सत्य है कि उद्यमशीलता का बिहार, झारखंड, ओडिशा जैसे प्रांतों में घोर अभाव है लेकिन क्या सरकार ही महज इसके लिए जिम्मेवार है, पढ़े-लिखे प्रवासी नागरिकों का कोई दायित्व नहीं बनता!! प्रधानमंत्री मोदी ने आर्थिक पैकेज की घोषणा में उद्यमशीलता को रेखांकित किया है। कोरोना से जन्मे आर्थिक मंदी ने आज वैसे अभिभावकों की पेशानी पर बल पड़ा दिया है जो बताते नहीं थकते थे कि कैलफोर्निया में बेटा को 5 लाख मंथली सैलरी मिलती है। अब अलना-फलना इंस्टिट्यूट से डिग्री लेकर सीना फुलाये होनहारों को देश वापसी पर 5-10 हजार मिलेगा। उन्हें वहां डालर में इतना ही मिलता था लेकिन अभिभावक भौकाल के लिए इसे भारतीय मुद्रा रुपये में बताते थे। ऐसे दिखावे ही समाज की प्रगति को कुंद कर देते हैं। मुंबई, गुरुग्राम, बेंगलुरु, दिल्ली में काम कर रहे वैसे प्रवासियों में से कईयों को घर आना पड़ेगा जो बौद्धिक मजदूर के तमगे छाती पर ठोके फिरते रहे हैं। अब उन्हें बिहार, झारखंड में 5000 पर बौद्धिक कुशलता दिखानी पड़ेगी। कुशल होने का ऐसा पाखंड किस काम की जो उन्हें बेरोजगार कर देता हो!

बिहार, उत्तर प्रदेश की बड़ी आबादी को देखते हुए यहां बाजार की कोई कमी नहीं है। दरअसल जितनी गलती शासन-प्रशासन की है उससे कहीं कम जनता की नहीं है। गांव-देहात की सामाजिक संरचना ऐसी है कि वहीं रहकर काम करने में भारतीयों को लाज लगता है। मुंबई, दुबई में चौकीदारी करने, चाय बेचने में लाज नहीं। कमाते और बचाते इतना कि घर आने के लिए पैसा नहीं बचता। बचता है सम्बोधन में केवल तेरे को..मेरे को। वक्त आ गया है कि हर चार-पांच जिलों का कलस्टर बना कर औद्योगिक गतिविधियां चलायी जाएं। क्षेत्र में एक सुपर स्पेशलयिटी अस्पताल, हर जिला में एक यूनिवर्सिटी खोला जाए। जरूरी सबक है कि दुकानों में बिकने वाली वस्तुओं में कम से कम आधी स्थानीय रखी जाएं।  गांधीवादी आर्थिक माडल ‘आत्म निर्भरता’ से सचमुच कुछ ग्रहण करने की जरुरत है। प्रधानमंत्री मोदी के लघु उद्योगों पर बल देते हुए ‘लोकल को वोकल’ बनाने का आह्वान में यह स्वीकारोक्ति ध्वनित हो रही है। सरकारें ईमानदारी से विकास का वैकल्पिक माडल की खोज करते हुए उस पर कार्य करेंगी तब ही जाकर प्रवास जनित आपदाएं, अपराधें रुक पायेंगी। भुगतान संतुलन ठीक होगा । जब तक यह नहीं होगा तब तक लोग महानगर जायेंगे और मजदूर है कि अपनी दमित इच्छा की पूर्ति के लिए महंगा मोबाइल रखता है, बैंक खाता में पैसा सुरक्षित नहीं रखता। आपदा में भूख से छटपटाता है। आर्थिक पैकेज में मुफ्त राशन तात्कालिक राहत है। सरकार को चाहिए कि आगे से हर बैंक खाता में आज की स्थिति में न्यूनतम 5000 रुपये ऐसी विपद परिस्थिति के लिए फ्रीज कर के रखे।



 
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