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सरकारी स्कूलों का राजनीतिकरण

17/02/2020

सरकारी स्कूलों का राजनीतिकरण


सरकारी स्कूल राजनीति के अड्डे बन गए हैं। वहां पढ़ाई नहीं वोट मांगे जा रहे हैं। पैरेंट्स टीचर्स मीटिंग (पीटीएम) उसका जरिया बनी है। चार जनवरी को दिल्ली के सभी सरकारी स्कूलों में पीटीएम का आयोजन किया गया था। इसमें कोई दो राय नहीं है कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों में नियमित पीटीएम केजरीवाल सरकार ने ही शुरू की। यह अच्छा प्रयास है। लोगों ने इसे सराहा भी। लेकिन यदि उसी पीटीएम को सरकार राजनीति करने के लिए इस्तेमाल करे तो क्या कहा जाए? हुआ ऐसा ही है। कम से कम वर्तमान सरकार के कार्यकाल के अंतिम पीटीएम में तो यही हुआ है। इस पीटीएम में शिक्षक बच्चों के गुरू जैसे नहीं दिखे। ऐसा कई बच्चों के पैरेंट्स ने महसूस किया। क्योंकि मीटिंग में बच्चों और उसकी पढ़ाई पर कम राजनीति पर ज्यादा बातें हुई। बातें होना भी नहीं कह सकते।

सवाल-जवाब कहना ज्यादा सही होगा। सवाल शिक्षकों के थे। जवाब पैरेंट्स को देना था। अब सवाल पर ध्यान देते हैं। पूर्वी दिल्ली के वसुंधरा इन्कलेव स्थित सरकारी स्कूल में आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले एक छात्र के पैरेंटस से पूछे गए सवाल-आपको दिल्ली सरकार का कामकाज कैसा लगता है? क्या आप दिल्ली सरकार के काम से खुश हैं? इस तरह के राजनीतिक सवाल कई थे। अंत का सवाल और ज्यादा चौंकाने वाला था। वह था, इस बार चुनाव में आप किसे वोट देंगे? दरअसल, इस तरह के राजनीतिक सवाल बातचीत के बीच-बीच में पूछे जा रहे थे। जिस कारण कई पैरेंट्स को इसके पीछे की मंशा समझ में नहीं आई। यह सिर्फ एक सरकारी स्कूल की बात नहीं है। जानकारी मिलने के बाद सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले कई बच्चों के पैरेंटस से संपर्क किया। कइयों ने इस तरह के सवाल पीटीएम में पूछे जाने की बात मानी। उत्तर पूर्वी दिल्ली के नाथुपुरा स्थित सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले कई बच्चों के पैरेंट्स से बात की। नौवीं कक्षा में पढ़ने वाले एक छात्र के पैरेंट्स ने बताया कि उनके बच्चों के बारे में कुछ नहीं बताया गया। सिर्फ दिल्ली सरकार और स्कूल में किए गए बदलाव के बारे में मुझे बताया गया। यहां के एक अन्य पैरेंट्स ने भी बताया कि उनसे पूछा गया कि आप विधानसभा चुनाव में किसे वोट करने वाले हैं।
इसके बाद पांडवनगर के सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले एक छात्र के पैरेंट्स से बात की। सातवीं कक्षा के एक छात्र के पिता बताते हैं कि इस बार बच्चों की पढ़ाई पर बात नहीं हुई। उन्हें पूरा स्कूल घूमाया गया। स्कूल में किए गए कामों को बताया। फिर शिक्षक ने कहा कि इस सरकार ने स्कूल में निजी स्कूलों जैसी सभी आधुनिक सुविधाएं मुहैया कराई है। इसे हर कोई जानता है कि पीटीएम में बच्चों की कमजोरी और उसकी उपलब्धी के बारे में शिक्षक बताते हैं। सरकारी स्कूलों के इन्हीं पैरेंट्स ने यह भी स्वीकार किया कि इसके पहले की पीटीएम में ऐसे सवाल नहीं किए गए थे। शिक्षक बच्चों के बारे में ही बताते थे। मगर इस बार ऐसा नहीं था। इन पैरेंटस की बातों से स्पष्ट होता है कि 6 जनवरी को आचार संहिता लागू होने से पहले दिल्ली सरकार ने बड़ी चालाकी से सरकारी स्कूलों का राजनीतिक इस्तेमाल कर लिया। क्योंकि सरकार के निर्देश के बिना शिक्षक इस तरह के सवाल नहीं पूछे होंगे। हालांकि आप के नेता इसे गलत बता रहे हैं। राज्यसभा सांसद संजय सिंह कहते हैं, ‘यह गलत है। सरकार ने ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया था। हमने सरकारी स्कूल को निजी स्कूलों के समान बनाया है।’ जबकि भाजपा के लोकसभा सांसद एवं प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी कहते हैं कि केजरीवाल जी ने अपनी हार को देख लिया है। इसलिए स्कूलों को भी राजनीति के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।


 
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