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यूपी के विकास को गति देगा मंत्रियों का प्रशिक्षण

11/09/2019

सियाराम पांडेय 'शांत'

प्रशिक्षण के बिना व्यक्ति अपने काम में दक्ष नहीं हो पाता। काम तभी अच्छे ढंग से निष्पादित होते हैं जब काम की बारीकियां ज्ञात हों। बारीकियों का ज्ञान हासिल करने के लिए अनुभवी लोगों का सान्निध्य, मार्गदर्शन और प्रशिक्षण जरूरी होता है। काम कोई भी कर सकता है लेकिन विशेषज्ञता भी तो कोई चीज होती है। उसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। दक्षता, क्षमता, कौशल के बिना किए गए काम पूरे तो हो जाते हैं लेकिन जैसे-तैसे। बिना किसी योजना के होते हैं। उसमें न तो समयबद्धता होती है और न ही तारतम्यता। अनुशासन और संयम का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। काम करने के लिए काम करना और काम को व्यवस्थित, सुनियोजित व वैज्ञानिक ढंग से करना परस्पर अलग-अलग बातें हैं। जब तक इस पर ध्यान नहीं दिया जाएगा तब तक कार्य संस्कृति पैदा कर पाना मुमकिन नहीं है।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दूरंदेशी सोच के नेता हैं। वे कुछ अलहदा करने में यकीन रखते हैं। वे अपने काम से चौंकाते भी हैं और सबसे पहले कोई काम करने का रिकार्ड भी बनाते रहे हैं। उन्हें लगा कि जब अधिकारियों और कर्मचारियों का प्रशिक्षण हो सकता है तो मंत्रियों का क्यों नहीं ? जो मंत्री अधिकारियों और कर्मचारियों का मार्गदर्शन करते हैं, उनके काम पर नजर रखते हैं, उन्हें कम से कम प्रशिक्षित तो होना ही चाहिए। अभी तक नेता लर्निंग बाई डूइंग यानी करके सीखो के सिद्धांत पर काम करते रहे हैं। लेकिन राजनीति में अपनी नई छाप छोड़ने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने मंत्रियों के भी प्रशिक्षण की जो योजना बनाई है। मुख्यमंत्री की यह अच्छी सोच है। मंत्रियों के प्रशिक्षण की भावभूमि के साथ गत दिनों उन्होंने अपने मंत्रियों के साथ भारतीय प्रबंधन संस्थान की कक्षा में भाग लिया। खुद भी प्रबंधन के गुर सीखे और अपने मंत्रियों को भी इस दिशा में आगे बढ़ने को प्रेरित किया। 8 सितंबर को आईआईएम में मंत्रियों के प्रशिक्षण का प्रथम चक्र पूरा हो गया। दूसरा और तीसरा चक्र क्रमश: 15 और 22 सितंबर को पूरा होना है। इसे लेकर लोगों में कुछ सवाल भी है कि योगी आदित्यनाथ और उनके मंत्रियों को प्रशिक्षण की जरूरत क्यों पड़ गई? नेता तो वैसे ही मैनेजमेंट गुरु होता है। उसे तो हर तरह की उस्तादी में महारत हासिल होती है। इसके बाद भी प्रशिक्षण क्यों? यह सवाल अधिकांश लोगों के दिमाग में है।
राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव तो भारतीय प्रबंध संस्थान के छात्रों ही नहीं, पाकिस्तान तक अपने प्रबंधन कौशल का झंडा गाड़ चुके हैं। वे तो पाकिस्तान में नमक, प्याज और सत्तू तक की मार्केटिंग कर चुके हैं। लालू यादव ने दुनियाभर के प्रबंधन संस्थानों को यह बताने की कोशिश की थी कि उनके कार्यकाल में रेलवे विभाग फायदे में कैसे आ गया? लालू प्रसाद यादव को उन दिनों मैनेजमेंट गुरु कहने वालों की संख्या बढ़ गई थी। लेकिन आज स्थिति उसके ठीक उलट है। इस समय योगी आदित्यनाथ और उनकी पूरी कैबिनेट भारतीय प्रबंध संस्थान का शिष्य बनी हुई है। उत्तर प्रदेश के मंत्री लखनऊ में आईआईएम के हाईटेक गुरुओं से सुशासन और प्रबंधन के गुर सीख रहे हैं। आईआईएम को प्रबंधन का गुरुकुल बताया जा रहा है। प्राचीन गुरुकुलों में नि:शुल्क शिक्षा दी जाती थी। इस गुरुकुल में भारी-भरकम फीस ली जा रही है। 
यह सच है कि योगी और उनके मंत्री आईआईएम में वैश्विक, राष्ट्रीय और राज्य के आर्थिक परिदृश्य के बारे में जानकारियां हासिल कर रहे हैं। यहां उन्हें तीन प्रशिक्षण सत्र में यह बताया जाना है कि एक भविष्य द्रष्टा के रूप में वे कैसे सफल रणनीति बना सकते हैं? कैसे उसे हकीकत का अमली जामा पहना सकते हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पता है कि भारतीय प्रबंध संस्थान के प्रशिक्षक मंत्रियों के दिमाग पर व्यापक असर नहीं डाल सकते। शायद इसीलिए उन्होंने खुद भी आईआईएम में आयोजित लीडरशिप डेवलपमेंट मंथन-1 को सम्बोधित  किया और अपने मंत्रियों को नसीहत दी कि जीवन सीखने के लिए होता है। सीखने का अवसर कभी हाथ से जाने नहीं देना चाहिए। उसका लाभ अवश्य लेना चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह प्रशिक्षण प्रदेश के सर्वांगीण विकास में न केवल सहायक होगा बल्कि उत्तर प्रदेश को श्रेष्ठ राज्य बनाने की दिशा में चल रहे सरकार के सकारात्मक प्रयासों में मदद करेगा।  
उनका मानना है कि उनकी सरकार सुशासन, प्रबंधन, नेतृत्व कौशल व जनभागीदारी को बखूबी जानने के लिए भारतीय प्रबंध संस्थान से सहयोग प्राप्त कर रही है। मुख्यमंत्री के संबोधन की एक वजह यह भी रही होगी कि नेताओं और मंत्रियों पर विचारों का दूसरा रंग मुश्किल से चढ़ता है। इसके बहुत सारे मनोवैज्ञानिक कारण हो सकते हैं। प्रभुता का प्रभाव भी हो सकता है लेकिन मुख्यमंत्री ने अपने साथियों का मार्गदर्शन कर अपनी नेतृत्व क्षमता का भी परिचय दिया है। इसमें संदेह नहीं कि पहली बार किसी राज्य सरकार ने देश में अपने राजनीतिक नेतृत्व की दक्षता के बारे में सोचा है। प्रशिक्षण ले रहे मंत्रियों का भी मानना है कि यह एक अनूठा प्रयोग है। मंत्रियों की मानें तो व्यावहारिक और राजनीतिक जीवन में वे अपने इस प्रशिक्षणगत अनुभव को साझा करेंगे। साथ ही अपने दैनिक कामकाज में इस प्रशिक्षण का प्रयोग करेंगे। यदि ऐसा होता है तो इससे अच्छी और कोई बात नहीं है। प्रशिक्षण कोई भी हो वह व्यक्ति में चार अनुशासन पर बल देता है।वे हैं, जिम्मेदारी, बहादुरी, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा। यह सरकार रोज ही कुछ नया कर रही है। उत्तर प्रदेश में विकास और लोगों का जीवन सहज और सुविधाजनक बनाने की निरंतर कोशिश हो रही है। लेकिन इतने सारे प्रयासों के बाद भी जनता की दिक्कतों में बहुत कमी नहीं आई है। इस दिशा में भी विचार होना चाहिए।
राजतंत्र में राजा अपने मंत्रियों की नियुक्ति सघन छानबीन और परख के बाद करता था। मंत्रियों के चयन में भी उसी परंपरा का निर्वाह किया जाना चाहिए। मंत्री अपने विभाग का मार्गदर्शन करते हैं। अस्तु, उन्हें योग्य भी होना चाहिए और अपने काम में दक्ष भी होना चाहिए। जो काम योगी सरकार ने ढाई साल बाद किया है। उसे बहुत पहले करना चाहिए था, क्योंकि जिस समय 2017 में योगी सरकार बनी थी तब बहुत सारे मंत्री ऐसे थे जिन्हें मंत्री होने का पहली बार मौका मिला था। खैर, जब जागे तभी सबेरा।' उम्मीद की जानी चाहिए कि इस त्रिसत्रीय प्रशिक्ष्ण के बाद मंत्रियों की प्रबंधन क्षमता में सुधार होगा और वे लोकहित में अपनी ऊर्जा का सम्यक उपयोग कर सकेंगे। यह भी मुमकिन है कि उत्तरप्रदेश की देखादेखी अन्य राज्यों में भी मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों के प्रशिक्षण का चलन विकसित हो। इस सिलसिले को बनाए रखने की जरूरत है। 
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)


 
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