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मां दंतेश्वरी की डोली पहुंची जगदलपुर, रास्ते भर श्रद्धालुओं ने की फूलों की वर्षा

07/10/2019

मावली परघाव में माई जी की डोली का हुआ भव्य स्वागत

सुधीर जैन
जगदलपुर, 07 अक्टूबर (ह‍ि.स.)। बस्तर के ऐतिहासिक दशहरा में शामिल होने के लिए माई दंतेश्वरी की डोली सोमवार की सुबह जगदलपुर पहुंची, जिसे जिया डेरा में दर्शनार्थियों के लिए रखा गया। पूजा-अर्चना कर विधि-विधान के साथ पारंपरिक सलामी के बाद डोली और छत्र को दंतेवाड़ा से रवाना किया गया, जो देर शाम जगदलपुर पहुंची। जगदलपुर में शुभ मुहूर्त पर मावली परघाव पूजा विधान संपन्न किया गया और माई की दंतेवाड़ा से आयी डोली का भव्य स्वागत किया गया।

पैलेस रोड स्थित विशाल मंच पर मावली परघाव की रस्म संपन्न हुई। दंतेवाड़ा से पहुंची माता के स्वागत के लिए हजारों लोग कई घंटे इंतजार करते रहे। गीदम रोड स्थित जिया डेरा से माता की डोली का जो सफर शुरू हुआ तो रास्ते भर श्रद्धालु फूलों की बारिश करते रहे। राजमहल तक तीन मील लंबे रास्ते में दर्शनार्थियों का हुजूम उमड़ पड़ा था । माता की आगवानी पर चौक-चौराहों पर  जमकर आतिशबाजी हुई। आधा किमी के रास्ते को कारपेट बिछाकर फूलों की पंखुडियों से पाट दिया गया था । मार्ग के दोनों ओर जहां तक नजर जाती थी, श्रद्धालुओं की भीड़ नजर आई। शहर के पुराने बाशिंदों ने बताया कि अरसे बाद ऐसी भीड़ देखी गयी ।

दंतेवाड़ा से आई माता मावली की डोली शाम जिया डेरा से निकली। माता की आगवानी के लिए सैकड़ों आंगा देव समेत देवी-देवताओं के छत्र व लाट लिए लोग खड़े रहे। दंतेश्वरी मंदिर तक पहुंचने वाली इस यात्रा के पहले सशस्त्र बलों के जवानों ने हथियार के साथ सलामी दी। माता के जयकार की बीच सैकड़ों लोग एक साथ राजमहल की ओर बढ़े। रास्ते में जगह-जगह माता की डोली का स्वागत किया गया । मंथर गति से चलती माता की डोली का दर्शन करने को सड़क के दोनों किनारों के अलावा दुकानों, मकानों की छत पर भी दर्शनार्थी खड़े रहे। दो घंटे के सफर के बाद डोली कुटरूबाड़ा पहुंची। यहां पहले से दंतेश्वरी मंदिर से माता दंतेश्वरी की डोली को लाया जा चुका था। मान्यता है कि दोनों बहनें यहां मिलती हैं । दोनों देवियों के मिलाप होते ही श्रद्धालुओं का जयकारा गूंजने लगा। इस दौरान राज परिवार, जनप्रतिनिधि समेत हजारों लोग जुटे रहे। 

परंपरागत पहनावे व मुंडाबाजा की धुन के साथ माई जी की डोली व छत्र राजमहल परिसर पहुंचा। यहां मुख्य द्वार पर फिर लोगों ने फूलों की वर्षा कर मावली माता का स्वागत किया। यहां छत्र को चंदन का लेप लगाकर व नए वस्त्र ओढ़ाकर फूलों से ढक दिया गया। शहर में जगह-जगह श्रद्धालुओं ने उनका स्वागत किया। कहीं रंगोली सजाकर, तो कहीं उनकी आरती उतारकर उनका स्वागत किया गया। इस दौरान दशहरा समिति के पदाधिकारियों सहित जनप्रतिनिधि, राजस्व व पुलिस अधिकारी मौजूद रहे। 

राजा अन्नमदेव के समय से चल रही है यह परंपरा 
दंतेवाड़ा और बस्तर की सांस्कृतिक तथा पारंपरिक डोर दशहरा पर्व से बंधी हुई है। कहते हैं माई दंतेश्वरी के बगैर बस्तर दशहरा अधूरा है। यह सदियों पुरानी परंपरा है कि माईजी डोली और छत्र के माध्यम से बस्तर दशहरा में शामिल होती हैं और उसके बाद वापस शक्तिपीठ दंतेवाड़ा में जाकर विराजमान हो जाती हैं। काकतीय राजवंश के राजा अन्नमदेव ने अपने समय में यह परंपरा प्रारंभ की थी, जो आधुनिक संदर्भो के बीच भी निर्बाध रूप से जारी है। 

मंगलवार को चलेगा आठ पहियों वाला दोमंजिला रैनी रथ
मालवी परघाव पूजा विधान के संपन्न होने के साथ ही मंगलवार को भीतर रैनी पूजा विधान से संपन्न होगा। माई दंतेश्वरी के मंदिर में परंपरा अनुसार पूजा विधान संपन्न होने के बाद संध्या 5 बजे आठ पहियों वाली दोमंजिला रथ जिसे रैनी रथ कहा जाता है, की परिक्रमा माई दंतेश्वरी के छत्र आरूढ़ कर की जाएगी। रैनी रथ का संचालन किलेपाल परगना के गोंड आदिवासियों के द्वारा संपन्न किया जाता है, जिसके लिए पूरी तैयारी कर ली गई है। भीतर रैनी पूजा विधान तथा रैनी रथ परिक्रमा के पश्चात रात्रि में आठ पहियों वाले दोमंजिला रैनी रथ को चुराकर कुम्हड़ा कोट ले जाने की परंपरा का निर्वहन भी किया जाएगा।

ह‍िन्‍दुस्‍थान समाचार


 
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