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हम अमेरिकी अखाद्य क्यों खरीदें?

04/03/2020

हम अमेरिकी अखाद्य क्यों खरीदें?

बनवारी

मेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भारत की यात्रा से पहले एक बार फिर दोनों देशों के बीच व्यापार समझौतों की बातचीत टाल दी गई थी। यह आशा की जा रही थी कि भारत और अमेरिका के बीच कोई व्यापक व्यापार समझौता अभी भले संभव न हो, दोनों देश एक संक्षिप्त समझौते पर राजी हो सकते हैं। इससे उनके बीच व्यापक व्यापार समझौते का रास्ता प्रशस्त हो जाएगा। लेकिन इस व्यापारिक समझौते में अनेक कठिनाइयां आ रही थीं, इसलिए उसे टाल देना ही ठीक समझा गया। अमेरिका ने भारत को खबर दी है कि अब इस वर्ष नवंबर में अमेरिकी चुनावों के बाद ही भारत अमेरिकी व्यापार वार्ता आरंभ हो पाएगी। इस नाते अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि ने भारत की यात्रा पर आने का अपना निर्णय रद्द कर दिया है। यह समझौता हयूस्टन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा से पहले घोषित करने की भी कोशिश की गई थी। उसके बाद संयुक्त राष्ट्र की आम सभा के बाद यह समझौता प्रस्तावित था, पर हर बार उसे टालना पड़ा।

अमेरिका के अनुसार भारत के साथ उसका व्यापार असंतुलित है। इसके लिए वह अपने कृषि और डेरी उत्पाद भारत में बेचना चाहता है। लेकिन अमेरिका में जिस तरह इस डेरी उत्पादों का उत्पादन होता है, वह भारतीय संस्कृति में सुगम नहीं है।

भारत की अमेरिका से व्यापार समझौते में दिलचस्पी उसकी दोहरे उपयोग वाली उन्नत प्रौद्योगिकी के कारण है। भारत अपने आपको आधुनिक हथियारों के उत्पादन का एक बड़ा केंद्र बनाना चाहता है। इसके लिए कुछ क्षेत्रों में अमेरिका से सहयोग की आवश्यकता है। सामरिक क्षेत्र में इस समय अमेरिका अन्य सभी देशों से काफी आगे है। कुछ क्षेत्रों में रूस ने अच्छी प्रगति की है। अब आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के क्षेत्र में चीन भी तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन अमेरिकी अब भी सभी क्षेत्रों में संसार की अग्रणी शक्ति हैं। भारत और अमेरिका के बीच उन्नत प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में परस्पर सहयोग का निर्णय हो जाता है तो भारत के लिए अनेक क्षेत्रों में आगे बढ़ना आसान हो जाएगा। भारत अपने बूते पर आगे बढ़ने की कोशिश करता रहा है। उदाहरण के लिए जब कुछ वर्ष पहले अमेरिका के दबाव के कारण हमें रूस से क्रायोजनिक इंजन नहीं मिल पाया था, तो हमारे वैज्ञानिक प्रतिष्ठान ने घोषित किया था कि हम अपने दम पर क्रायोजनिक इंजन विकसित कर लेंगे। वह हमने घोषित समयसी मा से पहले ही कर लिया।

फिर भी उसमें समय लगा और उसके लिए हमें कई दूसरे कार्यक्रमों की उपेक्षा करनी पड़ी। राष्ट्रपति बुश के समय अमेरिकी नीति में परिवर्तन हुआ था। राष्ट्रपति बुश ने भारत को नाभिकीय आपूर्ति संगठन का सदस्य बनवाने की कोशिश की। पर चीन के निरंतर विरोध के कारण वह अभी तक संभव नहीं हो पाया। अमेरिका अब भारत को विश्व शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक समझता है। पिछले पचास वर्ष से वह चीन की आर्थिक प्रगति में सहयोग कर रहा था। पर अब वह उसे अपने प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखने लगा है। अमेरिका चाहता है कि भारत तेजी से आर्थिक और प्रौद्योगिकीय प्रगति करे, वह विश्व को बहुकेंद्रीय बनाते हुए चीन की बढ़ती हुई चुनौती को संतुलित करने में सहायक हो सके। लेकिन अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान उन्नत प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण के मामले में काफी फूंक-फूंक कर कदम उठाता है। इसके अलावा दोनों देशों के बीच व्यापार का परिमाण बहुत अधिक नहीं है।

दोनों देशों के बीच होने वाले व्यापार का संतुलन भी भारत के ही पक्ष में है। भारत अमेरिका को बेचता अधिक है, उससे खरीदता कम है। अमेरिका का कहना है कि दोनों देशों के बीच व्यापार असंतुलित है और यह व्यापार घाटा 23 अरब डॉलर का है। इस व्यापार असंतुलन को ठीक करने के लिए भारत ने पिछले दिनों अमेरिका से अधिक हथियार खरीदना शुरू किया है। वैसे भी भारत इस कोशिश में लगा है कि हथियारों की खरीद के लिए वह केवल रूस पर निर्भर न रहे। अमेरिका से हथियारों की खरीद बढ़ाने का एक और उद्देश्य हथियार बनाने वाली अमेरिकी कंपनियों में भारत के बारे में दिलचस्पी पैदा करना है। इसलिए भारत चाहता है कि अमेरिका के साथ हमारा व्यापारिक संपर्क और संबंध बढ़े, जिसका इस्तेमाल उन्नत प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण को आसान बनाने के लिए किया जा सके। डोनाल्ड ट्रम्प के अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिकी नीतियों में काफी परिवर्तन हुआ है। राष्ट्रपति ट्रम्प की विदेश नीति अमेरिका के राजनैतिक हितों से आर्थिक हितों को अधिक महत्व देने वाली है। इसलिए अब तक अमेरिका सभी देशों पर व्यापार बढ़ाने और व्यापार घाटा कम करने का दबाव बनाता रहा है। भारत पर भी इस तरह का दबाव बन रहा है। अमेरिका का सबसे अधिक जोर अपने कृषि और डेयरी क्षेत्र के उत्पादन बेचने की ओर होता है। अब तक भारत इस अमेरिकी दबाव को अनदेखा करता रहा है, लेकिन इधर चीन के साथ अपना व्यापार युद्ध शुरू करने के बाद राष्ट्रपति ट्रम्प ने अन्य देशों पर भी अपना दबाव बढ़ा दिया है। यूरोपीय यूनियन पर वे काफी दबाव बनाए हुए है। इसी तरह भारत को भी जब तब अधिक अमेरिकी सामान खरीदने के लिए वे आगाह करते रहते हैं। भारत को वे अपने कृषि और डेयरी उत्पादन का बड़ा बाजार बनाना चाहते हैं। जबकि भारत का तर्क यह रहा है कि उनके कृषि और डेयरी उत्पाद भारत के लोगों को रास नहीं आएंगे। अमेरिकी कंपनियां अपने डेयरी उत्पाद को बढ़ाने के लिए जो तरीके इस्तेमाल करती हैं, उन्हें जानकर अधिकांश भारतीय उनके डेयरी उत्पाद खरीदने से परहेज ही बरतेंगे। भारतीय उपभोक्ता को सबसे अधिक यह बात अखरेगी कि अमेरिकी कंपनियां अपना दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए पशुओं के आहार में अनेक मांसाहारी वस्तुओं का समावेश करती हैं।

अमेरिका चाहता है कि भारत तेजी से आर्थिक और प्रौद्योगिकीय प्रगति करे, वह विश्व को बहुकेंद्रीय बनाने में सहायक हो सके। लेकिन अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान उन्नत प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण के मामले में काफी फूंक-फूंक कर कदम उठाता है।

यह हमारे लोगों के खान-पान के संस्कारों और रुचियों के खिलाफ है। इसके अलावा अमेरिकी कंपनियां जानवरों के प्रति अनेक तरह की क्रूरता बरतती है ताकि उनसे अधिक से अधिक दूध और मांस पाया जा सके। असल में इन सभी देशों में जानवरों से जीवित प्राणी की जगह मशीन की तरह व्यवहार किया जाता है। गाय मांसाहारी पशु नहीं है, उसके बाद भी उसके आहार में प्रोटीन बढ़ाने के लिए मांस मिला दिया जाता है। पिछली शताब्दी में इसी के कारण ब्रिटेन और कई अन्य यूरोपीय देशों में मैड काउ नाम की बीमारी फैल गई थी। अमेरिका की इन विकट परिस्थितियों में गायें चार-पांच वर्ष ही पर्याप्त दूध दे पाती हैं, उसके बाद उन्हें मांस के लिए कत्लगाहों में भेज दिया जाता है। भारत में यहां दुधारू पशु 20-25 वर्ष जी लेते हैं। वहां अमेरिका में चार- पांच वर्ष के दुग्ध उत्पादन के बाद उनका जीवन शेष हो जाता है। इन सब क्रूरताओं के कारण वहां ‘वेगन’ होने का एक आंदोलन ही चल पड़ा है। इसी तरह कृषि बढ़ाने के लिए धरती में अधिक उर्वरक डालने से लगाकर बीजों को प्रयोगशालाओं में इस तरह तैयार किया जा रहा है कि उनमें प्राकृतिक पोषण और स्वाद रहे चाहे न रहे, वह अधिक उत्पादन दे सके और कृषि उत्पाद अधिक समय तक चल सके।

अमेरिका में अनाज का मुख्य उपयोग पशु के खाद्यान्न के तौर पर है, वह पशुओं का मांस बढ़ाने का माध्यम है। इसलिए उसमें उन पौष्टिकों तत्वों की परवाह नहीं की जाती, जो मनुष्यों को स्वस्थ बनाए रखने के लिए आवश्यक होते हैं। यही कारण है कि अमेरिकी कृषि उत्पादों की भारतीय बाजार में जगह नहीं बन पाती। अमेरिका में कृषि निरंतर एक उद्योग होती गई है। यूरोप-अमेरिका में किसान तो कभी था ही नहीं, इसलिए लोगों के भोजन के उद्देश्य से कृषि उत्पादन नहीं किया जाता। कृषि हमेशा व्यापार के लिए व्यापारिक कंपनियों द्वारा भाड़े के मजदूरों से करवाई जाती रही। बाद में मजदूरों की जगह मशीनों ने ले ली। अमेरिका के पास भारत के बराबर कृषि योग्य भूमि है। 1900 में कृषि क्षेत्र में तीन करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ था पर सौ साल बाद 2000 में अमेरिका के कुल कृषि उत्पादन का नब्बे प्रतिशत केवल तीन लाख लोगों के श्रम से उत्पादित हो रहा था। खेती के इस तरह के मशीनीकरण के बाद कृषि उत्पादन में न गुणवत्ता बचती है, न पृथ्वी की उर्वरकता। इसलिए कृषि चक्र को बनाए रखने के लिए खेतों को बड़े पैमाने पर परती रखा जाता है। इसके लिए वहां की सरकार को बड़े पैमाने पर अनुदान देना पड़ता है। इस तरह की कृषि से पैदा हुए उत्पादों को भारतीय अपने स्वास्थ्य और सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप नहीं पा सकते। अमेरिका अपना अखाद्य भारत में खपाना चाहता है। भारत सरकार ने अब तक उसकी यह कोशिश सफल नहीं होने दी। आगे भी इस मामले में झुककर कोई व्यापारिक समझौता नहीं किया जाना चाहिए।


 
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