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खान मार्केट खास लोगों का बाजार

01/07/2019

खान मार्केट खास लोगों का बाजार


सौरव राय

प्रधानमंत्री मोदी ने चुनाव के दौरान खान मार्केट गैंग की चर्चा की थी। जिसकी कहानी वाकई दिलचस्प है। क्या है खान मार्केट गैंग? क्या है इसके पीछे की कहानी? उसी की पड़ताल करती यह रिपोर्ट

किसी शहर की रौनक उसके हाट-बाजार और चौक चौराहों में छुपी होती है। सोचिए अगर कोई बाजार अचानक राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन जाए और उसमें जाने वाले लोग उस बाजार के गैंग के रूप में जाने, जाने लगें तो क्या होगा? चर्चा आम से खास हो जाएगी और धीरे धीरे बड़ी बहस में बदल जाएगी। जी हां हम बात खान मार्केट की कर रहे हैं। जब वहां के दुकानदार दिनेश बाली से प्रधानमंत्री के बयान पर सवाल पूछा तो उनका कहना था कि प्रधानमंत्री ने जो भी कहा वो यहां के एक खास वर्ग के बारे में कहा।
उनका निशाना भी वही लोग थे जो बुद्धिजीवी और सत्ताधारी हैं न कि यहां के दुकानदार या आम ग्राहक। दिनेश बाली, अमित आहूजा आदि दुकानदारों ने माना की कुछ लोग ऐसे हैं जो अपने आप को पॉवर ब्रोकर समझते हैं। वैसे वहां के दुकानदारों का यह भी मानना था कि अगर प्रधानमन्त्री ने यह बात कही है तो इस बात की सूचना उनको किसी ने दी होगी। वैसे यह बात सही है कि एक बुद्धिजीवी वर्ग है जो एंटी मोदी है और वह आपको यहां विभिन्न मुद्दों पर किसी रेस्तरां या काफी की दुकान पर चर्चा करते हुए दिख जाएंगे।
दुकानदारों ने बताया कि वैसे यह जगह बीजेपी सांसदों की भी पहली पसंद है- जैसे स्मृति ईरानी, पीयूष गोयल, संबित पात्रा, गौतम गंभीर आदि। यह बाजार देश के बड़े राजनेताओं, नौकरशाहों, पत्रकारों, क्रिकेटर, कलाकारों एवं उद्योगपतिओं की पहली पसंद है। इस बाजार के नजदीक कई देशों के राजनयिकों, सांसदों, और उद्योगपतिओं के घर हैं। इस लिहाज से शुरू से ही उनकी भी पहली पसंद खान मार्केट ही रहा है। अगर हम इसे सीधे शब्दों में कहे तो देश के शीर्ष संस्थाओं पर बैठे दिग्गजों की पहली पसंद है यह जगह।


यहां आपको देश विदेश के सभी बड़े ब्रांड, रिटेल आउटलेट, रेस्तरां उपलब्ध हैं। शानो-शौकत से भरा यह बाजार अंग्रेजी बोलने वालों की पहली पसंद है। इस बाजार की एक अनोखी बात यह है कि हर बाजार की तरह यहां उतनी भीड़ आपको देखने को नहीं मिलेगी। इसका कारण वहां के दुकानदारों ने बताया कि जो भी लोग यहां आते हैं उनका लक्ष्य तय होता है। जिसे खरीदारी करनी है वह खरीदारी करेगा और जिसे किसी से मिलना है तो वह सीधा अपनी तय जगह पर जाकर मिलेगा।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
यह बाजार 1951 में ही दिल्ली में अपनी जगह बना चुका था। लेकिन इसके हनक की खबर आम जन तक 2019 में पहुंची। जब प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने एक निजी साक्षात्कार के द्वारा इस बाजार को चर्चा में ला दिया। प्रधानमंत्री ने एक सवाल के जवाब में कहा कि मोदी की छवि खान मार्केट गैंग या लुटियंस दिल्ली ने नहीं बनाई। यह 45 वर्षों की कड़ी मेहनत से बनी है। यह बात आखिर देश के प्रधानमंत्री को क्यूं कहनी पड़ी? इसे जानने के लिए हमें इस बाजार के बारे में जानना होगा। साल 1947 में देश का बटवारा हो चुका था। इस रक्तरंजित बटवारे ने दोनों तरफ के लोगों को शरणार्थी जीवन जीने पर मजबूर कर दिया। दिल्ली शरणार्थियों से पट चुका था। उन्हें दिल्ली के कई जगहों पर बसाया जा रहा था। यह बाजार भी तभी अस्तित्व में आया।
खान मार्केट के अध्यक्ष संजीव मेहरा ने बताया कि अगर हम इतिहास में देखें तो यह जगह एक कब्रिस्तान था। यह बाजार भी उसी पर ही बना है। शुरूआत में यह पूरा इलाका खाली था और इसे उस वक्त की दिल्ली और अब पुरानी दिल्ली के बाहरी इलाकों में गिना जाता था। इसलिए इसे कब्रिस्तान के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन सरकार ने यहां शरणार्थियों के लिए दुकाने बनाई। पहले फेज में 80 से 100 लोगों को कुल 156 दुकानें अलॉट की गई थीं। उसे 50 रुपये के न्यूनतम किराये पर शरणार्थियों को दिया गया था। सरकार ने 1953-54 में दुकानदारों को मालिकाना हक भी दे दिया। मेहरा ने आगे बताया कि बाबा बताते थे कि आवंटन के दौरान एक और बात ध्यान रखी गई थी कि पाकिस्तान में जिसका ज्यादा नुकसान हुआ उसे यहां भी उसी आधार पर ज्यादा संपत्ति आवंटित की गई । बशर्ते नुकसान संबंधी कागजात दिखाने पड़ते थे।
डॉक्टर समेत कुछ पेशेवरों को एक से ज्यादा दुकान आवंटित की गई थीं। क्योंकि इन्हें एक से ज्यादा कमरे चाहिए थे। सरकार ने उनके नुकसान को देखते हुए उनकी मांगों को पूरा किया। उस समय सरकार ने आवंटित करते समय हमारे सामने दो विकल्प रखे थे या तो वे दुकान के साथ यहीं पर माकन भी लें, अन्यथा वह सिर्फ दुकान के साथ मकान कहीं दूसरी जगह भी ले सकते हैं। सबने अपनी सुविधा के अनुसार विकल्प चुना और यहीं से इस बाजार की यात्रा शुरू हुई। अमेरिकन कमर्शियल रीयल स्टेट सर्विस की 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक 24वें स्थान पर खान मार्केट दुनिया के सर्वाधिक महंगे बाजारों में से एक है। 1350 रुपये प्रति स्कावर फीट यहां का किराया है। संजीव मेहरा ने बताया कि समय के साथ बाजार भी बहुत बदल गया है।
पहले यहां कई छोटी दुकाने भी हुआ करती थी। लेकिन आज उनकी जगह विदेशी ब्रांडो ने ले ली है। अब कई दुकानों के मालिक भी बदल गए हैं। बहुत से दुकानदार तो यह जगह छोड़कर कहीं और शिμट हो गए हैं। इस बाजार के साथ ही धीरे-धीरे लगभग सभी सरकारी संस्थाओं ने भी इसके आस-पास ही जन्म लिया। इन संस्थाओं में बैठने वाले लोग देश की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। उन संस्थाओं में एक खास वर्ग के विचारधारा के लोगों का अधिपत्य रहा। जिन्हें यह दम्भ रहा है की देश की राजनीति एवं देश की सभी संस्थाओं को वही चलातें हैं। वैसे यह बात कुछ हद तक सत्य भी है कि इनकी पैठ राजनीति से लेकर प्रशासनिक तन्त्र में है। यही लोग बहुत हद तक, बड़े फैसलों को अपने हितों के अनुसार प्रभावित भी करते हैं।
यह वर्ग देखने में तो हिन्दुस्तानी है पर स्वभाव से यह आज भी अंग्रेजदा है। यह वर्ग इतना शक्तिशाली है कि माना जाता है कि दिल्ली की सत्ता तक पहुंच बनानी है तो पहले इनको अपनी तरफ मोड़ना होगा। प्रधानमंत्री ने भी कुछ इसी तरफ इशारा करते हुए अपनी बात कही। प्रधानमंत्री ने अपने कई साक्षात्कार में यह बात मानी भी है कि उनके लाभकारी योजनाओं से आम जनता तो खुश है पर यह वर्ग आज भी उनको स्वीकार नहीं कर पाया है।

खान मार्केट के पहले फेज में 80 से 100 लोगों को कुल 156 दुकानें अलॉट की गई थीं। उसे 50 रुपए के न्यूनतम किराये पर शरणार्थियों को दिया गया था। सरकार ने 1953-54 में दुकानदारों को मालिकाना हक भी दे दिया।

इस बाजार का नाम सीमांत गांधी खान अब्दुल गμफार खान और उनके भाई खान अब्दुल जब्बार खान के नाम पर रखा गया। संजीव मेहरा ने बताया कि जितने भी लोग उस वक्त सिंध या पंजाब प्रान्त से आये, उनके मन में इन दोनों भाइयों के प्रति सम्मान था। क्योंकि बंटवारे के समय इन दोनों शख्यिस ने उन जगहों से सुरक्षित निकालने में शरणार्थियों की मदद की थी। जिसकी वजह से सभी ने यह नाम उनके सम्मान स्वरूप रखा। इसमें बड़ी भूमिका मेहर चंद खन्ना ने निभाई थी। जिनके नाम पर भी एक बाजार का नाम रखा गया है। वैसे इतिहास को भी क्या पता था कि यह स्थान एक दिन देश के वर्तमान को इस तरह झकझोर देगा कि एक प्रधानमंत्री तक को इसपर बयान देना पड़ जायेगा।




 
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