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मातृत्व का बोझ किशोरियों पर क्यों

12/06/2019

प्रीति बाला
हाल ही में उत्तरप्रदेश को लेकर अखबारों में एक खबर छपी थी कि यहां हजारों महिलाएं मां शब्द सुनने से पहले ही दुनिया छोड़ देती हैं। इनमें से आधी की तो डिलीवरी के एक घंटे में ही मौत हो जाती है। इनमें से 90 प्रतिशत वे महिलाएं होती हैं जिनकी शादी कम उम्र में हो जाती है और तुरंत गर्भवती भी हो जाती हैं। अशिक्षा, गरीबी या परंपरा के नाम पर यह दुर्भाग्यशाली स्थिति डराने वाली है। यूनिसेफ के मुताबिक एक साल में अकेले यूपी में 11500 प्रसूताएं डिलीवरी वाले दिन ही मर जाती हैं।
हालांकि पिछले कुछ दशकों में अपने देश में बाल विवाह (18 साल से कम उम्र में शादी) जैसी कुरीति को दूर करने में काफी सफलता मिली है। इसके बावजूद बाल विवाह हमारे समाज में आज भी बड़ी संख्या में हो रहा है। गरीबी और अशिक्षा के साथ साथ वर्षों से चली आ रही सामाजिक मान्यताएं और परंपराएं भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। बाल विवाह सीधे तौर पर लड़कियों के अधिकारों का हनन है। इसे रोकने के लिए सामाजिक जागरूकता के साथ-साथ असरकारक उपाय भी जरूरी हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इस मामले को अपने सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स का हिस्सा बनाया है। लेकिन सच्चाई ये है कि इसको रोकने के लिए जितने व्यापक प्रयास की जरूरत है, उतना नहीं हो पा रहा है। केंद्र सरकार की नीतियों में यह विषय शामिल है, लेकिन इस पर संसाधन उतने नहीं लगाए जा रहे हैं, जितना आवश्यक है। कम उम्र में शादी का सबसे बुरा परिणाम है कच्ची उम्र में मातृत्व। इसकी वजह से लड़कियों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कच्ची उम्र में मातृत्व न केवल मां बनी लड़की के लिए, बल्कि नवजात बच्चे के लिए भी काफी कष्टकारक है। फिर जिस उम्र में लड़कियों को पढ़ाई और अपने पैरों पर खड़ा करने का प्रयास किया जाना चाहिए, उस उम्र में उनकी गोद में बच्चा आ जाने से सारे सपने धरे रह जाते हैं। इससे लड़की अगले कई सालों तक अपने परिवार और बच्चे को संभालने में लगी रहती है। अपनी तरक्की का कोई काम नहीं कर पाती है। विश्व बैंक और इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च आन वूमन (आईसीआरडब्लू) द्वारा 2017 में किये गये एक संयुक्त अध्ययन में पाया गया है कि बाल विवाह और किशोरवय में मातृत्व को रोकने में अगर सफलता मिल गई तो दुनिया को 2030 ईस्वी तक परचेजिंग पावर पैरिटी टर्म्स में चार हजार बिलियन डॉलर तक का फायदा हो सकता है। यह रिपोर्ट कहती है कि बाल विवाह के चलते एक लड़की की संभावित आमदनी में 9 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। उसके पढ़ने या रोजगार प्राप्त करने के मौके लगभग बंद हो चुके होते हैं। साथ ही, इस अध्ययन में ये भी पाया गया कि 18 वर्ष या उससे कम उम्र की मां की संतानों में पांच साल तक की उम्र तक में कुपोषण की दर 6.3 प्रतिशत ज्यादा बढ़ जाती है। उनकी मृत्यु की आशंका भी साढ़े तीन फीसदी तक बढ़ जाती है। मतलब ये कि पांच साल तक की उम्र के सौ बच्चों में तीन की मौत होने की संभावना केवल मां की कम उम्र की वजह से पैदा हो जाती है।
सरकारी आंकड़े कहते हैं कि हमारे देश में हर चौथी लड़की की शादी 18 साल तक की होते-होते कर दी जाती है। इनमें से तकरीबन 8 फीसदी लड़कियां टीन एज में ही मां बन जाती हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की चौथे दौर की रिपोर्ट (एनएफएचएस-4), जिसे केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा दिसंबर 2017 में जारी किया गया था, के आंकड़ों को 2011 की जनगणना के आंकड़ों से मिलान करने से पता चलता है कि हिंदुस्तान में टीन एज प्रेगनेन्सी यानी 18-19 साल तक की लड़कियों में मातृत्व की कुल संख्या लगभग 45 लाख थी। इन 45 लाख मामलों में से 4 लाख से अधिक टीन एज प्रेगनेन्सी के मामले तो अकेले उत्तरप्रदेश में होते हैं। साफ है कि 18 साल से कम उम्र की देश की गर्भवती लड़कियों में लगभग दस फीसदी या हर दसवीं गर्भवती लड़की तो अकेले उत्तरप्रदेश में होगी जो देश का सबसे बड़ा राज्य है। इसे अगर जिलावार देखा जाए तो उत्तरप्रदेश में टीन एज प्रेगनेन्सी के सबसे ज्यादा मामले एटा जिले (9,2 फीसदी)  में हैं। प्रदेश के बाकी जिलों जहां टीन एज प्रेगनेन्सी के मामले सबसे ज्यादा हैं, उनमें बदायूं (8.9 फीसदी), मथुरा (8.7 फीसदी), ललितपुर (8.6 फीसदी), महामाया नगर (8.6 फीसदी), चित्रकूट (8.2 फीसदी), सीतापुर (7.3 फीसदी), कांशीराम नगर (7.1 फीसदी) और श्रावस्ती (7 फीसदी) हैं।
अब तो कई तरहों के शोध अध्ययनों में साबित हो चुका है कि टीन एज प्रेगनेन्सी मातृ एवं शिशु मृत्युदर का एक बड़ा कारण है। इसका सीधा संबंध मां और नवजात बच्चे के खराब स्वास्थ्य, गरीबी, किशोरवय की मां के आगे बढ़ने के अवसरों का लगभग खत्म हो जाने जैसी कई बातों से भी है। कच्ची उम्र में मातृत्व से न केवल मां को बल्कि नवजात शिशु को भी कई तरह के खतरों का सामना करना पड़ता है। नवजात शिशु का वजन कम होना, समय से पूर्व जन्म लेना और उससे जुड़े खतरों का सामना करना, जिनका असर जिंदगीभर रहने की संभावना रहती है। इसके अलावा शिशु मृत्युदर का बढ़ना, शरीर के अंगों का पर्याप्त विकसित न होना और अंगों के पर्याप्त विकास के अभाव के चलते दिमाग में रक्तस्त्राव होना, सांस लेने में कठिनाई होना जैसी समस्याएं भी आने की आशंका होती है। टीन एज प्रेगनेन्सी से सबसे बड़ा खतरा बच्चे के प्रीमैच्योर बर्थ यानी समयपूर्व जन्म लेने का होता है। मां के गर्भ के 37 हफ्ते पूरा होने से पहले अगर बच्चे का जन्म हो जाता है तो उसे कई तरह की कठिनाइयों से जूझना पड़ता है। उसका समुचित शारीरिक और मानसिक विकास नहीं हुआ होता है और अगले कई महीनों तक उसे बहुत ज्यादा देखभाल की जरूरत होती है। अन्यथा उसकी जान जाने का खतरा लगातार बना रहता है। ऐसे में जरूरत है कि न सिर्फ कच्ची उम्र में लड़कियों की शादी रोकी जाए बल्कि उन पर अनचाहे मातृत्व का भी बोझ डालने से भी बचा जाए। इसके लिए समाज को जागरूक करना जरूरी है। कच्ची उम्र में मातृत्व के खतरों के प्रति लड़कियों को विशेष रूप से शिक्षित करना और उनको गर्भधारण से बचने के उपायों के बारे में जानकारी देना भी बहुत जरूरी है। हालांकि कुछ साल पहले केंद्र सरकार ने इन्हीं सब बातों को लक्ष्य करते हुए पूरे देश में राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम की शुरूआत की थी। उसका एक ही उद्देश्य था कि 10 से 19 साल तक के देश के 25 करोड़ से ज्यादा लड़के-लड़कियों को उनके उम्र से जुड़ी जानकारियां देना, चाहे वह सेक्स से जुड़े सवाल हों या माहवारी के या फिर शरीर में हो रहे शारीरिक बदलाव के। ये कार्यक्रम सामाजिक स्तर पर भी कई तरह के कैंपेन चलाने की बात करता है। इसमें महीने में कम से कम एक बार किशोर-किशोरी दिवस मनाने का भी प्रावधान है।
पिछले कुछ सालों में 10 से 19 साल के लड़के-लड़कियों के स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों से सरकार का जोर कम हो गया जहां स्वच्छ भारत अभियान, आयुष्मान भारत और नेशनल न्यूट्रीशन मिशन जैसे कई अभियान चले, वहीं एडोलेसेंट्स यानी बढ़ते बच्चों के स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर वो फोकस नहीं रहा, जो रहना चाहिये था। वो भी तब जब 10 से 19 साल के लड़के-लड़कियों की आबादी देश की कुल आबादी का पांचवां हिस्सा है। अकेले उत्तरप्रदेश के 57 जिलों में राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम चलता है। इन 57 जिलों में से 25 जिलों को हाई प्रायोरिटी डिस्ट्रिक्ट माना गया है। इसके बावजूद इन 25 में से किसी भी जिले में एडोलेसेंट फ्रेंडली हेल्थ क्लीनिक के बारे में जानकारी का अभाव है। कहना न होगा कि ज्यादातर जिलों में येक्लीनिक्स कागजों में ही चल रहे हैं।
लेकिन क्या हिंदुस्तान, जहां की तकरीबन 22 फीसदी आबादी 10 से 19 साल के लड़के-लड़कियों की है, वो इन किशोर-किशोरियों से जुड़े मुद्दों को नजरंदाज कर सकता है? क्या हमारे पास इतना वक्त है? उत्तर सीधा-सा है, नहीं। अब तक हिंदुस्तान के डेमोग्राफिक डिविडेंड की बात होती रही है पर उसे कैसे हासिल किया जाएगा जब तक इतनी बड़ी आबादी के मुद्दों को प्राथमिकता में नहीं लाया जाएगा।
(लेखिका सामाजिक मुद्दों पर काम कर रही संस्थाओं से जुड़ी हैं।)


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