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मिथिलांचल की मनमोहक संस्कृति की याद दिलाता सामा-चकेवा

02/11/2019

सुरेन्द्र किशोरी
विभिन्न लोक संस्कृति व लोकपर्व को अपनी धरा में बसाए मिथिलांचल में अनेकों उत्सव मनाए जाते हैं लेकिन उनमें प्रमुख लोकपर्व है सामा-चकेवा। भाई-बहन के कोमल और प्रगाढ़ रिश्ते को बेहद मासूम अभिव्यक्ति देने वाला यह लोकपर्व मिथिला की संस्कृति व कला का समृद्ध अंग है। छठ के अंतिम दिन सुबह में सूर्यदेव को अर्घ्य देने के बाद शाम से शुरू होने वाले इस लोकपर्व की समाप्ति कार्तिक पूर्णिमा की रात को होती है। भाई-बहन के प्यार के प्रतीक में आठ दिनों तक रातभर महिलाएं सामा खेलती हैं और अंतिम दिन चुगला का मुंह जलाने के साथ ही इसका समापन होता है। इस उत्सव के दौरान बहनें सामा, चकेवा, चुगला, सतभईयां, टिहुली, कचबचिया, चिरौंता, हंस, सतभैंया, चुगला, बृंदावन सहित अन्य मूर्ति को बांस से बने चंगेरा में सजाकर पारंपरिक लोकगीतों के जरिये भाईयों के लिए मंगलकामना करती हैं। हालांकि बदलते समय के साथ इसमें भी बदलाव देखा जाने लगा है। पहले महिलायें अपने हाथ से ही मिट्टी का सामा-चकेवा बनाती थीं, विभिन्न रंगों से उसे सवांरती थीं लेकिन अब ऐसा नहीं होता। बाजार में मिट्टी की बनी सामा-चकेवा की रंग-बिरंगी मूर्तियां सहज उपलब्ध हैं। संध्या बेला में 'गाम के अधिकारी तोहे बड़का भैया हो, सामा खेले चलली भैया संग सहेली, साम चके अबिह हे जोतला खेत में बैसिह हे, भैया जीयो हो युग युग जीयो हो तथा चुगला करे चुगली बिलैया करे मियाऊं' सरीखे गीतों के साथ जब चुगला दहन करती हैं, तो वह दृश्य मिथिलांचल की मनमोहक पावन संस्कृति की याद ताजा कर देती है। अन्य जगहों की तरह मिथिलांचल में भी तेजी से बढ़ रहे बाजारी और शहरीकरण के बावजूद यहां के लोग अपनी संस्कृति को अक्षुण्ण बनाये हुए हैं। 
मिथिला तथा कोसी के क्षेत्र में भातृ द्वितीया, रक्षाबंधन की तरह ही भाई-बहन के प्रेम के प्रतीक लोकपर्व सामा चकेवा में लोकगीत रोज होता है लेकिन देवोत्थान एकादशी की रात से प्रत्येक आंगन में नियमित रूप से महिलाएं समदाउन, ब्राह्मण गोसाउनि गीत, भजन आदि गाकर मूर्तियों को ओस में रखती हैं। कार्तिक पूर्णिमा की रात मिट्टी के बने पेटार में संदेशस्वरूप दही-चूड़ा भरकर बहनें सामा-चकेवा को अपने-अपने भाई के घुटनों से फोड़वाकर श्रद्धापूर्वक अपने खोइछा में लेती है। बेटी के द्विरागमन की तरह समदाउन गाते हुए विसर्जन के लिए समूह में महिलाएं घर से निकलती हैं और नदी, तालाब के किनारे या जुताई किए गए खेत में चुगला के मुंह में आग लगाया जाता है। मिट्टी तथा खर से बनाए बृंदावन में आग लगाकर बुझाती हैं और सामा-चकेवा सहित अन्य मूर्ति को पुन: अगले साल आने की कामना करते हुए विसर्जन किया जाता है। हालांकि अब सामा-चकेवा मिथिला से निकलकर दूर तक फैल चुका है। हिमालय की तलहट्टी से लेकर गंगासागर तट तक और चम्पारण से लेकर मालदा और दीनजापुर तक मनाया जाता है। दीनजापुर में बंगला भाषी होने के बाद भी वहां की महिलाएं एवं युवतियां सामा-चकेवा पर मैथिली गीत ही गाती हैं। जबकि चम्पारण में भोजपुरी और मैथिली मिश्रित सामा-चकेवा के गीत गाए जाते हैं। पर खेल का रस्म सब जगह एक समान है।
सामा चकेवा के संबंध में कहानी है कि भगवान श्रीकृष्ण की पुत्री श्यामा और पुत्र शाम्ब के बीच अपार स्नेह था। कृष्ण की पुत्री श्यामा का विवाह ऋषि कुमार चारूदत्त से हुआ था। श्यामा ऋषि-मुनियों की सेवा करने बराबर उनके आश्रमों में सखी डिहुली के साथ जाया करती थी। भगवान कृष्ण के दुष्ट स्वभाव के मंत्री चुरक को यह रास नहीं आया और उसने श्यामा के विरूद्ध राजा के कान भरने शुरू कर दिए। क्रुद्ध होकर भगवान श्रीकृष्ण ने बगैर जांच-पड़ताल के ही श्यामा को पक्षी बन जाने का श्राप दे दिया। जिसके बाद श्यामा का पति चारूदत्त भी भगवान महादेव की अर्चना कर उन्हें प्रसन्न करते हुए स्वयं भी पक्षी का रूप प्राप्त कर लिया। श्यामा के भाई एवं भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र शाम्भ ने अपने बहन-बहनोई की इस दशा से मर्माहत होकर अपने पिता की ही आराधना शुरू कर दी। इससे प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने वरदान मांगने को कहा तो उसने बहन-बहनोई को मानव रूप में वापस लाने का वरदान मांगा। तब श्रीकृष्ण ने पूरी सच्चाई का पता लगा और श्राप मुक्ति का उपाय बताते हुए कहा कि श्यामा रूपी सामा एवं चारूदत्त रूपी चकेवा की मूर्ति बनाकर उनके गीत गाये और चुरक की कारगुजारियों को उजागर करें तो वे दोनों फिर से अपने पुराने स्वरूप को प्राप्त कर सकेंगे। तभी से बहनों द्वारा अपने-अपने भाई के दीर्घायु होने की कामना के लिए सामा-चकेवा पर्व मनाया जाता है। मिथिला में लोगों का मानना है कि चुगला ने ही कृष्ण से सामा के बारे में चुगलखोरी की थी। सामा खेलते समय महिलायें मैथिली लोकगीत गाकर आपस में हंसी-मजाक भी करती हैं। भाभी-ननद से लोकगीतों की भाषा में मजाक करती हैं। अंत में चुगलखोर चुगला का मुंह जलाया जाता है और सभी महिलायें लोकगीत गाती हुई अपने-अपने घरों को वापस जाती हैं।
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं।)


 
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