लेख

Blog single photo

कश्मीर समस्या की अंधी सुरंग को भेदते दिख रही सरकार

02/07/2019

केपी सिंह 
सोमवार को संसद में जम्मू कश्मीर में राष्ट्रपति शासन की मियाद 6 माह के लिए और बढ़ाने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हो गया। प्रस्ताव पर हुई चर्चा के दौरान विपक्षी सदस्यों ने सरकार की नीतियों की आलोचना का धर्म तो निभाया लेकिन यह सारी कवायद खानापूर्ति तक सिमटी रही। लोकसभा चुनाव के नतीजों से निर्मित राजनीतिक परिदृश्य ने विरोधी दलों में घनघोर हताशा भर दी है। पस्त मनोबल के कारण उनमें विरोध की जिजीविषा फिलहाल बाकी नहीं बची। इस माहौल में सरकार 'जो जीता वही सिकंदर' की तर्ज पर एकछत्र हुकूमत चलाने की स्थिति में पहुंच गई है।
लेकिन मुद्दा यह नहीं है कि सरकार की नीतियों का प्रतिपक्ष दृढ़ता से विरोध क्यों नहीं कर रहा है। मूल प्रश्न यह है कि कश्मीर की समस्या देश के लिए लम्बे समय से गंभीर संकट का कारण बनी हुई है। जिसके समाधान के लिए किये गये ज्यादातर प्रयास अभी तक नाकाम साबित हुए हैं। क्या मोदी-2 सरकार इस अंधी सुरंग को भेद पाने की कोई उम्मीद पैदा कर पा रही है? मोदी सरकार पार्ट-1 का पूरा समय प्रयोग करने और परखने में निकल गया। जिसके कारण बौद्धिक जगत में उसे गपोड़ी या शिगूफेबाज सरकार के बतौर बदनाम पहचान मिलती रही। इसके बावजूद लोकसभा चुनाव में आशातीत बहुमत मिल जाने से उसके हौसले बुलंद हुए हैं। आत्मविश्वास की खुराक ने उसकी कार्यप्रणाली को भी निखार दिया है। दूसरी बार सत्ता संभालने के कुछ ही दिन में नीतिगत तौर पर लिये गये उसके सटीक फैसले इसका उदाहरण हैं। कश्मीर में पहली बार है कि सरकार के प्रयासों से गतिरोध टूटने के आसार तैयार हुए हैं।
भारतीय राष्ट्रराज्य सांस्कृतिक साम्राज्य के बतौर भले ही एक दृष्टि से एक रूप नजर आता हो लेकिन जलवायु, भाषा, नस्ल, इतिहास आदि दृष्टियों से यह विविधता और विरोधाभासों से भरा एक देश है। इसलिए संवैधानिक तौर पर इसे एक राष्ट्र बनाये रखने का काम हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। कांग्रेस के समय विरोधी दल की राज्य सरकारों के सफाये का जो अभियान संविधान का दुरूपयोग कर चलाया गया, उसके कारण अलगाववाद के बीज फले- फूले। संयुक्त मोर्चा सरकार के समय वीपी सिंह ने अमेरिका जैसे संघीय ढांचे के अनुरूप देश की स्थिरता के लिए एक नये समायोजन की रूपरेखा पर काम किया। लेकिन उनके स्वेच्छाचारी क्षेत्रीय क्षत्रपों ने इस मंशा को अराजकता के मुहाने पर खड़ा कर दिया। संयुक्त मोर्चे का विचार सिर्फ जम्मू कश्मीर ही नहीं लगभग हर राज्य को इसी तरह की स्वायत्तता प्रदान करने का था। इस बीच भूमंडलीकरण के विस्तार ने दुनिया को बदल दिया। यातायात और संचार के साधनों ने तमाम विशिष्टताओं को घुलनशील बनाकर एकरूप व्यवस्थाओं की एक नई दुनिया खड़ी कर डाली जिसका प्रभाव भारत जैसे विविधताओं वाले देश पर भी हुआ।
इसके बावजूद कश्मीर को लेकर उसकी विशिष्ट स्वायत्तताओं की परिधि में ही समस्या के समाधान की कोशिशें कैद रही। इसलिए अटल जी ने भी पाकिस्तान को कश्मीर के मामले में एक पार्टी स्वीकार करते हुए घाटी में शांति के लिए यहां तक पेशकश कर डाली कि वे भूगोल नहीं बदलेंगे लेकिन संविधान की सीमाओं से भी परे जाकर कोई रास्ता निकलता है तो उसे मानने के लिए तैयार होंगे। लेकिन उनकी यह सदाशयता पाकिस्तान की कलुषित मानसिकता के कारण व्यर्थ चली गई। मोदी सरकार-1 भी कश्मीर समस्या के पहले से तय फ्रेम वर्क से अलग हटकर कुछ नहीं सोच पायी थी। पीडीपी के साथ गठबंधन सरकार चलाकर इसी मानसिकता के तहत उसने अंधेरे में तीर चलाने की कोशिश की जो किसी निशाने पर नहीं बैठ पाया।
जब लोकसभा चुनाव नजदीक आ गया तो मोदी ने पलटा खाया और दमनकारी नीतियों से कश्मीर को काबू में करने की नीति पर अमल शुरू किया जिसे एक बार फिर हिन्दू कार्ड खेलने की शातिर मंशा के तौर पर देखा गया। खुद राजनाथ सिंह भी इस दौरान बातचीत का रास्ता बिल्कुल बंद किये जाने से संतुष्ट नहीं थे जिसकी अभिव्यक्ति उनके व्यंजनापूर्ण बयानों में यदाकदा झलकी। इसी बीच मोदी सरकार को अनुकूलन प्रदान करने के कई घटनाक्रम सामने आये। चुनाव में राजनीतिक तौर पर यह स्थापित हुआ कि मुसलमानों को पूरी तरह किनारे करके भी कोई पार्टी इस देश में बहुमत हासिल कर सकती है उसने मोदी सरकार के हाथ खोलने में बड़ी मदद की। दूसरे अवसरवाद की पराकाष्ठा पार कर चुकी विरोधी पार्टियों को मतदाताओं ने जो सबक सिखाया उससे वे सन्निपात का शिकार हो गईं और मोदी सरकार ने यह देखकर खुला खेल फर्रूखाबादी खेलने की ठान ली। विदेश नीति के मोर्चे पर मोदी सरकार ने पाकिस्तान की बुरी गत बना दी।
इन हालातों में जब गृह मंत्रालय का दायित्व राजनाथ सिंह की बजाय अमित शाह को सौंपा गया तो स्थितियां और अधिक निर्णायक बनती गईं। राजनाथ सिंह में दृढ़ प्रतिबद्धता का अभाव था, जिसकी छाप उनके गृहमंत्री रहते कश्मीर समस्या सहित सभी मामलों में देखने को मिलती थी। लेकिन अमित शाह ढ़ुलमुलपन से दूर हैं और प्रतिबद्धता के मामले में बेहद कठोर हैं। इसलिए गृहमंत्री के रूप में उनसे कार्यकाल के कुछ ही दिनों में जोरदार भूमिका निभाने की आशा निर्मित हुई है। कश्मीर उनका पहला लिटमस टेस्ट है। जिसमें उन्होंने धमाकेदार शुरूआत की है। तीन दिन की घाटी की अपनी यात्रा में उन्होंने बिल्कुल साफ कर दिया है कि अलगाववादियों को प्रोत्साहित नहीं किया जाएगा। पंचायत चुनाव को उन्होंने कश्मीरियों को लोकतंत्र का बड़ा लाभ देने के रूप में प्रस्तुत किया है। साथ ही घाटी के लोगों को आश्वस्त किया है कि वे भारत के साथ जुड़ें। भारत सरकार उनकी हर कठिनाई का निदान करने के लिए तत्पर है। यह कश्मीरियों में एक नई मानसिकता के निर्माण की पहल है जो रंग दिखा सकती है। हुर्रियत को पाकिस्तानी धन पोषण बंद कराने के साथ-साथ राजनीतिक तौर पर भी अप्रासंगिक बनाने में अमित शाह का अलगाववादियों से बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद करने का कदम कारगर साबित होता दिख रहा है। कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी जैसे असंभव काम भी अब संभव होते दिखने लगे हैं। अनुच्छेद 35 ए और धारा 370 के मुद्दे पर महबूबा और फारूख अब्दुल्ला के सुर निस्तेज होने लगे हैं। भूमंडलीकरण के दौर में ऐसे समायोजन अवशेष अंग बनकर रह चुके हैं जिन्हें  एक न एक दिन विलुप्त होना ही था। इस यथार्थ को भी प्रगतिधर्मिता की राजनीतिक प्रकृति के मुताबिक समझा जाना चाहिए। बहरहाल, कश्मीर में एक नई पौ फटने के आसार राजनीतिक क्षितिज पर नजर आ रहे हैं जो मोदी पार्ट-2 की बड़ी उपलब्धि होगी। एनडीए संसदीय दल के नेता चुने जाने पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि वे सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास के मंत्र पर काम करेंगे। इसके अनुरूप मुसलमानों सहित देश के सभी वर्गों के साथ अपनत्व प्रदर्शित करते हुए शासन प्रशासन का संचालन उन्होंने अगर प्राकृतिक न्याय व सार्वभौम नैतिकता की कसौटी ध्यान में रखकर किया तो उन्हें कश्मीर जैसी कई जटिल समस्याओं के समाधान का श्रेय मिल सकता है। 
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।) 


 
Top