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दुर्भावना से भरा अभियान

22/10/2019

दुर्भावना से भरा अभियान

बनवारी

देशभर के 49 लेखक-कलाकारों ने तीन महीने पहले जुलाई में प्रधानमंत्री को एक चिट्ठी लिखी। चिट्ठी लिखने वाले लोगों ने अपनी इस चिट्ठी का भरपूर प्रचार करके उसका पूरा राजनैतिक उपयोग किया। लेखकों कलाकारों की यह मुहिम पूरी तरह से दुर्भावना से प्रेरित थी क्योंकि मॉब लिंचिंग की घटनाओं में प्रधानमंत्री को कैसे घसीटा जा सकता है।

मुजरμफरपुर के एसएसपी ने 49 लेखकों, फिल्मकारों और नाटककारों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को जांच-पड़ताल के बाद रद्द करने का आदेश देकर महीनेभर से जारी उस मुहिम की हवा निकाल दी है, जिसमें विपक्षी दलों और लेखकों-कलाकारों के एक वर्ग द्वारा दुर्भावनापूर्वक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को निशाना बनाया जा रहा था। इस पुलिस रिपोर्ट का प्रधानमंत्री या उनकी सरकार से कोई लेना-देना नहीं था। यह बात दिल्ली में सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर और बिहार में सुशील मोदी स्पष्ट कर चुके थे।
यह रिपोर्ट बिहार के मुजμफरपुर जिले के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के आदेश पर लिखी गई थी। उनकी अदालत में एक स्थानीय वकील ने एक याचिका दायर की थी कि 49 लेखकों, कलाकारों ने एक चिट्ठी राजनैतिक उद्देश्यों से लिखी है। उनका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की बदनामी करना है। यह चिट्ठी लिखने वाले लोगों ने देश के भीतर विग्रह फैलाने की कोशिश की है। उनकी यह कोशिश देशद्रोह की श्रेणी में आती है।


इसलिए उन पर तत्संबंधी विभिन्न धाराओं के अंतर्गत कार्रवाई की जानी चाहिए। यह शिकायत अतिरंजित थी क्योंकि कोई भी इन लेखकों-कलाकारों पर देशद्रोह का आरोप नहीं लगा सकता। पर इस याचिका पर विचार करने के बाद मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी ने पुलिस को एक एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया। स्थानीय पुलिस अदालत का आदेश मानने के लिए बाध्य थी। बिहार के पुलिस अधिकारियों ने बाद में स्पष्ट कर दिया था कि पुलिस के रिपोर्ट दर्ज करने का अर्थ यह नहीं है कि इन 49 लेखकोंकलाकारों के खिलाफ कोई कार्रवाई होने वाली है। दर्ज रिपोर्ट के आधार पर पुलिस जांच-पड़ताल करेगी और उसके बाद ही कोई निर्णय लिया जाएगा।
इन आश्वासनों के बाद इस पूरे प्रकरण को अधिक तूल नहीं दिया जाना चाहिए था। कम से कम पुलिस की जांच पूरी होने तक प्रतीक्षा की जानी चाहिए थी। लेकिन विपक्षी दलों ने रिपोर्ट लिखे जाने के तुरंत बाद केंद्र सरकार के खिलाफ एक मुहिम छेड़ दी थी। सीधे प्रधानमंत्री को निशाना बनाने की कोशिश की गई थी। किसी को यह स्पष्ट करने की आवश्यकता नहीं लगी कि इस पूरे मामले में प्रधानमंत्री को कैसे घसीटा जा सकता है। देशभर के 49 लेखक-कलाकारों द्वारा प्रधानमंत्री को यह चिट्ठी तीन महीने पहले जुलाई में लिखी गई थी।
उस चिट्ठी पर प्रधानमंत्री या उनकी सरकार के किसी सदस्य ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। चिट्ठी लिखने वाले लोगों ने अपनी इस चिट्ठी को गोपनीय नहीं रखा था। उसका भरपूर प्रचार करके उसका पूरा राजनैतिक उपयोग किया गया था। इसके बाद बिहार के मुजμफरपुर जिले के एक वकील ने इस चिट्ठी को विग्रहकारी और देशद्रोही करार देते हुए मुजμफरपुर के जिला मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के समक्ष एक याचिका दायर करके उन पर आपराधिक मुकदमा दर्ज किए जाने की मांग की थी। अब तक किसी ने यह नहीं कहा कि वह वकील भारतीय जनता पार्टी का कार्यकर्ता है या उसने भाजपा के नेताओं के कहने पर यह काम किया था।
इसके बावजूद मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के आदेश पर लिखी गई रिपोर्ट को लेकर विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार को निशाना बनाना आरंभ कर दिया था। विपक्षी दलों में भी कांग्रेस अन्य दलों से एक कदम आगे थी। राहुल गांधी से लेकर कांग्रेस के अनेक छोटे-बड़े नेता इस रिपोर्ट के बहाने केंद्र को निशाना बना रहे थे। उनमें जैसे इस चिट्ठी के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराने की होड़ लगी हुई थी। सब यह सिद्ध करने की कोशिश कर रहे थे कि मोदी सरकार ने देश में असहिष्णुता को पराकाष्ठा तक पहुंचा दिया है।
विचारों की स्वतंत्रता छीनी जा रही है। पूरा देश एक निरंकुश तानाशाही के हवाले किया जा रहा है। इस मुहिम के दौरान जिस तरह की भाषा उपयोग में लाई गई थी, वह सभी लोकतांत्रिक मर्यादाओं को लांघने वाली थी। मोदी विरोधी इस अभियान में कांग्रेस के केरल से सांसद शशि थरूर ने भी प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर अपना योगदान दिया। उन्होंने अपनी चिट्ठी में कहा कि अगर कोई देश के प्रधानमंत्री की आलोचना करता है तो उसे देशविरोधी घोषित नहीं किया जाना चाहिए।
उन्होंने प्रधानमंत्री से आग्रह किया था कि वे इस प्रकरण पर सार्वजनिक रूप से अपना रुख स्पष्ट करें और देश को आश्वस्त करें कि वे विचारों की स्वतंत्रता के हामी हैं, भले ही वह विचार उनके और उनकी सरकार के विरोध में हों। शशि थरूर भूल गए कि नरेन्द्र मोदी समय-समय पर ऐसा करते रहे हैं। शशि थरूर ने अपनी पार्टी के अन्य नेताओं से अधिक संयत भाषा का उपयोग किया था। लेकिन उन्होंने यह चिट्ठी प्रधानमंत्री को क्यों लिखी, यह समझना मुश्किल है। जिस पुलिस रिपोर्ट को लेकर यह हो-हल्ला मचाया जा रहा था, वह केंद्र या राज्य सरकार के निर्देश पर नहीं लिखी गई थी। यह रिपोर्ट बिहार के एक जिले के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के आदेश पर लिखी गई थी।
क्या शशि थरूर और उनकी पार्टी चाहते हैं कि केंद्र सरकार देश की अदालतों के मामले में हस्तक्षेप करना आरंभ कर दें? शशि थरूर एक बुद्धिमान सांसद हैं। उनकी पार्टी का सुदीर्घ अवधि तक देश पर शासन रहा है। उन्हें यह न पता हो कि मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी कौन होता है, वह कब और कैसे नियुक्त किया जाता है और किसकी निगरानी में काम करता है, यह संभव नहीं है। वह एक न्यायिक अधिकारी है, सत्र न्यायालय के अधीन है और उसके आचरण या किसी निर्णय को लेकर अगर कोई गंभीर असंतोष है तो उसे उच्च न्यायालय के सामने रखा जा सकता है। अगर शशि थरूर को चिट्ठी लिखनी ही थी तो वह या तो सर्वाेच्च न्यायालय के उच्च न्यायाधीश को लिखी जानी चाहिए थी या बिहार के मुख्य न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को। उसकी बजाय उन्होंने यह चिट्ठी प्रधानमंत्री को यह सोचकर ही लिखी थी कि इस पूरे मामले को एक राजनैतिक स्वरूप देना है।
जुलाई में जिन 49 लेखकों-कलाकारों ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी थी, उनमें से अधिकांश या तो सीधे वामपंथी हैं या कांग्रेस के संरक्षण में पले-पुसे लेखक या कलाकार हैं। उन्होंने यह चिट्ठी देश में भीड़ द्वारा हत्या की बढ़ती हुई घटनाओं पर चिंता प्रकट करने के लिए लिखी थी। उन्हें भी मालूम था कि भीड़ द्वारा हत्या की यह घटनाएं मोदी सरकार के दौरान शुरू नहीं हुई, उसके पहले के कांग्रेस और अन्य दलों के शासनकाल में भी होती रही हंै। उन्होंने यह चित्रित करने की कोशिश की कि इस तरह की अधिकांश घटनाएं उन गायों की रक्षा करते हुए हुई हैं, जिन्हें कथित तौर पर कसाईघरों को बेचने के लिए ले जाया जा रहा था। लेकिन सच्चाई यह है कि इस तरह की घटनाएं देश के अनेक भागों में अनेक तरह की आशंकाओं के चलते हुई हैं।
उनमें बड़ी संख्या बच्चाचोरों की आशंका में मारे गए निरपराधों की है। और भी अनेक कारणों से ऐसी घटनाएं हुई हैं। वे समाज के विघटन और उसमें बढ़ती हुई आशंका-असुरक्षा की परिचायक हंै। इसे लेकर सभी को चिंता होनी चाहिए, लेकिन प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखने वाले लोगों ने उसे एक सामाजिक समस्या के रूप में देखने की बजाय समाज के एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग के विरुद्ध बढ़ती जा रही शत्रुता की भावना के रूप में देखा। उन्होंने इसे विचार के लिए की गई हिंसा घोषित करते हुए प्रधानमंत्री पर सीधे उसका दोष डालने की कोशिश की। यह स्पष्ट है कि यह सब लोग चिट्ठी लिखते हुए स्वयं एक वैचारिक गिरोह की तरह व्यवहार कर रहे थे।
उन्हें केवल गायों की रक्षा के लिए होने वाली भीड़ की हिंसा की चिंता हुई, लेकिन उससे कहीं बड़े पैमाने पर पश्चिम बंगाल और केरल में जो राजनैतिक हत्याएं होती हैं, उसकी कभी चिंता नहीं हुई। यह सभी लोग हमेशा नक्सलियों, आतंकवादियों और अलगाववादियों के समर्थन में ही क्यों झंडा उठाए दिखाई पड़ते हैं, इसका जवाब भी उन्हें देना चाहिए। कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेताओं के समर्थन से उत्साहित इस वामपंथी बिरादरी के 180 अन्य लेखकों, फिल्मकारों और नाटककारों ने एक वक्तव्य जारी किया। उन्होंने घोषित किया कि वे अपनी बिरादरी के 49 लोगों द्वारा प्रधानमंत्री को लिखी गई चिट्ठी के एक-एक शब्द का समर्थन करते हैं।
उन्होंने घोषित किया कि इन लेखकोंकलाकारों के खिलाफ की गई कार्रवाई एक राजनैतिक चुनौती है। इसलिए वे रोज उन सभी मुद्दों को उठाएंगे, जो प्रधानमंत्री को लिखी गई चिट्ठी में है और अपने विरोध को एक अभियान का स्वरूप दे देंगे। लेखकों और कलाकारों से हर समाज को यह अपेक्षा होती है कि वे जीवन की जटिल परिस्थितियों के बीच मानवीय संवेदनाओं को जागृत करेंगे। हमारे यहां के वामपंथी लेखकों और कलाकारों ने मानवीय संवेदनाओं को अपने वैचारिक दुराग्रहों के कारण कुंद करने का ही काम किया है। उन्होंने साहित्य को राजनैतिक परचेबाजी के स्तर पर उतार दिया, इतिहास को भारत की पराजय और सामंती उत्पीड़न की गाथा में बदल दिया, कला को भारतीय सौंदर्य दृष्टि से काट दिया और फिल्म को वर्जनारहित समाज बनाने के लिए इस्तेमाल किया।
कांग्रेस के शासनकाल में साहित्य और कला के नाम पर गठित इन राजनैतिक समूहों को पोषित और संरक्षित किया जाता रहा था। कांग्रेस के शासन का अंत निकट आते देख अनेक लेखकों, रंगकर्मियों ने घोषित किया था कि मोदी प्रधानमंत्री बने तो वे देश छोड़कर चले जाएंगे। हालांकि उनमें से गया कोई नहीं। फिर पुरस्कार वापसी का अभियान छेड़ा गया, उसका भी लोगों पर अभीष्ट प्रभाव नहीं पड़ा। नरेंद्र मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद उनकी यह मुहिम फिर शुरू हुई है।
यह वर्ग राजनैतिक सहिष्णुता की मांग कर रहा है, लेकिन इस वर्ग में अपने से भिन्न विचारों वाले लोगों के विरुद्ध जो राजनैतिक घृणा और विद्वेष भरा हुआ है, उसकी कोई सीमा नहीं है। दरअसल उनकी वैचारिक अतियों के कारण भाजपा को सबसे अधिक लाभ हुआ है। वे यह भी जानते हैं कि उनके विरोध का देश के लोगों पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। फिर वे ऐसा इसलिए करते हैं कि क्योंकि इससे उन्हें दुनियाभर के अपने सहधर्मियों के बीच मोदी सरकार को बदनाम करने का संतोष मिलता है।


 
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