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एमसीआई एक बड़ा दानव

11/07/2019

एमसीआई एक बड़ा दानव

आशुतोष कुमार सिंह

एमसीआई के भ्रष्टाचार की कहानियां मीडिया की सुर्खियों में रही। डॉ. हर्षवर्धन एमसीआई के भ्रष्टाचार को पोलियो की तरह समाप्त करना चाहते थे। हालांकि पिछली बार वह इसमें नहीं कामयाब हो पाये थे। लेकिन इस बार वे इसके खात्मे के लिए कमर कस चुके हैं।

देश में डॉक्टरों की कमी के कारण मर रहे नौनिहालों की मौत के मूल जड़ में जो भ्रष्टाचार काम कर रहा है और जो गंगोत्री बह रही है उसकी चर्चा करना जरूरी है। ताकि देश समझ सके कि किस तरह उनके नौनिहाल मर रहे हैं और नेता पार्टी का चंदा ईकट्ठा करने के लिए माफियाओं के हाथ में मेडिकल शिक्षा को गिरवी रख रहे हैं। अगर देश में हो रही मौतों के कारणों का पता लगाए तो सबसे बड़ा कारण है एमसीआई! यानी भ्रष्ट एमसीआई। एक बड़ा दानव! देश में डॉक्टरों की संख्या बढ़ाने की जिम्मेदारी इसी पर रही है। लेकिन यह संस्था केतन देसाई जैसे बड़े भ्रष्टाचारियों की चाटुकारिता में लिप्त रही और बहुत हद तक आज भी है।

आज भी केतन देसाई जैसे मेडिकल माफियाओं के तार भारतीय राजनीति के शीर्ष सफेदपोशों तक जुड़े हुए हैं। यह बात मैं नहीं कह रहा हूं। यह सार्वजनिक डोमेन में है। चारों ओर यह चर्चा है कि किस तरह केतन देसाई को एनडीए एवं यूपीए सरकार में मदद मिलती रही है। कहा तो यहां तक जाता है कि जिन दिनों संयुक्त मोर्चा की सरकार थी, उन दिनों तत्कालीन प्रधानमंत्री को अपने नजदीकी को एक मेडिकल कॉलेज का एक्रीडिएशन दिलाने के लिए केतन देसाई के अहमदाबाद स्थित घर पर खुद जाना पड़ा था।
यह ग्रुप इतना ताकतवर है कि मोदी-1 में डॉ. हर्षवर्धन को स्वास्थ्य मंत्री से हटवाने में सक्रिय भूमिका निभाई। माना जाता है कि डॉ. हर्षवर्धन एमसीआई के भ्रष्टाचार को पोलियो की तरह समाप्त करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने कई बार आवाज भी उठाई थी। अब जब एक बार फिर डॉ. हर्षवर्धन स्वास्थ्य मंत्री बने हैं तो यह लॉबी सक्रिय है। हालांकि डॉ. हर्षवर्धन इस पर अडिग हैं कि एनएमसी बिल इस सत्र में नहीं तो अगले सत्र में संसद के पटल पर सरकार लेकर आएगी। जिससे एमसीआई का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो सके।

वेंटिलेटर क्यों बने हैं नेता
जिस संस्था का दशकों पहले अंतिम संस्कार कर देना चाहिए था, वह वेंटिलेटर के माध्यम से आज तक जीवित है। इसे आॅक्सीजन देने वाले कोई और नहीं बल्कि आपके-हमारे बीच के सफेदपोश हैं। 4 जुलाई, 2019 को राज्यसभा में पेश हुए एवं पास हुए इंडियन मेडिकल कॉउंसिल अमेंडमेंट बिल-2019 की बहस को देख लीजिए। दूध का दूध और पानी का पानी समझ में आ जाएगा। दरअसल हम भारतीयों को संसदीय कार्यवाहियों को देखने की फुरसत नहीं मिलती है। हम तो बस क्रिकेट, क्राइम और कॉमर्स में इस कदर डूब गए हैं कि देश के हित में अथवा अहित में क्या हो रहा है, इस पर हमारी नजर ही नहीं पड़ती है। 4 जुलाई, 2019 दोपहर 3 बजे के आस- पास उपसभापति हरिवंश के कहने पर आईएमसी अमेंडमेंट बिल-2019 को केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने पेश किया। सबसे पहले समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रो.रामगोपाल इस बिल पर बोले।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि, मुझसे कहा गया कि एमसीआई मामले में संसद-पटल पर कोई रिपोर्ट रखा ही नहीं जा सकता है! इसके पूर्व रखा ही नहीं गया है। मुझे बताया गया था कि एमसीआई की पैठ बीजेपी, कांग्रेस, बीएसपी के साथ-साथ मेरी अपनी पार्टी एसपी में भी है। इसे मैं मानता भी हूं। उन्होंने कहा कि हेल्थ कमेटी के चेयरमैन के नाते मैंने अपनी रिपोर्ट तय समय में दी। इसको लेकर मुझे बहुत कुछ झेलना पड़ा लेकिन मैंने किसी की परवाह नहीं की और यह रिपोर्ट संसद पटल पर रख दी। देशहित में हमने उस रिपोर्ट को लाने का फैसला किया। जिसे बाद में पीएमओ के रास्ते इसे नीति आयोग भेजा गया। नीति आयोग ने भी एमसीआई को भंग करने की सिफारिश कर दी। प्रो. रामगोपाल की बात को आगे बढाते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने कहा कि 1990 के दौर से भारत में दो ऐसी संस्थाएं हैं जिनको लेकर सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा है। एक है एमसीआई और दूसरी है बीसीसीआई।
उन्होंने कहा कि एनएमसी बिल अभी तक तो पास हो जाना चाहिए था। लेकिन नहीं हुआ क्योंकि सरकार के फैसलों को एमसीआई प्रभावित करने में सफल रही है। उन्होंने कहा कि 29 दिसंबर 2017 को एनएमसी बिल लोकसभा में रखा गया। लेकिन डॉक्टरों के दबाव में उसे स्टैंडिंग कमेटी को भेजने का निर्णय लिया गया। जबकि स्टैंडिंग कमेंटी में भेजने के लिए सरकार पर विपक्ष की ओर से कोई दबाव नहीं था। 4 जनवरी को इस मामले को स्टैंडिंग कमेटी को भेजा गया और 20 मार्च,2018 को स्टैंडिंग कमेटी ने अपनी रिपोर्ट भी दे दी। 28 अप्रैल को कैबिनेट की मंजूरी भी मिल गई। बावजूद इसके सरकार इस बिल को अभी तक क्यों नहीं लेकर आई। वहीं दूसरी तरफ महाराष्ट्र से बीजेपी के सांसद डॉ. विकास महात्मे ने आईईएमसी (अमेंडमेंट) बिल पर कहा कि एमसीआई का भ्रष्टाचार इस कदर बढ़ गया था कि वो सिर्फ और सिर्फ निजी मेडिकल कॉलेजों के पक्ष में काम कर रही थी। 100 वर्ष पुराने सरकारी कॉलेज जहां पर हजारों की संख्या में मरीज आते हैं, वहां पर मेडिकल सीट न बढ़ाकर निजी मेडिकल कॉलेजों का सीट बढ़ाती रही, जहां पर ओपीडी मरीजों की संख्या कम थी। उन्होंने इस भ्रष्टाचार की पोल खोलते हुए आगे कहा कि मेडिकल कॉलेजों को पोलिटिकल फंडिंग का बेहतर साधन के रूप में उपयोग किया गया।
पार्टी लाइन देखकर पार्टी कार्यकर्ता को मेडिकल कॉलेज खोलने की अनुमति मिली। अगर कोई एमसीआई अधिकारी इसका विरोध करता तो अगले साल वह एमसीआई का सदस्य नहीं बना रह सकता था। इतना ही नहीं एमसीआई ने निजी कॉलेजों को आगे बढ़ाने के लिए सर्जरी एवं पोस्टमार्टम की शिक्षा देना उचित नहीं समझा। इन कॉलेजों से जो डॉक्टर निकले उन्होंने कभी पोस्टमार्टम किया ही नहीं। फिर वे बाहर निकलकर बेहतर सेवा कैसे दे सकते थे? निश्चित रूप से राज्यसभा सांसद डॉक्टर विकास ने जो सवाल उठाए, या प्रो. रामगोपाल या जयराम रमेश जो कह रहे हैं उसकी गहराइयों में जाया जाए तो समझ में आएगा कि किस तरह से एमसीआईराजनीतिक दल एवं मेडिकल कॉलेजों के बीच में एक आर्थिक लाइन जुड़ती है और देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ करती है।

आईएमसी बिल की क्यों पड़ी जरूरत
लोकसभा एवं राज्यसभा में आईएमसी (अमेंडमेंट) बिल-2019 ध्वनि मत से पास कर दिया गया है। अब सितंबर 2020 तक एमसीआई की शक्तियां निरस्त रहेंगी। इस दौरान सरकार नेशनल मेडिकल कॉउंसिल बिल को पास कराएगी। जिसके बाद एमसीआई जैसी भ्रष्ट संस्था से देश के स्वास्थ्य शिक्षा को छुटकारा मिल जाएगा। इस बावत स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन का कहना है कि यह सर्वविदित सत्य है कि एमसीआई भ्रष्टाचार का गढ़ बन चुका था। उन्होंने कहा कि बोर्ड आॅफ गवर्नर्स अच्छा काम कर रहा है और इसमें अच्छे डॉक्टर इंटरेस्ट दिखा रहे हैं। सरकार बोर्ड आॅफ गवर्नर्स के काम में हस्तक्षेप नहीं कर रही है लेकिन उनके कामों को सूक्ष्मतापूर्वक आॅबजर्व जरूर करती है।
बीओजी के कार्यों की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि 2018-19 में जहां 19 नए मेडिकल कॉलेज सैंक्शन किए गए वहीं 2019-20 में इनकी संख्या 27 है। पीजी मेडिकल कोर्स में सीटों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। 2018 19 में 33422 से बढ़कर इस वर्ष इसकी संख्या 35327 हो गई है। भ्रष्टचार के मामलों में व्यवस्था से 59 लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है। ध्यान देने वाली बात यह है कि 12 जून 2019 को इंडियन मेडिकल अमेंडमेंट बिल 2019 को मंत्रिमंडल की मंजूरी मिली थी जो कि एमसीआई की शक्तियों को 2 वर्षों तक सुपरसिड करेगा। 26 सितंबर, 2018 से यह अवधि शुरू होकर 26 सिंतबंर 2020 तक बोर्ड आॅफ गवर्नस इसे चलाएगी। नए संसोधन में अब इस बोर्ड में 7 की जगह 12 सदस्य होंगे। गौरतलब है कि 6 दशक पहले भारतीय चिकित्सा परिषद अधिनियम,1956 के अंतर्गत मेडिकल कॉउंसिल आॅफ इंडिया का गठन किया गया था। इसके ऊपर देश की चिकित्सा सेवा एवं व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप रखने की जिम्मेदारी थी।

6 दशक पहले भारतीय चिकित्सा परिषद अधिनियम,1956 के अंतर्गत मेडिकल कॉउंसिल आॅफ इंडिया का गठन किया गया था। इसके ऊपर देश की चिकित्सा सेवा एवं व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप रखने की जिम्मेदारी थी।

लेकिन कालांतर में यह संस्था भ्रष्टाचार की गिरμत में आ गई और मेडिकल कॉलेजों से ऐसे लोग पास होकर निकलने लगे, जिनकी चिकित्सकीय योग्यता कटघरे में रही। हद तो उस समय हुई जब इस संस्था का अध्यक्ष एक मेडिकल कॉलेज को मान्यता देने के बदले घूस लेने के आरोप में सीबीआई के हाथों पकड़ा गया। 23 अप्रैल, 2010 का वह दिन एमसीआई के इतिहास का काला दिन साबित हुआ। उस दिन अध्यक्ष केतन देसाई के संग-संग एमसीआई का ही एक पदाधिकारी जेपी सिंह एवं उक्त मेडिकल कॉलेज का प्रबंधक भी गिरμतार हुआ। एमसीआई के भ्रष्टाचार की कहानियां मीडिया में खूब सूर्खियों में रही। दूसरी ओर देश के कोने-कोने से एमसीआई को भंग करने की मांग की जाने लगी। आगे चलकर एमसीआई को भंग करना पड़ा। और आज यह कहानी आईएमसी अधिनियम-1956 की जगह एनएमसी बिल,2017 के रूप में अपने अंतिम निष्कर्ष की ओर है।


 
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