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दफनाने की बजाय दाह संस्कार

20/09/2019

दफनाने की बजाय दाह संस्कार

एम. ओवैस

देश की राजधानी दिल्ली में ईसाई समुदाय के लोगों को अपने प्रियजनों को दफनाने के लिए कब्रिस्तान में जगह कम पड़ रही है। ऐसे में वे विद्युत शवदाह गृह में शव जलाने के बाद उस राख को दफनाने की प्रक्रिया अंजाम दे रहे हैं। खास बात यह है कि इस पद्धति की उनके धर्म में मान्यता भी मिल रही है।

इ स धरती पर जिसने भी जन्म लिया है, एक दिन उसे मौत के आगोश में समाना है। हर धर्म में मरने वाले इंसान के अंतिम संस्कार की अलग-अलग परंपराएं प्रचलित हैं। इन्ही रीति-रिवाजों के अनुसार ही इंसान का अंतिम संस्कार किया जाता है। हिंदू समाज में जहां अग्नि को साक्षी मानकर मरने वालों को पंचतत्व में विलीन करने की परंपरा है, वहीं मुस्लिम और ईसाई समुदाय में अपने शवों को कब्र में दफन करने की परंपरा है। शहरों, कस्बों और देहातों में जहां पर भी आबादी मौजूद है, वहां पर परंपरागत तौर से अंतिम संस्कार के लिए स्थान भी उपलब्ध हैं। सरकारों द्वारा अलग-अलग समुदाय और धर्मों के मानने वालों को अंतिम संस्कार के लिए स्थान उपलब्ध कराया जाता है। राजधानी दिल्ली में सभी धर्मों के मानने वालों के लिए अंतिम संस्कार की जगह निश्चित की गई है।

पादरी जैकब जेम्स होली त्रिनिटी चर्च, तुर्कमान गेट
हमारे यहां जगह की कमी तो है और हम अपने शवों को दफन करने के लिए नए तरीके भी अपना रहे हैं। यूरोप और अमेरिका के साथ कई ईसाई देश भी शवों को दफन करने के लिए कब्रिस्तानों में जगह की कमी से जूझ रहे हैं। इसीलिए ईसाई धार्मिक गुरुओं ने विद्युत शवदाह गृह में शवों का अंतिम संस्कार करने और वहां पर बची राख को कब्रिस्तान में लाकर दफन करने का सिलसिला शुरू किया है। राजधानी दिल्ली में कई ईसाई शवों का अंतिम संस्कार मैंने भी इसी विधि से कराया है। वैसे यह आसान नहीं है क्योंकि ज्यादातर ईसाई परिवार परंपरागत तौर से अपने शवों का अंतिम संस्कार कराना चाहते हैं। इस विधि के लिए जल्दी से लोग तैयार नहीं होते हैं। लेकिन जब उन्हें पता लगता है कि जगह की कमी है तो वह इसके लिए तैयार हो जाते हैं। इस तरीके में राख को दफनाने के लिए बहुत ज्यादा जगह की जरूरत नहीं होती है। 1975 में पादरियों के लिए बनाई गई प्रार्थना पुस्तक में भी इसका जिक्र है।

डॉ. जफरुल इस्लाम खान चेयरमैन, दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग
दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग को राजधानी में रह रहे ईसाई समुदाय के कब्रिस्तानों पर हुए अवैध कब्जों और पक्की कब्र बनाने से शव को दफन करने में आ रही दिक्कतों के बारे में पता चला था। आयोग ने इस सिलसिले में हालात का जायजा लेने के लिए एक अध्ययन कराने का फैसला लिया। इस रिपोर्ट के आने के बाद पता चला है कि वाकई ईसाई समाज को अपने शवों को दफन करने के लिए काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को भेज दी है। सरकार से ईसाईयों के लिए शवों को दफन करने के लिए कब्रिस्तान की जगह उपलब्ध कराने की मांग की है। इसके अलावा आयोग ने कब्रिस्तानों पर हुए कब्जों को खाली कराने का भी सरकार से अनुरोध किया है। इसी रिपोर्ट से हमें पता चला कि ईसाई समुदाय जगह की कमी की वजह से विद्युत शवदाह गृह में अपने शवों का अंतिम संस्कार करा रहे हैं। ईसाई समुदाय में ऐसा करना बुरा नहीं माना जा रहा है बल्कि उनके धर्म गुरुओं ने इसकी इजाजत दी है।

इन स्थानों पर अलगअलग धर्मों के मानने वाले लोग अपनी-अपनी परंपराओं रीति-रिवाज के साथ शवों का अंतिम संस्कार करते हैं, लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि राजधानी दिल्ली के ईसाई समुदाय के लोग अपने मुर्दों का अंतिम संस्कार परंपरागत तरीके से करने के बजाय विद्युत शवदाह गृह में करने पर मजबूर हैं। इसकी वजह उनके लिए बनाए गए कब्रिस्तानो में जगह की कमी बताई जा रही है। राजधानी दिल्ली में ईसाइयों की आबादी जनगणना के अनुसार 0.89 फीसद है यानी आबादी एक फीसद से भी कम। शहरी क्षेत्रों में ईसाई आबादी काफी अधिक है। दिल्ली में ईसाइयों के कब्रिस्तानों में जगह की कमी का मामला उस समय प्रकाश में आया जब दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के जरिए एक अध्ययन कराया गया। आयोग की अध्ययन रिपोर्ट से ही इस पूरे मामले पर से पर्दा उठा।
पूरी दिल्ली में ईसाइयों के 13 कब्रिस्तान मौजूद हैं लेकिन पांच कब्रिस्तान में फिलहाल मुर्दों को दफन नहीं किया जा रहा है। चार कब्रिस्तान ऐसे हैं जो खास मजहबी खानदानों और धार्मिक गुरुओं के लिए आरक्षित हैं। इस तरह फिलहाल पूरी दिल्ली में चार-पांच ही कब्रिस्तान ऐसे बचते हैं, जहां पर आम ईसाइयों के शवों को दफन किया जाता है। कुछ कब्रिस्तान प्रोटेस्टेंट और कुछ कैथोलिक ईसाइयों के लिए भी आरक्षित हैं। यहां पर इन दोनों में से किसी को भी शवों को दफन करने से हमेशा रोका जाता है। दिल्ली में मौजूद ज्यादातर ईसाई कब्रिस्तान अंग्रेजी हुकूमत के समय के हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद मात्र दो या तीन कब्रिस्तान ही दिल्ली में हुकूमत के जरिए एलॉट किए गए हैं।
दिल्ली में शासन करने वाली किसी भी पार्टी की हुकूमत ने ईसाइयों के ऊपर कभी भी ध्यान नहीं दिया। यहां तक शीला दीक्षित हुकूमत ने भी अपने 15 साल के कार्यकाल में ईसाइयों को पूरी तरह से नजरअंदाज किया। जबकि ईसाई समुदाय हमेशा से कांग्रेस पार्टी के साथ खड़ा रहा है। पिछले 4 सालों से दिल्ली में राज करने वाली आम आदमी पार्टी की सरकार ने भी ईसाइयों की कोई सुध नहीं ली है। ईसाइयों के संगठनों के जरिए बार-बार सरकार से अपने मुर्दों को दफन करने के लिए जगह दिए जाने की मांग की जाती रही है। मगर उनकी मांगों पर किसी भी सरकार का ध्यान नहीं जा रहा है। चर्च आॅफ नार्थ इंडिया दिल्ली डायसिस की तरफ से 1978 में प्रकाशित आराधना की पुस्तक जो कि पादरियों के पास होती है और पादरी इसी पुस्तक से प्रार्थना कराते हैं, इस पुस्तक में राख के माध्यम से अंतिम संस्कार कराए जाने का जिक्र किया गया है।
इसमें कहा गया है कि शव को राख में तब्दील करके उस राख को कब्रिस्तान में दफन किया जा सकता है। हालांकि ईसाइयों में अंतिम संस्कार का यह तरीका आम नहीं है, लेकिन धर्म गुरुओं की मानें तो धार्मिक तौर पर इसकी इजाजत है। इसके अलावा इस धार्मिक प्रक्रिया का पता आम ईसाइयों को भी नहीं है, क्योंकि यह पुस्तक आम ईसाइयों तक नहीं पहुंची है। दिल्ली में कब्रिस्तान में जगह की कमी होने की वजह से कुछ साल पहले इस पद्धति के बारे में पादरियों के जरिए ईसाइयों को जानकारी देनी शुरू की गई है। बहुत से ईसाई परिवार इस पद्धति को अपनाने भी लगे हैं। लेकिन अधिकांश ईसाई परिवार इस पद्धति को लेकर अभी भी असमंजस में हैं। हमेशा से ही ईसाई परिवार अपने शवों को कब्रिस्तान में दफन कर पक्की कब्र बनाते आ रहे हैं।
भारतीय समाज में शव को भी सम्मान और आदर देने की परंपरा का पालन ईसाई परिवार भी करते हैं। ईसाइयों के यहां शवों को भी मान सम्मान और आदर सत्कार के साथ अंतिम संस्कार किया जाता है। ईसाईयों का हर परिवार चाहता है कि उनके शवों को भी कब्रिस्तान में जगह मिले। लेकिन जब उन्हें बताया जाता है कि कब्रिस्तान में जगह नहीं है तब वह इस पद्धति के बारे में जानकारी हासिल करते हैं और जानकारी मिलने के बाद विद्युत शवदाह गृह में अपने शवों का अंतिम संस्कार करा कर राख को लाकर कब्रिस्तान में दफन कर देते हैं। बताया जा रहा है कि अमरीका और यूरोप में यह चलन बढ़ रहा है। वहां पर कब्रिस्तानों को इस तरह बनाया जा रहा है कि आम ईसाई अपने परिजनों की राख को लॉकर में सुरक्षित रख देते हैं। यह लॉकर कब्रिस्तान की दीवारों में खासतौर से बनाए जाते हैं। हालांकि अभी दिल्ली के कब्रिस्तान में इस तरह का कोई प्लान नहीं है, लेकिन कब्रिस्तानों में राख को दफन करने के लिए अलग स्थान बनाया गया है।



 
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