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बाबा विश्वनाथ का वह मंदिर

14/10/2019

बाबा विश्वनाथ का वह मंदिर


त्रकारिता के विविध दौर में तरह-तरह के अनुभव हुआ करते हैं। वर्ष 1960 में मैंने दैनिक ‘गांडीव’ वाराणसी के लिए गांव की चिट्ठी लिखना शुरू किया। नाम था ‘कतवारू काका की चिट्ठी।’ उस समय 1958-59 से दैनिक ‘आज’ (वाराणसी) में हर सप्ताह विवेकी राय की ‘मनबोध मास्टर की डायरी’ और किसी दिन भोजपुरी में ‘चतुरी चाचा की चटपटी चिट्ठी’ छपती थी। इन डायरियों को देखकर ही मेरे मन में भी गांव के समाचार लिखने की प्रेरणा हुई। एक वर्ष के बाद पत्र के संपादक डॉ. भगवान दास अरोड़ा का पत्र मिला कि उनके कार्यालय में एक सहायक संपादक की जरूरत है और उस पद पर वह मुझे रखना चाहते हैं। इस तरह मैं किसी समाचार पत्र का सीधा हिस्सा बन गया।

सही मायनों में वाराणसी हो अथवा कलकत्ता, मेरे उपन्यास, कहानी संग्रह और कविता संग्रह भी आये, पर सच यह भी है कि पत्रकारिता ने विभिन्न क्षेत्रों को समझने का मौका दिया और मैंने उससे बहुत कुछ सीखा भी।

वाराणसी चौक के पास ‘गांडीव’ का कार्यालय था। संपादक डॉ. अरोड़ा ने एक दिन मुझे बाबा विश्वनाथ के मंदिर जाने के लिए कहा। मंदिर पहुंचकर मुझे बहुत अच्छा लगा। मंदिर के सामने एक मस्जिद भी थी। लौटने पर संपादक ने पूछा, ‘मंदिर कैसा लगा।’ मैंने कहा, ‘बहुत सुन्दर।’ फिर पूछा, ‘मंदिर का मुंह किधर था।’ जवाब में बोला-वह मस्जिद की तरफ था। उन्होंने कहा कि उसका मुंह तो शंकर भगवान की तरफ होना चाहिए। दरअसल, मुगल सम्राट औरंगजेब ने मंदिर को तुड़वाकर वहां मस्जिद बनवा दिया था। सोचिये क्या फिर से वहां मस्जिद की जगह मंदिर बनाया जा सकता है?अगर ठीक समझिए तो इस पर कुछ लिखिए। मैंने तब कहा था- अब लिखने से नहीं, हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच समझौते से कुछ हो सकता है। इसके लिए हिन्दू और मुस्लिम नेताओं को साथ बैठना होगा। डॉक्टर साहब मेरी बात पर सहमत हो गये।

‘गांडीव’ संपादक धर्म पर बातें किया करते थे। रामायण और गीता पर मेरी जानकारी के मुरीद भी थे। मैं उन्हें तुलसी दास के दोहे, चौपाई और गीता के श्लोक सुना देता था और वह खुश और संतुष्ट हो जाते थे। परिस्थितिवश ‘गांडीव’ और उसके संपादक डॉ. अरोड़ा के साथ मैं लंबे समय तक नहीं रह पाया। छह महीने बाद ही मुझे कलकत्त्ता (अब कोलकाता) जाना पड़ा। वहां ‘विश्वबंधु’, ‘लोकमान्य’, ‘आर्थिक जगत’, वहीं से ‘दिनमान’, ‘धर्मयुग’ से भी जुड़ा। बाद में ‘नवभारत टाइम्स’ का विशेष संवाददाता हो गया। फिर लगातार 10 साल तक ‘भारत मित्र’ का संपादक भी रहा। तत्कालीन कलकत्ता के ढेर सारे प्रकरण याद रखने लायक हैं। इस महानगर में मैं जन्म के बाद पहले भी 1958 में आया था। हिंदी साहित्यसंस्कृत् िा और पत्रकारिता की विभूति सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ से पहले ‘दिनमान’ और बाद में ‘नवभारत टाइम्स’ के माध्यम से संपर्क हुआ। मेरे लिए तब साहित्य और पत्रकारिता के नए दरवाजे खुले।

अज्ञेय जी छोटी-छोटी बातों को बहुत महत्व देते थे। इससे मेरी निष्ठा और उत्साह में वृद्धि होती थी। एक बार इतिहासकार टाइनबी की एक रचना छपी, जिसमें महात्मा गांधी, पैगम्बर ईसा मसीह (स.अ.व.स.) और पैगम्बर हजरत मोहम्मद साहब (स.अ.व.स.) की आपस में तुलना की गई थी। मुसलमानों ने इसे पसंद नहीं किया और ‘स्टेट्समैन‘ के दμतर पर हमला कर दिया और उनकी प्रतियों की होली खेली। इसका एक छोटा सा समाचार ‘दिनमान’ में भेजा। पहली नजर में उसकी हेडिंग मुझे पसंद नहीं आई। इसलिए दूसरे दिन तार से एक दूसरी हेडिंग भेज दी। नया शीर्षक था ‘नबी स.अ.व. और टायनबी’, अज्ञेय जी ने इसे आॅफिस के सूचना बोर्ड पर लगवा दिया। बाद में उन्होंने कहा कि यह संवाददाता इतने गंभीर हैं कि समाचार भेज देने के बाद भी उस पर मंथन करते रहते हैं।

प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री का अचानक रूस में देहावसान हो गया था। अज्ञेय जी ने इस पर मुझे ‘दिनमान’ के लिए एक पृष्ठ की विश्लेषणात्मक टिप्पणी लिखने के लिए कहा। मामला भारत पाकिस्तान का था। निधन रूस में हुआ था। शास्त्री जी के पार्थिव शरीर को दिल्ली लाया जाना था। जिसे क्लियोपैट्रा की तरह ललिता शास्त्री जी स्रेह, श्रद्धा और गंभीर सदमे के साथ ग्रहण करतीं। जनरल अयूब को दुश्मनी भूलकर शास्त्री जी को अपने कंधे पर उठाना था और उन्होंने उसे उठाया भी। मैंने जैसे-तैसे दायित्व का पालन किया और वह मेरा सौभाग्य था कि अज्ञेय जी उससे खुश हुए। मतलब यह कि मैं कोलकाता में था और मुझे मदद दिल्ली से मिल रही थी।


 
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